जीवन की सबसे कठिन चुनौतियां कई बार इंसान की सबसे बड़ी ताकत बन जाती हैं। मणिपुर के होनहार युवा वेटलिफ्टर ऋषिकांत सिंह चनामबम की जीवन यात्रा इस बात का जीवंत प्रमाण है। अंतरराष्ट्रीय मंच पर जब ऋषिकांत भारत के लिए पदक जीतने का प्रयास कर रहे थे, तब उनके पिता अस्पताल के बिस्तर पर ब्लड कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी से जूझ रहे थे। हजारों किलोमीटर की दूरी और मानसिक तनाव के बावजूद ऋषिकांत ने अपने कदम डगमगाने नहीं दिए। ग्लासगो में आयोजित कॉमनवेल्थ वेटलिफ्टिंग चैंपियनशिप में सिल्वर मेडल जीतकर उन्होंने न केवल देश का मान बढ़ाया, बल्कि अपने परिवार के त्याग और अपने दृढ़ संकल्प की एक मिसाल कायम की।
ग्लासगो के मंच से बाड़मेर तक फैला संघर्ष का ताना-बाना
कॉमनवेल्थ वेटलिफ्टिंग चैंपियनशिप में पुरुषों के 60 किलोग्राम भार वर्ग के मुकाबले में ऋषिकांत सिंह ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी। उन्होंने कुल 264 किलोग्राम वजन उठाकर रजत पदक अपने नाम किया। जिस समय ऋषिकांत ग्लासगो में पोडियम पर खड़े होकर मेडल हासिल कर रहे थे, उस समय उनका परिवार इस ऐतिहासिक क्षण को मोबाइल स्क्रीन पर देख रहा था। ऋषिकांत का मूल निवास मणिपुर के इम्फाल वेस्ट जिले के नगैरंगबाम माखा मानिंग लेइकाई में स्थित है। हालांकि, पिछले कुछ समय से उनका परिवार करीब 7,000 किलोमीटर दूर राजस्थान के बाड़मेर जिले के उत्तरलाई में रह रहा है।
परिवार के राजस्थान में रहने की मुख्य वजह ऋषिकांत के पिता का इलाज है। उनके पिता ब्लड कैंसर से पीड़ित हैं और उनका उपचार एम्स जोधपुर में चल रहा है। अब तक उनके पिता की तीन बार कीमोथेरेपी हो चुकी है। घर में इतनी बड़ी बीमारी और मानसिक तनाव के माहौल के बावजूद ऋषिकांत ने खेल के मैदान में अपने प्रदर्शन से देश को गौरवान्वित किया।
बचपन की तंगी और ₹150 की दिहाड़ी मजदूरी
ऋषिकांत की सफलता की यह चमक रातों-रात नहीं मिली है, बल्कि इसके पीछे बचपन के कड़े संघर्ष की कहानी है। एक समय ऐसा भी था जब उन्हें पढ़ाई जारी रखने के लिए मजदूरी तक करनी पड़ी थी। ऋषिकांत ने बताया कि वे अपने दोस्तों के साथ दो से तीन महीने तक दिहाड़ी मजदूर के रूप में काम पर जाया करते थे। किसी विशेष हुनर के न होने के कारण जो भी छोटा-मोटा काम मिलता, वे उसे स्वीकार कर लेते थे।
इस कठिन परिश्रम के बदले उन्हें प्रतिदिन करीब 150 रुपये मिलते थे। शुरुआत में उनका उद्देश्य केवल इतना था कि वे इस कमाई से अपने निजी स्कूल की फीस जमा कर सकें, ताकि अपने दोस्तों की तरह पढ़ाई कर सकें। हालांकि, बाद में परिवार की आर्थिक स्थिति इतनी बिगड़ गई कि दिहाड़ी से मिलने वाले पैसे भी घर के रोजमर्रा के खर्च चलाने में इस्तेमाल होने लगे।
माता-पिता का अथक परिश्रम और छह सदस्यों का परिवार
