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हरीपुर बनवा की हजार साल पुरानी शिव प्रतिमा में समाई है अनोखी नक्काशी, जानिए क्यों उमड़ती है यहां कई गांवों की आस्थाअध्यात्म
3 घंटे पहले· 3

हरीपुर बनवा की हजार साल पुरानी शिव प्रतिमा में समाई है अनोखी नक्काशी, जानिए क्यों उमड़ती है यहां कई गांवों की आस्था

सुल्तानपुर जिला मुख्यालय से करीब 7 किलोमीटर दूर हरीपुर बनवा गांव में दसवीं और ग्यारहवीं शताब्दी की एक चौकोर शिव प्रतिमा है, जिसके पत्थर पर नृत्य करती लघु मूर्तियों की बारीक नक्काशी की गई है और जहां कई गांवों के लोग गहरी आस्था के साथ पूजा-अर्चना करते आ रहे हैं।

Karan MalhotraKaran MalhotraCrime Correspondent 3 मिनट पढ़ें AI के लिए
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उत्तर प्रदेश का सुल्तानपुर जिला अपनी ऐतिहासिक विरासत के लिए जाना जाता है। यहां के गांव-देहात में बौद्ध काल और उससे भी पहले की अनेक प्राचीन मूर्तियां आज भी मौजूद हैं, जो इस जिले के समृद्ध और गौरवशाली इतिहास की चुपचाप गवाही देती हैं।

सुल्तानपुर की ऐतिहासिक धरोहर

महमूदपुर, गढ़ा और धोपाप जैसे स्थलों पर समय-समय पर प्राचीन मूर्तियां मिलती रही हैं, जो यह साबित करती हैं कि सुल्तानपुर का इतिहास बेहद गहरा और समृद्ध है। इसी कड़ी में जिला मुख्यालय से करीब सात किलोमीटर की दूरी पर बसे हरीपुर बनवा गांव में भी एक अत्यंत दुर्लभ और प्राचीन शिव प्रतिमा विराजमान है। चौकोर आकृति वाले इस पत्थर पर की गई नक्काशी इसे अलग पहचान देती है और यह प्रतिमा इस क्षेत्र की ऐतिहासिक अहमियत का एक और ठोस प्रमाण है।

दसवीं-ग्यारहवीं सदी की मानी जाती है यह प्रतिमा

हरीनाथपुर गांव के निवासी विनोद कुमार बताते हैं कि यह शंकर जी का एक बेहद पुराना मंदिर है और इस मूर्ति का इतिहास कई सौ वर्ष पुराना माना जाता है। गांव के बुजुर्गों और ग्रामीणों के अनुसार यह प्रतिमा दसवीं और ग्यारहवीं शताब्दी की है। विनोद कुमार यह भी बताते हैं कि पहले यह मूर्ति किसी अन्य स्थान पर थी, लेकिन बाद में पूर्वजों ने इसे यहां लाकर स्थापित कर दिया। तभी से यहां पूजा-पाठ का सिलसिला शुरू हुआ और श्रद्धालुओं की आस्था इस स्थान के साथ गहरी तरह जुड़ती चली गई।

नक्काशी में झलकती है प्राचीन कला

इस प्रतिमा की सबसे खास बात यह है कि यह एक चौकोर पत्थर है, जिसकी सतह पर छोटी-छोटी अनेक मूर्तियां बड़ी बारीकी से उकेरी गई हैं। ये लघु मूर्तियां अलग-अलग दिशाओं और मुद्राओं में मानव नृत्य करती हुई दिखाई देती हैं। इस तरह की जीवंत और सूक्ष्म नक्काशी उस युग के कारीगरों की असाधारण कला का प्रमाण है। प्राचीन काल में इस प्रकार की मूर्तिकला धार्मिक स्थलों की विशेष पहचान हुआ करती थी और यह प्रतिमा उसी महान परंपरा की जीती-जागती मिसाल है।

कई गांवों की आस्था का केंद्र

हरीपुर बनवा की यह प्राचीन शिव प्रतिमा केवल एक गांव तक सीमित नहीं है। हरीपुर बनवा, जुड़ारा, हरीनाथपुर और आसपास के कई अन्य गांवों के लोग यहां नियमित रूप से पूजा-अर्चना के लिए आते हैं। ग्रामीणों का कहना है कि जो भी श्रद्धालु सच्चे मन से यहां माथा टेकता है, उसकी मनोकामनाएं अवश्य पूरी होती हैं। यही वजह है कि जिन लोगों की इच्छाएं पूरी होती हैं, वे लौटकर यहां भंडारे का आयोजन करते हैं। साल भर इस स्थान पर भंडारों का दौर चलता रहता है, जो यहां की सामुदायिक आस्था का जीता-जागता उदाहरण है।

