फिल्मी दुनिया का सफर
बिहार के गया जिले के बरमा गांव से ताल्लुक रखने वाले अभिनेता राजेश कुमार ने मनोरंजन जगत में अपनी एक खास जगह बनाई है। उनकी अभिनय यात्रा बचपन से शुरू हुई थी, जब गया में नर्सरी कक्षा के दौरान ही उन्होंने मंच पर कदम रखा था। अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद, राजेश कुमार मुंबई पहुंचे, जहां उन्हें शुरुआती संघर्षों और फिल्म निर्देशकों के दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़े। उनके करियर को पहली बड़ी उड़ान 'एक महल हो सपनों का' धारावाहिक से मिली।
काम और उपलब्धियां
राजेश कुमार ने टेलीविजन पर 'कुसुम', 'साराभाई बनाम साराभाई', 'घर एक मंदिर', 'कोटा फैक्ट्री' और 'खिचड़ी' जैसे मशहूर धारावाहिकों में अभिनय किया है। फिल्मों की बात करें तो, उन्होंने 'जवानी तो इश्क होना है', 'सैयारा', 'हड्डी', 'सुपर नानी' और 'स्टूडेंट ऑफ़ द ईयर 2' जैसी एक दर्जन से अधिक फिल्मों में अपनी प्रतिभा दिखाई है। उनकी हालिया रिलीज 'जवानी तो इश्क होना है' रही है और इस साल उनकी कई और फिल्में भी दर्शकों के बीच आने वाली हैं। एक समय ऐसा भी आया था जब भारी कर्ज के कारण उन्होंने एक्टिंग छोड़ने का विचार किया था, लेकिन संघर्ष के साथ वापसी कर उन्होंने सफलता हासिल की। अब वे पंकज त्रिपाठी के साथ भी एक फिल्म में नजर आने वाले हैं।
गांव और खेती की नई राह
अभिनय के साथ राजेश कुमार अपनी जड़ों से भी गहरे जुड़े हुए हैं। साल में दो-तीन बार वह अपने गांव बरमा जरूर आते हैं। राजेश कुमार ने अब गांव में खेती के क्षेत्र में एक बड़े प्रोजेक्ट की योजना बनाई है। उनका लक्ष्य आसपास के चार-पांच गांवों के किसानों को जोड़कर कृषि को बढ़ावा देना है। इस काम में मदद के लिए उनकी बहनें, जो फिनलैंड और अमेरिका में उच्च पदों पर कार्यरत थीं, अब वापस गांव आ रही हैं। राजेश कुमार ने यह भी बताया कि उनके पिता ने बिहार में जातिवाद के दौर में उनका नाम राजेश सिंह के बजाय राजेश खन्ना रखा था, जो बाद में राजेश कुमार के रूप में पहचाना गया।