ऋषिकांत का बचपन अत्यधिक गरीबी में बीता। उनके माता-पिता के पास खेती के लिए अपनी कोई जमीन नहीं थी, इसलिए वे दूसरों के खेतों में जाकर मजदूरी करते थे। छह सदस्यों वाले इस परिवार में माता-पिता के अलावा दो बेटे और दो बेटियां थीं। इतने बड़े परिवार का पेट भरना और बच्चों की जरूरतों को पूरा करना बेहद चुनौतीपूर्ण था।
परिवार की जरूरतों को पूरा करने के लिए ऋषिकांत के पिता ने खेतों में मजदूरी करने के साथ-साथ टैक्सी चलाना भी शुरू किया। बेहद सीमित आमदनी में किसी तरह घर का गुजारा चलता था, लेकिन माता-पिता ने कभी अपने बच्चों के सपनों के आगे गरीबी को आने नहीं दिया।
बड़े भाई अमरजीत सिंह का ऐतिहासिक सहारा
ऋषिकांत के जीवन और खेल करियर में एक बड़ा बदलाव तब आया जब उनके बड़े भाई अमरजीत सिंह ने भारतीय वायुसेना में प्रवेश पाया। साल 2012 में अमरजीत सिंह के भारतीय वायुसेना में शामिल होने के बाद परिवार की आर्थिक स्थिति में सुधार होना शुरू हुआ। अमरजीत बताते हैं कि उनके माता-पिता ने जीवन भर दूसरों के खेतों में पसीना बहाकर अपने बच्चों का पालन-पोषण किया।
ऋषिकांत अपने बड़े भाई को केवल भाई नहीं बल्कि अपने दूसरे पिता का दर्जा देते हैं। ऋषिकांत के अनुसार, जब उनके पास वेटलिफ्टिंग का प्रशिक्षण लेने और प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने के लिए वित्तीय साधन नहीं थे, तब अमरजीत ने उनकी हर जरूरत पूरी की। ट्रेनिंग फीस से लेकर यात्रा और खेल के उपकरणों का पूरा खर्च अमरजीत ने उठाया। ऋषिकांत स्पष्ट रूप से मानते हैं कि आज वे जिस मुकाम पर पहुंचे हैं, उसमें उनके बड़े भाई का योगदान अतुलनीय है।
पिता के प्रति अटूट लगाव और पहला स्कूटर
ग्लासगो में प्रतिस्पर्धा के दौरान भी ऋषिकांत के मन में अपने बीमार पिता का ही विचार छाया हुआ था। उनका सपना हमेशा से अपने पिता के चेहरे पर खुशी देखना रहा है। जब वे पिछली बार अपने घर गए थे, तो वे अपने पिता को एक स्कूटर के शोरूम लेकर गए थे। वहां उन्होंने पहली बार अपने पिता के लिए एक नया स्कूटर खरीदा। ऋषिकांत का मानना है कि अपने पिता को स्कूटर दिलाते समय उनके चेहरे पर जो खुशी थी, वह उनके लिए किसी भी अंतरराष्ट्रीय मेडल से कहीं बढ़कर थी।
सपनों को साकार करने की प्रेरणादायक मिसाल
ऋषिकांत सिंह चनामबम की यह सफलता साबित करती है कि अगर इंसान के पास स्पष्ट लक्ष्य और ईमानदारी से की गई मेहनत हो, तो गरीबी और विपरीत परिस्थितियां कभी रुकावट नहीं बन सकतीं। जिस लड़के ने कभी ₹150 की दिहाड़ी पर काम किया हो और जिसके माता-पिता दूसरों की जमीन पर मजदूरी करते हों, उसका विश्व स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व करना हर उस युवा के लिए एक बड़ा संदेश है जो सीमित साधनों में बड़े सपने देखता है।



















