भारतीय सेना के जवानों ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि अदम्य साहस और दृढ़ संकल्प वाले इंसान के सामने बड़ी से बड़ी शारीरिक बाधा भी छोटी पड़ जाती है। देश की सीमाओं की रक्षा करते हुए गंभीर रूप से घायल होने वाले सेना के छह जांबाजों ने खेल के मैदान में अपनी असाधारण प्रतिभा का लोहा मनवाया है। इन सैनिकों ने जंग के मैदान में दुश्मनों का डटकर मुकाबला करते हुए अपने शरीर पर गहरे जख्म सहे, लेकिन अपनी हिम्मत और जीवटता के बल पर उन्होंने खेल प्रतियोगिताओं में देश के लिए पदक हासिल किए।
सूबेदार सोलैराज डी
इन असाधारण सैनिकों की सूची में सबसे प्रमुख नाम सूबेदार सोलैराज डी का आता है, जिन्होंने अपनी खेलकूद की उपलब्धियों से पूरी दुनिया में देश का सिर ऊंचा किया है। वर्ष 2018 में कारगिल क्षेत्र में ड्यूटी के दौरान वह गंभीर रूप से घायल हो गए थे, जिसके बाद उन्हें एक लंबी और कठिन चिकित्सा प्रक्रिया से गुजरना पड़ा। हालांकि इस शारीरिक क्षति ने उनके बुलंद हौसलों को जरा भी कमजोर नहीं किया और उन्होंने अपनी मेहनत जारी रखी। उन्होंने लॉन्ग जंप स्पर्धा में शानदार प्रदर्शन करते हुए लगातार दूसरी बार एशियन पैरा गेम्स का गोल्ड मेडल अपने नाम किया। इसके साथ ही उन्होंने 7.15 मीटर की बेहतरीन छलांग लगाकर एक नया एशियन रिकॉर्ड भी अपने नाम दर्ज कराया।
सूबेदार एच होकाटो सेमा
सूबेदार एच होकाटो सेमा का जीवन संघर्ष और उससे पार पाने की कहानी किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं है। वर्ष 2002 में कश्मीर के चौकीबल इलाके में हुए एक बारूदी सुरंग के भीषण धमाके में उन्होंने अपना बायां पैर हमेशा के लिए गंवा दिया था। लेकिन उन्होंने इस दुर्घटना को अपनी प्रगति में बाधा नहीं बनने दिया और खेल की दुनिया में एक नई राह चुनी। उन्होंने शॉट पुट स्पर्धा में देश के लिए ब्रॉन्ज मेडल जीता और अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति का परिचय दिया। इससे पहले वह प्रतिष्ठित 2024 पेरिस पैरालंपिक में भी ब्रॉन्ज मेडल अपने नाम कर चुके हैं। वह नागालैंड राज्य के पहले ऐसे खिलाड़ी हैं जिन्होंने पैरालंपिक में मेडल जीतकर इतिहास रचा है। एक पैर गंवाने के बाद भी खेल के मैदान में उनकी यह वापसी आज अनगिनत लोगों के लिए प्रेरणास्त्रोत बनी हुई है।
सूबेदार अजय कुमार
कर्तव्य पथ पर डटे रहने की मिसाल पेश करने वाले सूबेदार अजय कुमार वर्ष 2017 में उरी सेक्टर में हुए एक बारूदी सुरंग विस्फोट में घायल हो गए थे। इस दर्दनाक हादसे और शरीर पर लगे जख्मों के बावजूद उन्होंने खेल के मैदान से कभी मुंह नहीं मोड़ा और अपनी फिटनेस बनाए रखी। एशियन पैरा गेम्स की 400 मीटर दौड़ स्पर्धा में उन्होंने ब्रॉन्ज मेडल हासिल किया। इस जीत के माध्यम से उन्होंने यह स्पष्ट संदेश दिया कि शरीर पर लगने वाली चोटें कभी भी इंसान के मजबूत इरादों और संकल्प शक्ति को नहीं रोक सकती हैं।
हवलदार कपिल कुमार
हवलदार कपिल कुमार ने भी अपने जीवन के सबसे कठिन दौर का डटकर मुकाबला किया और सफलता हासिल की। वह वर्ष 2020 में पुंछ क्षेत्र में हुई एक घटना के दौरान घायल हो गए थे जिसके बाद उन्हें लंबे इलाज से गुजरना पड़ा। तमाम मुश्किलों और शारीरिक चुनौतियों का सामना करने के बाद उन्होंने खेल के मैदान में अपनी वापसी दर्ज कराई। 400 मीटर फ्रीस्टाइल स्विमिंग प्रतियोगिता में उन्होंने शानदार प्रदर्शन करते हुए सिल्वर मेडल जीता और अपनी कड़ी मेहनत तथा अटूट हिम्मत का शानदार उदाहरण पेश किया।
हवलदार प्रदीप कुमार
वर्ष 2019 में सुंदरबनी इलाके में हुए एक अन्य बारूदी सुरंग धमाके में हवलदार प्रदीप कुमार को अपने बाएं पैर का एक हिस्सा खोना पड़ा था। इस गंभीर दुर्घटना के बाद भी उन्होंने अपने जीवन के सपनों को टूटने नहीं दिया और अपनी कमजोरियों को अपनी ताकत बनाया। एशियन पैरा गेम्स के दौरान उन्होंने डिस्कस थ्रो स्पर्धा में ब्रॉन्ज मेडल जीतकर यह साबित कर दिया कि शरीर का कोई अंग कम होने से हौसले कम नहीं होते।
हवलदार राकेश कुंडू
हवलदार राकेश कुंडू को भी अपने सैन्य जीवन में गंभीर चोटों और उनके बाद चलने वाले लंबे इलाज की बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ा था। लेकिन उन्होंने परिस्थितियों के आगे हार मानने के बजाय संघर्ष का रास्ता चुना और खेल के जरिए आगे बढ़ने का निर्णय लिया। निरंतर अभ्यास और कड़ी तैयारी के बाद उन्होंने डिस्कस थ्रो प्रतियोगिता में सिल्वर मेडल अपने नाम किया। उनकी यह उल्लेखनीय जीत इस बात की सबसे बड़ी गवाही देती है कि असली विजेता वही होता है जो मुश्किलों के सामने गिरने के बाद दोबारा पूरी ताकत से खड़ा होना जानता है।


















