शहरी जीवनशैली में रसायनों और प्रिजर्वेटिव्स से भरे खानपान ने जब आम लोगों के स्वास्थ्य पर बुरा असर डालना शुरू किया, तब तेलंगाना की राजधानी में एक महिला ने पारंपरिक रसोई की शुद्धता को एक टिकाऊ आजीविका में बदलने का फैसला किया। हैदराबाद के कूकटपल्ली इलाके की रहने वाली दीक्षिता ने फास्ट फूड और डिब्बाबंद स्नैक्स के बढ़ते चलन के बीच शुद्ध खानपान का एक मजबूत विकल्प तैयार किया है। उन्होंने श्री रक्षा फूड्स नाम से एक घरेलू खाद्य उद्यम की शुरुआत की, जिसका बुनियादी मकसद लोगों की रोजमर्रा की थाली में पारंपरिक स्वाद और पोषण को दोबारा लौटाना है।
स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों के बाद उभरा शुद्ध खानपान का विचार
बाजार में बिकने वाले जरूरत से ज्यादा तले-भुने और रिफाइंड खाद्य पदार्थों के कारण ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, मोटापा और महिलाओं में पीसीओडी की शिकायतें आम हो चुकी हैं। इन गंभीर शारीरिक समस्याओं को नजदीक से देखने के बाद दीक्षिता ने तय किया कि वे आम जनता को ऐसा भोजन उपलब्ध कराएंगी जो हानिकारक रसायनों और अप्राकृतिक तत्वों से पूरी तरह मुक्त हो। उनकी सोच यह रही कि जिस तरह एक मां बिना किसी स्वार्थ के अपनी संतान के लिए घर में पौष्टिक भोजन पकाती है, ठीक उसी तरह का पोषक और सुरक्षित आहार समाज के प्रत्येक व्यक्ति तक पहुंचना चाहिए। इसी उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए उन्होंने अपने घरेलू उद्यम का खाका तैयार किया।
हानिकारक सामग्रियों से दूरी और किसानों से सीधा संपर्क
श्री रक्षा फूड्स की रसोई में बनने वाली किसी भी खाने-पीने की वस्तु में सफेद चीनी, मैदा, वनस्पति घी यानी डालडा, पाम ऑयल अथवा कृत्रिम रंगों की मिलावट पूरी तरह वर्जित रखी गई है। मीठे पकवानों को मिठास देने के लिए जैविक गुड़ काम में लाया जाता है, जबकि नमकीन नाश्ते तैयार करने हेतु गेहूं के आटे और लकड़ी की घानी से निकले कोल्ड-प्रेस्ड तेल का ही उपयोग होता है। भोजन बनाने की यह देसी पद्धति हृदय के स्वास्थ्य और पाचन क्रिया को दुरुस्त रखने में बेहद सहायक मानी जाती है।
मोटे अनाजों यानी मिलेट्स की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए किसी मध्यस्थ या बिचौलिए का सहारा नहीं लिया जाता। दीक्षिता स्वयं खेतों तक पहुंचती हैं और बाजरा, ज्वार तथा रागी जैसी फसलों के दानों की गुणवत्ता की बारीकी से जांच करती हैं।
लाखों की मासिक आय और सैकड़ों स्थायी ग्राहक
फिलहाल यह उद्यम लगभग 10 से 15 किसान परिवारों से सीधे कृषि उत्पाद खरीद रहा है, जिससे अन्नदाताओं को भी उनकी उपज का उचित मूल्य मिल रहा है। एक छोटे घरेलू सेटअप के तौर पर शुरू हुआ यह प्रयास अब एक मजबूत आर्थिक मॉडल बन चुका है। वर्तमान समय में इस उद्यम का मासिक टर्नओवर 1.5 से 2 लाख रुपये के आसपास पहुंच रहा है, जिसमें शुद्ध लाभ का मार्जिन 40 से 50 प्रतिशत तक रहता है।
हर महीने 300 से अधिक नियमित ग्राहक सीधे तौर पर जुड़कर इन पारंपरिक उत्पादों की खरीदारी कर रहे हैं। दीक्षिता के अनुसार, “बाजार में मुनाफा कमाने के कई रास्ते उपलब्ध हैं, लेकिन मिलावट के बिना शुद्ध ऑर्गेनिक उत्पाद उपलब्ध कराने से जो आत्मसंतुष्टि मिलती है, वही इस उद्यम की असली सफलता है।” घर-घर तक सेहतमंद नाश्ता पहुंचाने की उनकी यह पहल स्थानीय स्तर पर आत्मनिर्भरता और प्रामाणिक खानपान का सशक्त उदाहरण बन चुकी है।



















