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गोंडा के देवरिया कला में ढाई सौ साल पुराने सम्मय माता मंदिर की अनूठी महिमा, नेपाल तक से आते हैं श्रद्धालुअध्यात्म
22 जुल॰ 2026, 8:41 am (45 दिन पहले)· 1

गोंडा के देवरिया कला में ढाई सौ साल पुराने सम्मय माता मंदिर की अनूठी महिमा, नेपाल तक से आते हैं श्रद्धालु

उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले में स्थित प्राचीन सम्मय माता मंदिर ढाई सौ वर्षों से श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बना हुआ है, जहां लोग बिना किसी तंत्र-मंत्र के केवल दर्शन मात्र से मन्नत पूरी होने का विश्वास रखते हैं।

उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले में एक ऐसा सिद्ध स्थान है जो ढाई सौ से भी अधिक वर्षों से लोगों की आस्था का एक बड़ा केंद्र बना हुआ है। विकासखंड रुपईडीह के अंतर्गत आने वाले ग्राम सभा देवरिया कला में स्थित प्राचीन सम्मय माता मंदिर की ख्याति दूर-दूर तक फैली हुई है। इस पावन स्थल पर अपनी श्रद्धा प्रकट करने और माता के दर्शन करने के लिए प्रतिदिन सैकड़ों की संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। स्थानीय निवासियों का अटूट विश्वास है कि जो भी व्यक्ति यहां सच्चे मन से आता है, उसकी हर मनोकामना माता रानी अवश्य पूरी करती हैं।

सदियों पुराना इतिहास और पिंडी स्वरूप का रहस्य

मंदिर के इतिहास पर प्रकाश डालते हुए वहां के मुख्य पुजारी प्रेम कुमार मिश्रा ने बताया कि यह पावन स्थल लगभग 250 वर्ष से भी अधिक प्राचीन है। उन्होंने बताया कि पुराने समय में इस पूरे क्षेत्र में एक अत्यंत घना और विशाल जंगल हुआ करता था। उनके पूर्वजों के अनुसार, उस दौर में माता रानी यहां एक पिंडी के रूप में साक्षात विराजमान थीं। समय बीतने के साथ, कुछ वर्ष पहले स्थानीय ग्रामीणों और आसपास के लोगों के सामूहिक सहयोग से इस भव्य मंदिर की स्थापना की गई। वर्तमान में यह मंदिर पूरे परिक्षेत्र की आस्था का मुख्य आधार बन चुका है।

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सोमवार और शुक्रवार की विशेष मान्यता और बिना झाड़-फूंक के दर्शन

सम्मत माता मंदिर को लेकर क्षेत्र में कई रोचक मान्यताएं और परंपराएं प्रचलित हैं। मुख्य पुजारी प्रेम कुमार मिश्रा का कहना है कि जो भी श्रद्धालु लगातार पांच सोमवार या पांच शुक्रवार को मंदिर आकर सच्चे अंतःकरण से माता के दर्शन करता है, उसकी झोली कभी खाली नहीं रहती। इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां किसी भी प्रकार का कोई दरबार नहीं सजता और न ही किसी प्रकार की झाड़-फूंक या टोने-टोटके जैसी गतिविधियां की जाती हैं। श्रद्धालु केवल माता की पावन प्रतिमा और पिंडी के दर्शन मात्र से ही मानसिक शांति और अभीष्ट फल प्राप्त कर लेते हैं। हर हफ्ते सोमवार और शुक्रवार को मंदिर परिसर में एक बड़े मेले का आयोजन भी होता है, जिसमें स्थानीय दुकानदारों और श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है।

नेपाल तक फैली है महिमा, नवविवाहितों के लिए विशेष परंपरा

इस सिद्ध पीठ की महिमा केवल गोंडा जिले तक ही सीमित नहीं है। पुजारी प्रेम कुमार मिश्रा के अनुसार, यहां उत्तर प्रदेश के बलरामपुर, बहराइच, श्रावस्ती, गोरखपुर जैसे विभिन्न जिलों के साथ-साथ पड़ोसी देश नेपाल से भी भारी संख्या में श्रद्धालु माथा टेकने आते हैं। ग्राम सभा के निवासी प्रवीन शास्त्री ने बताया कि सम्मय माता उनके पूरे गांव की कुलदेवी हैं और वे स्वयं को अत्यंत सौभाग्यशाली मानते हैं कि उनका निवास स्थान इस ऐतिहासिक मंदिर के पास है। उन्होंने एक अनूठी परंपरा का उल्लेख करते हुए बताया कि क्षेत्र में शादी-विवाह के बाद दूल्हे का इस मंदिर में आकर माता का आशीर्वाद लेना अनिवार्य माना जाता है। यह अनूठी परंपरा सदियों से चली आ रही है और आज की युवा पीढ़ी भी इसका पूरी निष्ठा से पालन करती है।

नवरात्र उत्सव और विशाल भंडारा

वर्ष के दोनों नवरात्र, चाहे वह चैत्र नवरात्र हो या शारदीय नवरात्र, इस मंदिर में भक्ति का माहौल चरम पर होता है। इन नौ दिनों में श्रद्धालुओं की अपार भीड़ उमड़ती है और पूरा वातावरण माता के जयकारों से गूंज उठता है। चैत्र नवरात्र के पावन अवसर पर यहां विशेष रूप से श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान यज्ञ का भव्य आयोजन किया जाता है, जिसके समापन पर एक विशाल भंडारे का आयोजन होता है। इस भंडारे में हजारों की संख्या में भक्त आकर प्रसाद ग्रहण करते हैं और माता का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।

सवाल-जवाब

सम्मय माता मंदिर कहां स्थित है?
यह प्राचीन मंदिर उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले के विकासखंड रुपईडीह के ग्राम सभा देवरिया कला में स्थित है।
सम्मय माता मंदिर कितना पुराना है?
मुख्य पुजारी प्रेम कुमार मिश्रा के अनुसार, यह ऐतिहासिक मंदिर लगभग ढाई सौ वर्ष से भी अधिक पुराना है।
मंदिर को लेकर क्या मुख्य धार्मिक मान्यता है?
ऐसी मान्यता है कि जो भी श्रद्धालु लगातार पांच सोमवार या पांच शुक्रवार को सच्चे मन से दर्शन करता है, उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।
शादी के बाद यहां कौन सी विशेष परंपरा निभाई जाती है?
सदियों से चली आ रही परंपरा के अनुसार, शादी के बाद नवविवाहित दूल्हा मंदिर में आकर सम्मय माता का आशीर्वाद लेता है।
इस मंदिर में श्रद्धालु किन-किन क्षेत्रों से आते हैं?
यहां गोंडा के अलावा बलरामपुर, बहराइच, श्रावस्ती, गोरखपुर और पड़ोसी देश नेपाल से भी भारी संख्या में लोग दर्शन के लिए आते हैं।
क्या मंदिर में कोई तांत्रिक क्रिया या झाड़-फूंक की जाती है?
नहीं, इस मंदिर में किसी प्रकार का कोई तांत्रिक दरबार या झाड़-फूंक नहीं की जाती; भक्त केवल दर्शन मात्र से ही आशीर्वाद पाते हैं।
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