असफलता से घबराने के बजाय उससे सीख लेकर आगे बढ़ने वाले लोग ही जीवन में मुकाम हासिल करते हैं। बिहार के भागलपुर जिले के नवगछिया के रहने वाले 31 वर्षीय सौरभ ने इस बात को पूरी तरह सच साबित कर दिखाया है। बीटेक की डिग्री हासिल करने के बाद उन्होंने एक निजी कंपनी में नौकरी की शुरुआत की थी, जहां उन्हें महीने के 35 से 40 हजार रुपये मिलते थे। हालांकि चार साल तक नौकरी करने के बाद उनका मन वहां नहीं लगा और उन्होंने कुछ अपना शुरू करने का मन बनाया। आज वह मछली पालन और हैचरी के व्यवसाय के जरिए सालाना लगभग 30 लाख रुपये का टर्नओवर हासिल कर रहे हैं।
परिवार की नाराजगी और नौकरी छोड़ने का फैसला
जब सौरभ ने अपनी अच्छी-खासी नौकरी से इस्तीफा दिया तो परिवार के सदस्यों ने खासी नाराजगी जताई। घर लौटने पर सभी का यही कहना था कि इतनी बढ़िया नौकरी छोड़कर वापस घर आने का क्या तुक बनता है। लेकिन सौरभ के मन में कुछ अलग करने की जिद्द थी और वह मछली पालन के क्षेत्र में अपना भविष्य तलाश रहे थे। उन्होंने किसी की बातों की परवाह न करते हुए अपने निर्णय पर डटे रहने का फैसला किया। इसके बाद उन्होंने सीधे मत्स्य पालन विभाग से संपर्क साधा और इस व्यवसाय से जुड़ी सभी बारीकियों और तकनीकों को सीखना शुरू कर दिया।
दो एकड़ के तालाब से की थी शुरुआत
प्रशिक्षण पूरा करने और सरकारी योजनाओं की पूरी जानकारी जुटाने के बाद सौरभ ने लगभग दो एकड़ के तालाब से इस कारोबार की नींव रखी। शुरुआती दौर में उन्हें कई तरह की मुश्किलों और चुनौतियों का सामना करना पड़ा। मछलियों की सही देखभाल करना, तालाब का उचित रखरखाव करना और उन्हें बीमारियों से बचाना जैसी चीजों को समझने में वक्त लगा। शुरुआती दौर में कुछ निराशा भी हाथ लगी लेकिन उन्होंने अपनी मेहनत में कोई कमी नहीं छोड़ी। वक्त के साथ अनुभव बढ़ता गया और उन्हें इस क्षेत्र की गहरी समझ हासिल हो गई जिसका सीधा फायदा उनके व्यवसाय को मिलने लगा।
बंगाल पर निर्भरता घटाई और शुरू की हैचरी
सिर्फ मछली पालन तक सीमित न रहकर सौरभ ने इसमें हैचरी का काम भी जोड़ दिया। मछली पालन के व्यवसाय में जीरा यानी मछली के छोटे बच्चों की भूमिका सबसे अहम होती है। पहले इस जरूरत को पूरा करने के लिए बंगाल से जीरा मंगवाना पड़ता था, लेकिन सौरभ ने अब बिहार में ही इसका बड़े पैमाने पर उत्पादन करना शुरू कर दिया है। उनके द्वारा तैयार किए गए जीरे की गुणवत्ता इतनी बेहतर है कि बाजार में इसकी मांग तेजी से बढ़ने लगी। इस सफलता ने उन्हें अपना दायरा और बढ़ाने का एक नया अवसर प्रदान किया, जिससे उन्होंने अपने तालाबों का क्षेत्रफल भी बढ़ा लिया।
अब उनका यह मछली पालन व्यवसाय करीब पांच एकड़ के क्षेत्र में फैल चुका है और उनके कारोबार का सालाना टर्नओवर लगभग 30 लाख रुपये तक पहुंच गया है। नौकरी की शुरुआत करने वाले सौरभ ने अपनी कड़ी मेहनत, अनुभव और पक्के इरादे के दम पर ग्रामीण इलाकों में स्वरोजगार की एक शानदार मिसाल कायम की है। उनकी यह सफलता उन तमाम युवाओं के लिए एक बड़ी प्रेरणा है जो कृषि और उससे जुड़े क्षेत्रों में अपना करियर बनाना चाहते हैं। सौरभ का यह सफर साफ तौर पर यह सिखाता है कि सही ट्रेनिंग, तकनीकी ज्ञान और अटूट धैर्य के साथ किसी भी पारंपरिक या नए व्यवसाय को एक बड़ा और व्यवस्थित उद्यम बनाया जा सकता है।



















