मध्य प्रदेश के कसरावद में जब प्रफुल पटेल ने एग्रीकल्चर डेवलपमेंट ऑफिसर (ADO) के पद पर कार्यभार संभाला, तो यह सफलता केवल एक प्रतियोगी परीक्षा पास करने तक सीमित नहीं थी। इस उपलब्धि के पीछे खंडवा शहर के पदम कुंड मोहल्ले से जुड़ी त्याग, समर्पण और अटूट स्नेह की एक अनूठी कहानी है। वर्ष 2003 में जन्म के कुछ ही महीनों बाद जब प्रफुल के सिर से मां का साया उठ गया, तब उनकी चचेरी बहन अंतिम बाला पटेल ने न केवल मां का दुलार दिया बल्कि उनके भविष्य को संवारने का संकल्प भी लिया। भाई की पढ़ाई का खर्च उठाने के लिए अंतिम बाला ने अपने घर में टिफिन सेंटर शुरू किया और दिन-रात कड़ा परिश्रम करके प्रफुल को इस मुकाम तक पहुंचाया।
बचपन का संकट और बहन का संकल्प
साल 2003 में प्रफुल पटेल का जन्म हुआ था, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। जन्म के महज कुछ महीनों बाद ही उनकी मां का देहांत हो गया। इतनी छोटी उम्र में मां को खो देना पूरे परिवार के लिए एक अत्यंत कठिन दौर था। पिता ने परिवार की देखभाल करने का पूरा प्रयास किया, परंतु एक नवजात शिशु को जिस ममता और निरंतर देखभाल की आवश्यकता थी, उसकी भरपाई करना आसान नहीं था। ऐसे नाजुक समय में चचेरी बहन अंतिम बाला पटेल आगे आईं और उन्होंने अपने नन्हें भाई की पूरी जिम्मेदारी अपने कंधों पर ले ली। उन्होंने बहन का रिश्ता निभाने के साथ-साथ मां की भूमिका भी निभाई और मन में यह दृढ़ निश्चय किया कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन हों, वह प्रफुल को शिक्षित बनाकर अपने पैरों पर खड़ा करेंगी।
बंधाना नवोदय विद्यालय से इंदौर के होलकर कॉलेज तक का सफर
प्रफुल पटेल बचपन से ही मेधावी छात्र रहे। उनकी प्रारंभिक शिक्षा गांव के स्कूल में संपन्न हुई। उनकी प्रतिभा का पहला बड़ा प्रमाण तब सामने आया जब छठी कक्षा में उनका चयन बंधाना नवोदय विद्यालय के लिए हो गया। नवोदय विद्यालय में प्रवेश मिलना प्रफुल के शैक्षणिक जीवन का एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ। वहां से अपनी स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने उच्च शिक्षा की ओर कदम बढ़ाया और इंदौर के प्रसिद्ध होलकर कॉलेज में दाखिला लिया। होलकर कॉलेज से प्रफुल ने B.Sc. की डिग्री सफलतापूर्वक प्राप्त की। जैसे-जैसे प्रफुल की पढ़ाई का दायरा बढ़ता गया, वैसे-वैसे उनकी शैक्षणिक जरूरतों और वित्तीय खर्चों में भी बढ़ोतरी होती चली गई, जिसकी चिंता लगातार अंतिम बाला को बनी रहती थी।
टिफिन सर्विस से बनी सफलता की राह
भाई की उच्च शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में पैसों की तंगी बाधा न बने, इसके लिए अंतिम बाला पटेल ने एक व्यावहारिक रास्ता निकाला। उन्होंने खंडवा के पदम कुंड स्थित अपने घर में ही टिफिन सेंटर की शुरुआत की। उनकी दिनचर्या बेहद कठिन हो गई थी। सुबह तड़के उठकर भोजन तैयार करना, डिब्बों में खाना पैक करना और समय पर ग्राहकों तक पहुंचाना उनका नित्य का काम बन गया। दिन भर की हाड़-तोड़ मेहनत के बाद भी उन्होंने कभी इस काम को अपने ऊपर बोझ नहीं समझा। उनके लिए यह टिफिन सेंटर केवल जीविका चलाने का साधन नहीं था, बल्कि भाई के सपनों को साकार करने की एक मजबूत सीढ़ी था। प्रफुल जब 2017 में आगे की पढ़ाई के लिए खंडवा आए, तब इस टिफिन सेंटर की कमाई परिवार का सबसे बड़ा आर्थिक आधार बनी। पढ़ाई के खर्च के साथ-साथ अंतिम बाला ने हमेशा अपने भाई का मनोबल बढ़ाए रखा।
कसरावद में ADO पद पर चयन और महिलाओं के लिए प्रेरणा
कठिन परिश्रम, बहन के निरंतर प्रोत्साहन और सही मार्गदर्शन के बल पर प्रफुल पटेल ने प्रतियोगी परीक्षा में शानदार सफलता हासिल की। वर्तमान में वह मध्य प्रदेश के कसरावद में एग्रीकल्चर डेवलपमेंट ऑफिसर के पद पर अपनी सेवाएं दे रहे हैं। प्रफुल अपनी इस सफलता का पूरा श्रेय अपनी बहन को देते हैं, जिन्होंने उन्हें कभी मां की कमी महसूस नहीं होने दी। दूसरी ओर, अंतिम बाला पटेल अपनी इस भूमिका को कोई बड़ा त्याग मानने के बजाय अत्यंत सहजता से लेती हैं। अंतिम बाला पटेल का कहना है, "मैंने तो सिर्फ प्रफुल का साथ दिया और उसे रास्ता दिखाया।" भाई के एक बड़े प्रशासनिक पद पर आसीन होने के बाद भी अंतिम बाला ने अपना टिफिन सेंटर बंद नहीं किया है। वह आज भी पूरी लगन के साथ अपना काम कर रही हैं। उनके इस स्वावलंबन और संघर्ष को देखकर क्षेत्र की कई अन्य महिलाएं भी प्रेरित हुई हैं और उन्होंने आत्मनिर्भर बनने के लिए अपने छोटे-छोटे कुटीर व्यवसाय शुरू किए हैं।
भावनाओं की बुनियाद पर टिका अटूट रिश्ता
अंतिम बाला पटेल और प्रफुल पटेल की यह गाथा केवल दो रिश्तेदारों के बीच की कहानी नहीं है, बल्कि यह उन मानवीय भावनाओं का प्रमाण है जो खून के रिश्तों से भी परे जाकर मजबूत होती हैं। एक बहन ने जहां मां की अनुपस्थिति को कभी महसूस नहीं होने दिया, वहीं भाई ने भी बहन के पसीने की हर बूंद का सम्मान करते हुए अपनी मेहनत से सफलता का शिखर छुआ। आज जब प्रफुल कसरावद में अधिकारी की कुर्सी पर बैठकर अपनी प्रशासनिक जिम्मेदारियों का निर्वहन करते हैं, तो उस पद के पीछे उनकी अपनी लगन के साथ-साथ उस बहन के हाथों की मेहनत भी साफ झलकती है जिसने टिफिन बनाकर एक सपने को हकीकत में बदला।



















