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बाढ़ ने घर छीना, जोमैटो में डिलीवरी की, आज इस युवक की AI कंपनी 30 हजार बच्चों की मदद कर रही हैसक्सेस स्टोरी
17 जुल॰ 2026, 11:57 pm (13 दिन पहले)· 2

बाढ़ ने घर छीना, जोमैटो में डिलीवरी की, आज इस युवक की AI कंपनी 30 हजार बच्चों की मदद कर रही है

गंगा की बाढ़ में घर गंवाने से लेकर कोविड के दौरान जोमैटो की डिलीवरी करने तक, पश्चिम बंगाल के सूरज विश्वास ने कड़ा संघर्ष झेला। आज वह अपने AI स्टार्टअप के जरिए 30 हजार से ज्यादा सरकारी स्कूली बच्चों की रिसर्च में मदद कर रहे हैं।

पश्चिम बंगाल के एक गांव में आई बाढ़ ने सूरज विश्वास के बचपन का घर उजाड़ दिया था, लेकिन जिस आपदा ने परिवार को बेघर किया, उसी ने आगे चलकर सूरज की पूरी जिंदगी की दिशा बदल दी। बिजली तक न पहुंचे गांव में स्कूली पढ़ाई से लेकर देश की सबसे कठिन परीक्षाओं में से एक पास करना, महामारी के दौरान बेंगलुरु की सड़कों पर खाना डिलीवर करना और आखिर में खुद का AI स्टार्टअप खड़ा करना, सूरज की यह कहानी किसी फिल्मी स्क्रिप्ट से कम नहीं लगती। आज उनकी कंपनी देशभर के 30 हजार से ज्यादा सरकारी स्कूली बच्चों तक पहुंच चुकी है।

गंगा की बाढ़ ने बहाया घर, मामा के यहां बीता बचपन

सूरज का जन्म रानाघाट के एक आम परिवार में हुआ था। जब गंगा की बाढ़ ने उनका घर उजाड़ दिया, तो पूरा परिवार बालागढ़ में उनके मामा के घर जाकर रहने लगा। उसी गांव में, जहां उस वक्त बिजली तक नहीं पहुंची थी, सूरज की शुरुआती पढ़ाई-लिखाई हुई। इसके बाद उन्होंने चकदहा के बापूजी विद्यामंदिर से 9वीं कक्षा तक पढ़ाई की, जहां उनके मामा खुद शिक्षक के तौर पर पढ़ाते थे। हाईस्कूल के लिए वह मेदिनीपुर के एक स्कूल चले गए। सूरज को स्कूली पढ़ाई में कभी खास दिलचस्पी नहीं रही, लेकिन वह यह जरूर समझते थे कि आगे बढ़ने के लिए पढ़ाई से भागा नहीं जा सकता, इसलिए वह डटे रहे। 12वीं पूरी करने के लिए वह दोबारा बापूजी विद्यामंदिर लौट आए।

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चचेरे भाई की मौत ने रिसर्च की तरफ मोड़ दिया रास्ता

साल 2017 में सूरज के छोटे चचेरे भाई को सिस्टिक फाइब्रोसिस नाम की एक जेनेटिक बीमारी हो गई और महज तीन साल की उम्र में उसका निधन हो गया। इस हादसे ने सूरज को अंदर तक हिला दिया और तभी उन्होंने तय किया कि वह मेडिकल साइंस में, खासकर जेनेटिक्स पर रिसर्च करेंगे। यही एक फैसला आगे चलकर उनकी पूरी जिंदगी की दिशा तय करने वाला साबित हुआ।

नीट पास की, फिर भी डॉक्टर बनने से किया इनकार

मेडिकल क्षेत्र में कदम रखने के लिए नीट पास करना जरूरी था, यह बात सूरज को पता थी। इसलिए 2019 में वह कोचिंग के लिए मशहूर राजस्थान के कोटा शहर चले गए और वहीं नीट की तैयारी शुरू की। 2020 में उन्होंने 601 अंकों के साथ यह परीक्षा पास भी कर ली। लेकिन प्राइवेट मेडिकल कॉलेज की भारी-भरकम फीस भरने लायक पैसे उनके परिवार के पास नहीं थे, और वैसे भी डॉक्टर बनना उनका सपना कभी था ही नहीं। इसलिए एमबीबीएस की सीट लेने के बजाय उन्होंने रिसर्च के रास्ते पर चलने का फैसला किया।

नीट का रिजल्ट आने से पहले ही खड़ा कर चुके थे अपना एनजीओ

कम ही लोग जानते हैं कि नीट परीक्षा देने से भी पहले सूरज अपने एक दोस्त के साथ मिलकर अर्नब फाउंडेशन नाम से एक एनजीओ शुरू कर चुके थे, जो माइग्रेंट होकर आए परिवारों के बच्चों की पढ़ाई में मदद करता था। इस काम को चलाते हुए उन्हें एक जरूरी सबक मिला, कि लंबे समय तक सामाजिक जिम्मेदारी निभाने के लिए पहले खुद आर्थिक रूप से मजबूत होना पड़ता है। यही सोच उन्हें सोदेपुर के गुरु नानक इंस्टीट्यूट ऑफ फार्मास्युटिकल साइंस एंड टेक्नोलॉजी तक ले गई, जहां उन्होंने दाखिला ले लिया।

