नौ दिनों के पावन पर्व शारदीय नवरात्रि में आदिशक्ति के नौ विभिन्न रूपों की आराधना सनातन परंपरा का अभिन्न अंग मानी जाती है। इस पावन अवसर पर श्रद्धालु अपने घरों और देवालयों में अनुष्ठान पूर्वक देवी उपासना करते हैं। इस कालावधि में एक विशिष्ट ग्रंथ का गायन और वाचन विशेष रूप से फलदायी माना गया है, जिसे चंडी पाठ अथवा देवी माहात्म्य के नाम से ख्याति प्राप्त है। यह पावन रचना वस्तुतः मार्कंडेय पुराण का ही एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जिसे महर्षि वेद व्यास ने लिपिबद्ध किया था। इस पवित्र ग्रंथ में कुल 13 अध्याय समाहित हैं और इसके भीतर 700 दिव्य श्लोक पिरोए गए हैं। इस पूरे संकलन में भगवती दुर्गा के प्राकट्य, अलौकिक आख्यान, गहन रहस्य, कवच, अर्गला, कीलक तथा उनके विभिन्न अवतार प्रसंगों का अत्यंत सुंदर विवरण मिलता है। ऐसी आस्था है कि इस आराधना ग्रंथ के पाठ से जीवन के सारे कष्ट दूर हो जाते हैं और साधक को भगवती का असीम वरदान मिलता है।
महाशक्तियों का प्राकट्य और आसुरी शक्तियों का संहार
इस पवित्र ग्रंथ में विस्तार से इस तथ्य को रेखांकित किया गया है कि किस प्रकार ब्रह्मांडीय संतुलन साधने के लिए महाशक्ति ने भिन्न-भिन्न कालों में अलग-अलग स्वरूप धारण किए। उन्होंने रक्तबीज, महिषासुर, चंड-मुंड और शुंभ-निशुंभ जैसे उत्पाती दैत्यों का अंत करके सृष्टि की रक्षा की। इसके अध्यायों की संरचना क्रमिक रूप से इस दिव्य आख्यान को प्रस्तुत करती है। प्रथम अध्याय की कथा दैत्य मधु कैटभ के संहार पर केंद्रित है। इसके उपरांत दूसरे अध्याय में समस्त देवताओं के तेजपुंज से जगदंबा के प्राकट्य और महिषासुर की विशाल वाहिनी के संहार का दृश्य सामने आता है। तीसरे अध्याय में महिषासुर तथा उसके प्रमुख सेनापति के अंत की गाथा कही गई है। चौथे अध्याय में देवराज इंद्र सहित अन्य सुरगणों द्वारा जगन्माता की वंदना और स्तुति का सजीव चित्रण है। पांचवें अध्याय में चंड और मुंड नामक असुरों द्वारा अपने स्वामी शुम्भ के सम्मुख देवी के अप्रतिम सौंदर्य का बखान किया गया है, जबकि छठे अध्याय में देवी द्वारा धुम्रलोचन के वध की घटना का उल्लेख मिलता है।
युद्ध प्रसंगों से लेकर वरदान प्राप्ति तक की यात्रा
ग्रंथ के सातवें अध्याय में चंड और मुंड के वध का आख्यान आगे बढ़ता है, जबकि आठवां अध्याय रक्तबीज के विनाश की अद्भुत गाथा सामने लाता है। नौवें और दसवें अध्याय में शुम्भ और निशुम्भ जैसे भयंकर असुरों के संहार का विशद वर्णन किया गया है। ग्यारहवें अध्याय में देवगणों द्वारा भगवती की कृतज्ञतापूर्ण स्तुति करने और बदले में अभय वरदान पाने का प्रसंग वर्णित है। अंत में बारहवें और तेरहवें अध्याय में देवी के चरित्र की अलौकिक महिमा को स्थापित किया गया है। यहीं पर राजा सुरथ और वैश्य समाधि की कथा आती है, जिन्होंने भगवती की शरण में जाकर उनकी कृपा से अभीष्ट वरदान प्राप्त किया था।
