सीहोर जिले के एक छोटे से गांव से निकले मुदित शर्मा की कहानी हार न मानने की मिसाल बन गई है। लगातार 13 सरकारी परीक्षाओं में असफल होने के बाद भी उन्होंने वर्दी पहनने का सपना नहीं छोड़ा और आखिरकार 14वीं कोशिश में जेल प्रहरी के पद पर उनका चयन हो गया।
गांव से भोपाल तक का सफर
30 साल के मुदित शर्मा सीहोर जिले के सरदार नगर गांव के रहने वाले हैं। उनके पिता लीलाधर शर्मा खेती करते हैं और छोटे किसान हैं, जबकि मां रजनी घर संभालती हैं। मुदित ने 12वीं तक की पढ़ाई अपने गांव के ही सरकारी स्कूल से पूरी की। इसके बाद आगे की पढ़ाई के लिए वे भोपाल आ गए। भोपाल में रहते हुए उन्होंने परिवार की मदद के लिए पार्ट टाइम नौकरी भी की, साथ ही पढ़ाई जारी रखी और सरकारी नौकरी की तैयारी में जुट गए। यह सिलसिला 2016 में शुरू हुआ और पूरे 2023 तक चलता रहा।
एक के बाद एक 13 नाकामियां
इन आठ सालों के दौरान मुदित ने एक दर्जन से ज्यादा अलग-अलग सरकारी परीक्षाएं दीं। इनमें मध्य प्रदेश पुलिस की कांस्टेबल भर्ती से लेकर लोको पायलट तक की परीक्षाएं शामिल थीं, लेकिन हर बार किस्मत ने उनका साथ नहीं दिया। 2016 में सबसे पहले उन्होंने कांस्टेबल भर्ती की परीक्षा दी थी, जिसमें वे सिर्फ 1.46 अंकों से चूक गए। इसके बाद लोको पायलट की परीक्षा में महज पॉइंट 3 अंक से चयन नहीं हो सका। सब इंस्पेक्टर की परीक्षा में भी वे मेरिट से सिर्फ दो अंक पीछे रहकर बाहर हो गए। कभी डेढ़ अंक तो कभी पॉइंट 3 अंक की कमी उनके सपने के आड़े आती रही। इस तरह एक-एक करके उन्होंने 13 परीक्षाएं दीं और हर बार असफलता ही हाथ लगी।
बढ़ती जिम्मेदारियां, घटता नहीं हौसला
मुदित का यह सफर सिर्फ परीक्षाओं तक सीमित नहीं था। उनका सपना पूरा करने के लिए पूरा परिवार भोपाल शिफ्ट हो चुका था, जिससे आर्थिक जिम्मेदारी लगातार बढ़ रही थी। इसी दौरान मां की तबीयत भी बिगड़ गई, जिसने घर की आर्थिक स्थिति पर और दबाव डाला। एक तरफ लगातार मिल रही असफलताएं थीं, तो दूसरी तरफ परिवार की जिम्मेदारियां और मां की सेहत की चिंता। मुदित बताते हैं कि आठ साल तक उन्होंने बेहद मुश्किल दौर देखा, लेकिन इसके बावजूद उन्होंने अपने लक्ष्य से नजर नहीं हटाई और मेहनत करना जारी रखा।
14वीं कोशिश में मिली मंजिल
लगातार 13 परीक्षाओं में असफल होने के बाद भी मुदित ने हिम्मत नहीं हारी और 14वें प्रयास में जेल प्रहरी की भर्ती परीक्षा दी। इस बार आखिरकार उनका चयन हो गया। सिलेक्शन की खबर मिलते ही उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। इसके बाद सागर केंद्रीय जेल प्रशिक्षण केंद्र में उनकी पासिंग आउट परेड भी पूरी हो गई और वे विधिवत रूप से वर्दी में आ गए।
मुदित के शब्दों में
मुदित बताते हैं कि हर असफलता के बाद निराश होने की बजाय उन्होंने खुद को संभाला और दोबारा मेहनत में जुट गए। उनका कहना है कि आठ साल तक चले इस संघर्ष में कई बार हार मानने का मन हुआ, लेकिन परिवार की उम्मीदें और खुद का सपना उन्हें आगे बढ़ने की ताकत देते रहे। आज मुदित शर्मा उन तमाम युवाओं के लिए मिसाल बन गए हैं, जो बार-बार असफलता मिलने पर सरकारी नौकरी की तैयारी छोड़ने का मन बना लेते हैं।













