सोशल मीडिया पर इन दिनों अस्सी के दशक की पुरानी यादों और रेट्रो स्टाइल का एक नया दौर तेजी से लोकप्रिय हो रहा है। लोग चैटजीपीटी के इमेज जनरेशन टूल्स का उपयोग करके उस दौर के स्टूडियो पोर्ट्रेट, पुरानी फिल्मों के पोस्टरों और पुराने पारिवारिक फोटो एलबम जैसी विजुअल तस्वीरें तैयार कर रहे हैं। इस अनोखे ट्रेंड के जरिए उपयोगकर्ता विशेष रूप से दक्षिण भारतीय राज्यों की संस्कृति, पहनावे और माहौल को दर्शाने वाली तस्वीरें बना रहे हैं, जिनमें उस समय के कपड़े, केशविन्यास, पृष्ठभूमि और रंग-रूप पूरी तरह से नजर आते हैं।
कर्नाटक और तमिलनाडु की रेट्रो तस्वीरें बनाने के तरीके
कर्नाटक की अस्सी के दशक की शैली को रीक्रिएट करने के लिए उपयोगकर्ता एक खास प्रॉम्प्ट का इस्तेमाल कर सकते हैं। इसके तहत तस्वीर को एक पारंपरिक सिल्क साड़ी और बालों में गजरे के साथ एक कन्नड़ सिनेमा के पोस्टर जैसा लुक दिया जा सकता है। इसके अलावा, बेंगलुरु और मैसूर के पुराने फोटो स्टूडियो की तरह हल्के रंग के पर्दे, गर्म और फैली हुई रोशनी और थोड़े धुंधले विंटेज टेक्सचर का उपयोग किया जाता है। ठीक इसी तरह, तमिलनाडु शैली के लिए लोग कांजीवरम सिल्क साड़ी, पारंपरिक मंदिर के आभूषण और चमेली के फूलों से सजे बालों का जिक्र कर सकते हैं, जिसमें चेन्नई के पुराने स्टूडियो की याद दिलाने वाली सेपिया या सुनहरे घंटे की टोन और विंटेज फिल्म-ग्रेन फिनिश मिलती है।
केरल और आंध्र प्रदेश के लिए खास प्रॉम्प्ट की तकनीक
केरल की शैली को जीवंत करने के लिए एक अलग तरह के विवरण की आवश्यकता होती है, जिसमें पारंपरिक कासावु साड़ी, नारियल के पेड़ या केरल के पारंपरिक लकड़ी के घरों की पृष्ठभूमि शामिल होती है। इसमें प्राकृतिक और मिट्टी जैसे रंगों के साथ हल्की धूप और अस्सी के दशक के मलयालम पारिवारिक चित्रों जैसी सेपिया टोन का प्रभाव मिलता है। वहीं, आंध्र प्रदेश शैली की तस्वीरों के लिए पोचमपल्ली या गडवाल सिल्क साड़ी और भारी मंदिर शैली के आभूषणों का उपयोग किया जाता है। तेलुगु सिनेमा के पुराने दौर से प्रेरित इस स्टूडियो बैकग्राउंड में गहरे लाल, मैरून और सुनहरे रंगों के साथ नाटकीय रोशनी और क्लासिक फोटो-स्टूडियो टेक्सचर का मिश्रण होता है।
बेहतर परिणाम के लिए स्पष्ट संदर्भ और निर्देश
इन तस्वीरों में अधिक सटीक और व्यक्तिगत परिणाम प्राप्त करने के लिए उपयोगकर्ताओं को एक साफ संदर्भ फोटो अपलोड करना जरूरी होता है। इसके साथ ही कपड़े, हेयर स्टाइल, क्षेत्र और पृष्ठभूमि के बारे में विस्तृत जानकारी देनी पड़ती है, क्योंकि केवल अस्सी के दशक की शैली लिखने भर से सही परिणाम नहीं मिलते हैं। जितनी सटीक जानकारी और निर्देश दिए जाते हैं, आउटपुट उतना ही बेहतर और संबंधित क्षेत्रीय सौंदर्यशास्त्र के करीब बैठता है।



