तीन चरित्रों में विभाजित सात सौ श्लोक और नवदुर्गा उपासना
दैत्यों के दमन के निमित्त देवी द्वारा समय-समय पर धारण किए गए यही युद्ध स्वरूप आगे चलकर नवदुर्गा की उपासना का मुख्य आधार बने। इस संग्रह में मौजूद 700 श्लोकों को तीन प्रमुख भागों में व्यवस्थित किया गया है, जिन्हें प्रथम चरित्र, मध्यम चरित्र और उत्तर चरित्र के रूप में जाना जाता है। प्रथम चरित्र महाकाली के स्वरूप को समर्पित है, मध्यम चरित्र महालक्ष्मी की महिमा गाता है और उत्तर चरित्र महासरस्वती के दिव्य रूप को निरूपित करता है। ये तीनों मूल महाशक्तियां ही नौ स्वरूपों में प्रकट होकर नवदुर्गा आराधना की पूरी व्यवस्था को पुष्ट करती हैं।
कष्टों का निवारण और जीवन में सकारात्मकता का संचार
मान्यताओं के मुताबिक, इन पावन श्लोकों का अनुष्ठान करने से साधक के जीवन से भय, संताप और हर भांति के संकट विलीन हो जाते हैं। विशेषकर नवरात्रि के समय किया जाने वाला यह अनुष्ठान अचूक परिणाम प्रदान करने वाला माना गया है। इस पाठ के प्रभाव से वातावरण की सभी नकारात्मक वृत्तियां समाप्त हो जाती हैं और निवास स्थल पर शुभ ऊर्जा का प्रवाह बढ़ता है। इतना ही नहीं, कुंडली में बैठे प्रतिकूल ग्रहों की अशुभता भी क्षीण होती है और माता की असीम कृपा प्राप्त होती है। इस ग्रंथ के अलग-अलग सिद्ध श्लोकों की अपनी विशेष महिमा और प्रभाव है।
दैनिक जीवन में कल्याणकारी सिद्ध मंत्र
पारिवारिक जीवन में सुख, शुभ कार्यों का निर्विघ्न शुभारंभ और समस्त अभिलाषाओं की पूर्ति के लिए इस प्रसिद्ध मंत्र का उच्चारण अत्यंत कल्याणकारी माना जाता है
सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके। शरण्ये त्र्यंबके गौरी नारायणी नमोस्तुते॥
जीवन में विजय की प्राप्ति, विघ्नों को टालने और निरंतर उन्नति की राह पर आगे बढ़ने के लिए निम्न श्लोक का जप करने का विधान बताया गया है
ॐ जयंती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोस्तुते॥
भय, बुरी नजर, अनिष्टकारी शक्तियों और विरोधियों से रक्षा पाने के लिए इस श्लोक का पाठ एक अभेद्य सुरक्षा चक्र निर्मित करता है
शूलेन पाहि नो देवि पाहि खड्गेन चाम्बिके। घण्टास्वनेन नः पाहि चापज्यानिःस्वनेन च॥
प्रत्यक्ष अथवा गुप्त संकटों से उबरने और तीनों लोकों के क्लेशों को शांत करने की विनती इस मंत्र के माध्यम से देवी के समक्ष रखी जाती है
सर्वाबाधाप्रशमनं त्रैलोक्यस्याखिलेश्वरि। एवमेव त्वया कार्यमस्मद्वैरिविनाशनम्॥
घर-परिवार में समृद्धि, संतान सुख और आर्थिक संपन्नता की कामना रखने वाले साधकों के लिए यह श्लोक अमोघ माना गया है
सर्वाबाधा विनिर्मुक्तो धनधान्यसुतान्वितः। मनुष्यो मत्प्रसादेन भविष्यति नसंशयः॥



















