श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का त्योहार आते ही देशभर के बाजारों में लड्डू गोपाल के परिधान, झूले, सिंहासन और सजावटी सामानों की मांग में जबरदस्त बढ़ोतरी देखने को मिलती है। उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले में स्थित अंबेहटा पीर कस्बे के निवासी अंकुर कुमार के लिए यह पर्व भक्ति के साथ-साथ एक बहुत बड़ी व्यावसायिक सफलता का प्रतीक बन चुका है। कभी अपने पिता के साथ पारंपरिक लकड़ी के फर्नीचर के निर्माण में जूझ रहे अंकुर ने अपने कारखाने में पड़े बेकार रॉ मटेरियल से कान्हा जी का एक छोटा सा झूला तैयार किया था। उस एक प्रयोग ने उनके परिवार के आर्थिक हालातों को पूरी तरह बदलकर रख दिया। आज उनका परिवार लड्डू गोपाल के सिंहासन, झूले और बेड बनाकर हर महीने लाखों रुपये की कमाई कर रहा है।
पारंपरिक फर्नीचर के कारोबार में आर्थिक तंगी और वृंदावन की यात्रा
अंकुर कुमार और उनके पिता कई वर्षों तक सामान्य घरेलू फर्नीचर बनाने का काम करते थे। हालांकि इस काम से होने वाली आय इतनी कम थी कि परिवार का दैनिक खर्च चलाना भी चुनौतीपूर्ण हो गया था। अंकुर का परिवार शुरू से ही भगवान श्रीकृष्ण का परम भक्त रहा है। लगभग सात साल पहले उनका पूरा परिवार धार्मिक दर्शन के लिए वृंदावन गया था। वहां से लौटते समय वे अपने साथ कान्हा जी (लड्डू गोपाल) की एक सुंदर मूर्ति घर लेकर आए। घर में मूर्ति स्थापित करने के बाद उनके सामने कान्हा जी के बैठने और विश्राम के लिए उचित व्यवस्था करने का प्रश्न उठा। बाजार से महंगा सिंहासन खरीदने के बजाय अंकुर ने अपनी कारपेंट्री कला का उपयोग करने का निर्णय लिया।
बचे हुए रॉ मटेरियल से पहला झूला और पड़ोसियों की मांग
अंकुर ने अपने फर्नीचर कारखाने में बचे हुए लकड़ी के टुकड़ों, प्लाईवुड और कपड़े के कतरनों को इकट्ठा किया। इन सामान्य सामग्रियों का उपयोग करके उन्होंने अपने घर के कान्हा जी के लिए एक बेहद आकर्षक और मजबूत झूला तैयार किया। जब आसपास के पड़ोसियों और रिश्तेदारों ने उनके घर आकर वह हस्तनिर्मित झूला देखा, तो वे उसकी बारीकी और सुंदरता से बहुत प्रभावित हुए। जल्द ही कुछ पड़ोसियों ने अंकुर से अपने कान्हा जी के लिए भी वैसा ही झूला बनाने का अनुरोध किया। अंकुर ने खुशी-खुशी उनके लिए भी झूले तैयार कर दिए। इसके बाद मुंह जबानी प्रचार के माध्यम से यह बात धीरे-धीरे पूरे इलाके में फैल गई और आसपास के लोगों से झूले तथा सिंहासन के ऑर्डर आने शुरू हो गए।
पुराना काम बंद कर स्थापित किया विशेष हस्तशिल्प व्यापार
लड्डू गोपाल के आसनों और झूलों की लगातार बढ़ती मांग को देखते हुए अंकुर और उनके परिवार ने एक बड़ा फैसला लिया। उन्होंने घाटे में चल रहे अपने सामान्य फर्नीचर के काम को पूरी तरह बंद कर दिया और अपना पूरा ध्यान कान्हा जी के बेड, झूलों और सिंहासनों के निर्माण पर केंद्रित कर दिया। पिछले छह वर्षों से वे नियमित रूप से इस काम को व्यावसायिक स्तर पर अंजाम दे रहे हैं। आज स्थिति यह है कि त्योहारी सीजन में मांग इतनी अधिक हो जाती है कि परिवार के सभी सदस्य मिलकर भी दिन-रात काम करके ऑर्डर पूरे नहीं कर पाते। सहारनपुर के अलावा उनके बनाए सामान की आपूर्ति ऋषिकेश, दिल्ली, करनाल और पड़ोसी राज्यों के विभिन्न शहरों में की जाती है।
उत्पादों की विविधता, सामग्री और मूल्य दायरा
अंकुर कुमार द्वारा तैयार किए जाने वाले कान्हा जी के सिंहासनों और झूलों की श्रेणी 7 इंच से लेकर 3 से 4 फीट तक के विशाल आकारों में उपलब्ध है। वे ग्राहकों की पसंद और बजट के अनुसार कई अलग-अलग डिजाइनों में इन सामानों का निर्माण करते हैं। इन उत्पादों को तैयार करने के लिए मुख्य रूप से अच्छी गुणवत्ता की लकड़ी, प्लाईवुड, रंग-बिरंगे कपड़ों, सजावटी शीशों (दर्पण) और बिडिंग सामग्री का इस्तेमाल किया जाता है। इनकी शुरुआती कीमत मात्र 150 रुपये से शुरू होकर 5,000 से 6,000 रुपये तक जाती है। जन्माष्टमी के सीजन से महीनों पहले ही अधिकांश स्टॉक की एडवांस बुकिंग हो जाती है, जिससे कारखाने में सामान तैयार होते ही तुरंत डिलीवर हो जाता है।



