कैसे पहुंचें और क्या हो रहा है विकास

अगर कोई श्रद्धालु या इतिहास प्रेमी इस प्राचीन प्रतिमा के दर्शन करना चाहता है, तो उसे सुल्तानपुर जिला मुख्यालय से लगभग सात किलोमीटर दूर हरीपुर बनवा गांव की ओर जाना होगा। हरीपुर बनवा के अंतर्गत आने वाले हरीनाथपुर गांव में यह पवित्र प्रतिमा स्थापित है। ग्रामीणों के सामूहिक सहयोग से इस स्थल को धीरे-धीरे विकसित करने का प्रयास भी शुरू हो चुका है, ताकि आने वाले समय में यह ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व का स्थल और अधिक श्रद्धालुओं तक पहुंच सके।

इसका आप पर असर

  • भारत में: यह खबर देशभर के पुरातत्व और धार्मिक विरासत में रुचि रखने वाले लोगों को याद दिलाती है कि ग्रामीण भारत में अनेक दुर्लभ प्राचीन धरोहरें अभी भी मौजूद हैं जिन्हें औपचारिक संरक्षण और पहचान की जरूरत है।
  • सुल्तानपुर में: स्थानीय श्रद्धालुओं और इतिहास प्रेमियों के लिए यह एक सुलभ दर्शनीय स्थल है जो जिला मुख्यालय से महज 7 किलोमीटर दूर है और जहां ग्रामीणों के सहयोग से विकास कार्य धीरे-धीरे शुरू हो चुका है।

सवाल-जवाब

हरीपुर बनवा की शिव प्रतिमा कितनी पुरानी है?
ग्रामीणों के अनुसार यह प्रतिमा दसवीं और ग्यारहवीं शताब्दी की है, यानी यह लगभग एक हजार वर्ष पुरानी मानी जाती है।
यह प्रतिमा सुल्तानपुर से कितनी दूर है?
यह प्रतिमा सुल्तानपुर जिला मुख्यालय से लगभग 7 किलोमीटर दूर, हरीपुर बनवा के अंतर्गत आने वाले हरीनाथपुर गांव में स्थित है।
इस मूर्ति की आकृति और नक्काशी कैसी है?
यह एक चौकोर आकृति का पत्थर है जिस पर छोटी-छोटी अनेक मूर्तियां उकेरी गई हैं, जो अलग-अलग दिशाओं और मुद्राओं में मानव नृत्य करती दिखाई देती हैं।
यह मूर्ति अपनी मौजूदा जगह पर कब से है?
मूर्ति पहले किसी अन्य स्थान पर थी और पूर्वजों ने बाद में इसे हरीनाथपुर में लाकर स्थापित किया, तभी से यहां नियमित पूजा-पाठ होती आ रही है।
क्या यहां भंडारे का आयोजन होता है?
हां, जिन श्रद्धालुओं की मनोकामनाएं पूरी होती हैं वे यहां भंडारे का आयोजन करते हैं और यह सिलसिला साल भर चलता रहता है।
इस मंदिर से कौन-कौन से गांव जुड़े हुए हैं?
हरीपुर बनवा, जुड़ारा, हरीनाथपुर और आसपास के कई अन्य गांवों के लोग इस स्थान पर पूजा-अर्चना के लिए आते हैं।
क्या इस स्थल का विकास किया जा रहा है?
हां, ग्रामीणों के सामूहिक सहयोग से इस स्थल को धीरे-धीरे विकसित करने का प्रयास किया जा रहा है ताकि अधिक श्रद्धालु यहां आ सकें।
#अध्यात्म#सुल्तानपुरप्राचीनशिवमंदिर#हरीपुरबनवामूर्ति#ग्यारहवींशताब्दीकीप्रतिमा#उत्तरप्रदेशधार्मिकस्थल#प्राचीननक्काशी#ग्रामीणआस्था#भंडारापरंपरा#सुल्तानपुरऐतिहासिकधरोहर

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