प्रदोष व्रत क्यों है इतना खास
हिंदू परंपरा में प्रदोष व्रत को भगवान शिव की कृपा पाने का सबसे प्रभावी साधन माना गया है। यह व्रत हर माह दो बार आता है, कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि पर। खास बात यह है कि व्रत का नाम उसी दिन के अनुसार तय होता है जिस वार को वह पड़ता है, इसीलिए सोमवार को सोम प्रदोष, गुरुवार को गुरु प्रदोष और शनिवार को शनि प्रदोष कहा जाता है। मान्यता के अनुसार जो भक्त पूरी श्रद्धा और नियम के साथ यह उपवास करते हैं और प्रदोष काल में भोलेनाथ का अभिषेक, पूजन तथा आरती करते हैं, उनकी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।
शास्त्रों में कहा गया है कि सच्चे मन से किया गया प्रदोष व्रत जीवन के कष्टों को दूर करता है और सुख, समृद्धि, आरोग्य तथा खुशहाली का आशीर्वाद देता है। यही नहीं, इस व्रत को मृत्यु के बाद मोक्ष का मार्ग खोलने वाला भी माना जाता है। जून माह का पहला प्रदोष व्रत 12 जून को शुक्र प्रदोष के रूप में रखा जा चुका है। अब महीने के दूसरे और अंतिम प्रदोष की बारी है, जिसकी सही तिथि और पूजन विधि उज्जैन के ज्योतिषाचार्य आनंद भारद्वाज ने बताई है।
26 या 27 जून, किस दिन रखें व्रत
जून 2026 का दूसरा प्रदोष व्रत ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि पर पड़ रहा है, जो इस बार शनिवार 27 जून 2026 को है। पंचांग की गणना के मुताबिक त्रयोदशी तिथि 26 जून की रात लगभग 10 बजकर 22 मिनट से शुरू होगी और 27 जून की रात करीब 12 बजकर 43 मिनट पर समाप्त हो जाएगी। चूंकि प्रदोष व्रत की पूजा हमेशा प्रदोष काल में ही की जाती है, इसलिए तिथि भले 26 जून की रात से लग रही हो, व्रत 27 जून को ही रखा जाएगा। यही कारण है कि असमंजस की कोई गुंजाइश नहीं, सही दिन शनिवार 27 जून है।
शनि प्रदोष का विशेष लाभ
इस बार प्रदोष शनिवार को पड़ने से इसका महत्व और बढ़ जाता है। मान्यता है कि शनि प्रदोष का व्रत रखने से शनिदेव के अशुभ प्रभाव से रक्षा होती है। यह व्रत भक्तों को सुख और समृद्धि देता है तथा जीवन की बाधाओं को दूर करता है। ज्योतिषाचार्य के अनुसार इस दिन व्रत और पूजन करने वाले साधक को एक साथ भगवान शिव और शनिदेव दोनों की कृपा मिलती है। यह वह अवसर है जब अधूरी मनोकामनाएं पूरी हो सकती हैं, इसलिए श्रद्धालुओं को इस दिन का पूरा लाभ उठाना चाहिए।
पूजा की चरणबद्ध विधि
- प्रदोष व्रत वाले दिन सुबह जल्दी उठें, स्नान आदि से निवृत्त होकर सूर्यदेव को अर्घ्य दें और फिर व्रत का संकल्प लें।
- पूजा स्थल को अच्छी तरह साफ करें और इसके बाद भगवान शिव का पंचामृत से अभिषेक करें।
- पूरे शिव परिवार का पूजन करें, शिवजी को बेलपत्र, फूल, धूप और दीप अर्पित करें, फिर प्रदोष व्रत की कथा का पाठ करें।
- अंत में भगवान शिव की आरती उतारें और शिव चालीसा का पाठ अवश्य करें। इसी के बाद अपना उपवास खोलें।