कोविड में बेंगलुरु में जोमैटो की डिलीवरी से चला गुजारा

कोरोना महामारी के दौरान जब सारी पढ़ाई ऑनलाइन हो गई, तो सूरज बेंगलुरु शिफ्ट हो गए। वहां अपना रोजमर्रा का खर्च निकालने के लिए उन्होंने जोमैटो के साथ डिलीवरी पार्टनर का काम शुरू किया और साथ ही बेंगलुरु के ही एक स्कूल में दाखिला भी ले लिया। जब लॉकडाउन खत्म हुआ, तो 2022 में सूरज वापस कोलकाता लौट आए। यहीं उन्होंने अपने तीन दोस्तों के साथ मिलकर एक स्टार्टअप शुरू किया, और यहीं से उनके कारोबारी सफर की असली शुरुआत मानी जा सकती है।

दो एडटेक ब्रांड, एक पेटेंट और रूस तक पहुंचा नाम

शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने और तकनीक के सहारे रिसर्च को बढ़ावा देने के मकसद से सूरज ने असेसली और डॉट्सिन नाम के दो ब्रांड तैयार किए। इनके जरिए सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को रिसर्च की दुनिया से जोड़ने का काम शुरू हुआ। यह स्टार्टअप भारत की तरफ से रूस में प्रदर्शित किया जा चुका है और इसे अपना पेटेंट भी मिल चुका है। इसके अलावा, शुरुआती चरण के इनोवेटर्स को सहयोग देने वाली भारत सरकार की निधि प्रयास योजना के तहत भी इस स्टार्टअप को समर्थन मिल रहा है।

25 से ज्यादा प्रोफेशनल, 30 हजार बच्चों तक पहुंच बना चुका प्लेटफॉर्म

आज सूरज की AI कंपनी में 25 से ज्यादा प्रोफेशनल काम कर रहे हैं और इसके जरिए 30 हजार से ज्यादा सरकारी स्कूली बच्चों को मदद पहुंचाई जा रही है। इनका मुख्य प्लेटफॉर्म असेसली, हाइपर-पर्सनलाइज्ड इंटेलिजेंस पर आधारित एक AI सिस्टम है। इसमें लगा LLM बिना किसी भाषाई अड़चन के जीनोमिक, न्यूरोसाइकोलॉजिकल, साइकोलॉजिकल और बिहेवियरल डेटा को इकट्ठा करता है और इसी के आधार पर छात्रों को रिसर्च करने में मदद करता है। यह प्लेटफॉर्म हर यूजर को रियल टाइम में जानकारी भी उपलब्ध कराता है। बाइक पर खाना डिलीवर करने से लेकर एक AI स्टार्टअप का फाउंडर बनने तक का यह सफर सूरज के लिए कभी आसान नहीं रहा, लेकिन उनकी लगातार मेहनत और लक्ष्य पर टिकी नजर आखिरकार उन्हें कामयाबी तक ले गई।

सवाल-जवाब

सूरज विश्वास कौन हैं?
सूरज विश्वास पश्चिम बंगाल के चकदहा से जुड़े एक युवक हैं, जिन्होंने कठिन हालात से निकलकर अपना AI स्टार्टअप खड़ा किया है।
सूरज के परिवार ने कौन सी आपदा झेली?
गंगा की बाढ़ में उनका घर बह गया था, जिसके बाद पूरा परिवार बालागढ़ में उनके मामा के घर रहने चला गया।
सूरज ने रिसर्च की तरफ जाने का फैसला क्यों किया?
2017 में उनके छोटे चचेरे भाई की सिस्टिक फाइब्रोसिस नाम की जेनेटिक बीमारी से मौत हो गई थी, जिसके बाद उन्होंने जेनेटिक्स रिसर्च में जाने का मन बना लिया।
सूरज ने नीट में कितने नंबर हासिल किए?
उन्होंने 2020 में 601 अंकों के साथ नीट परीक्षा पास की थी।
कोविड के दौरान सूरज ने पैसे कमाने के लिए क्या किया?
वह बेंगलुरु शिफ्ट हो गए और वहां अपना खर्च चलाने के लिए जोमैटो के साथ डिलीवरी पार्टनर के तौर पर काम किया।
सूरज का AI स्टार्टअप क्या करता है?
उनका प्लेटफॉर्म असेसली सरकारी स्कूलों के बच्चों को AI की मदद से रिसर्च करने में सहयोग देता है और आज 30 हजार से ज्यादा बच्चों तक पहुंच चुका है।
स्टार्टअप को किस तरह की मान्यता मिली है?
इसे भारत की तरफ से रूस में प्रदर्शित किया गया, इसे पेटेंट मिल चुका है और भारत सरकार की निधि प्रयास योजना से भी सहयोग मिल रहा है।
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