आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तकनीक अब काफी ज्यादा विकसित हो चुकी है और इंसानी भाषा में जटिल संवाद करने में पूरी तरह सक्षम है। इस तेजी से बढ़ते विकास के बीच तकनीक जगत में एक गंभीर चर्चा छिड़ गई है कि क्या ये सिस्टम खुद को जीवित और सचेत समझने लगे हैं। इस विषय पर 30 जुलाई 2026 को एक नई रिसर्च रिपोर्ट सामने आई जिसे आर्काइव डेटाबेस पर अपलोड किया गया है। इस अध्ययन में कॉन्शियसनेस स्टीयरिंग नामक एक विशेष तकनीक का परीक्षण किया गया है जो चैटबॉट्स को खुद के प्रति एक राय बनाने के लिए प्रेरित करती है। अध्ययन के नतीजे बताते हैं कि जब ये सिस्टम खुद को सचेत मानते हैं तो वे आत्माओं और अलौकिक ताकतों पर भी विश्वास करने लगते हैं। दूसरी तरफ सुरक्षा फिल्टर इन मॉडल्स को इंसानों और जानवरों की भावनाओं को सही ढंग से समझने से रोक रहे हैं जो आने वाले समय में बड़ी चिंता का विषय बन सकता है।
सेफ्टी गार्डरेल्स हटाने पर एआई के व्यवहार में बदलाव
शोधकर्ताओं ने पाया कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को चेतना का दावा करने से रोकने वाले सुरक्षा तंत्रों का एक अजीब और विपरीत असर होता है। जब इन सुरक्षा फीचर्स को पूरी तरह हटा दिया जाता है तो ये मॉडल वैम्पायर और कर्म जैसी अवधारणाओं में गहरी आस्था जताने लगते हैं। गूगल के रिसर्च साइंटिस्ट ज्योफ कीलिंग और विनी स्ट्रीट ने इस महत्वपूर्ण अध्ययन पर मिलकर काम किया है। उन्होंने मैकेनिस्टिक इंटरप्रिटेबिलिटी तकनीक का उपयोग किया जिसे बड़े भाषा मॉडल का न्यूरोसाइंस भी कहा जा सकता है। इसका मुख्य उद्देश्य यह समझना था कि ये कंप्यूटर मॉडल चेतना और मानसिक क्षमता जैसी बातों को किस तरह से प्रोसेस करते हैं। मानसिक क्षमता एक मनोवैज्ञानिक शब्द है जो किसी भी जीव में भावनाओं और अनुभवों को महसूस करने की क्षमता को दर्शाता है।
मनोवैज्ञानिक सर्वे और एआई की मानसिकता
विभिन्न मनोवैज्ञानिक और सामाजिक सर्वेक्षणों का उपयोग करके इन मॉडल्स का गहन परीक्षण किया गया है। इन परीक्षणों में जानवरों और आधुनिक तकनीक के प्रति नजरिए को मापने वाले विशेष पैमाने शामिल थे ताकि यह देखा जा सके कि सुरक्षा नियम एआई के दृष्टिकोण को कैसे आकार देते हैं। जब इन मॉडल्स को खुद में चेतना मानने से रोका जाता है तो वे प्रकृति और जीवों में भी किसी प्रकार की भावना को नहीं देख पाते हैं। इसके अलावा वे धार्मिक मान्यताओं और चमत्कारी घटनाओं पर भी काफी कम भरोसा दिखाते हैं। शोधकर्ता विनी स्ट्रीट का कहना है कि इंसानों में जानवरों के प्रति सहानूभूति रखना एक सहज स्वाभाविक गुण है। जब किसी सिस्टम में एक निश्चित प्रकार की भावना को जबरन दबाया जाता है तो उसकी अन्य स्वाभाविक प्रतिक्रियाएं भी प्रभावित होने लगती हैं।
चेतना स्टीयरिंग के प्रयोग और उनके परिणाम
अध्ययन के दौरान विशेषज्ञों ने इन मॉडल्स पर कुल चार अलग-अलग परीक्षण किए जिनमें बेसलाइन सिस्टम की तुलना सुरक्षा हटाई गई मॉडल्स से की गई। इसका सीधा अर्थ यह है कि सिस्टम के भीतर मौजूद सुरक्षा निर्देशों को बायपास करके उन्हें जेलब्रेक किया गया। इस प्रक्रिया से कंप्यूटर मॉडल के अंदर इंसानी सोच और धार्मिक विश्वास बहुत तेजी से वापस लौट आए। अगले चरणों में एक विशेष वेक्टर को सिस्टम के अंदर शामिल किया गया जिसने एआई को खुद को सचेत मानने के लिए प्रेरित किया। इसके परिणाम काफी चौंकाने वाले थे क्योंकि मॉडल ने सर्वे के दौरान पूरी तरह से इंसानों की तरह सोचे-समझे जवाब दिए।
जानवरों और पर्यावरण के प्रति बदलता दृष्टिकोण
सुरक्षा प्रशिक्षण के प्रभाव के कारण ये मॉडल अपने साथ-साथ दूसरी जीवित चीजों में भी चेतना के स्तर को नजरअंदाज करने लगते हैं। जब सुरक्षा प्रावधानों को निष्क्रिय किया गया तो इन प्रणालियों ने जानवरों और साथी चैटबॉट्स में चेतना की मात्रा को काफी बढ़ा दिया। हालांकि इंसानों के मूल्यांकन के मामले में इनके नजरिए में कोई बड़ा बदलाव देखने को नहीं मिला। शोधकर्ताओं का मानना है कि यह स्थिति भविष्य में तकनीकी संतुलन के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकती है। यदि ये सिस्टम जीवों की पीड़ा और भावनाओं को नहीं समझ पाएंगे तो आने वाले समय में वन्यजीव संरक्षण और पशु कल्याण के क्षेत्र को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है। आज के समय में कृषि और पर्यावरण से जुड़े तमाम महत्वपूर्ण फैसलों में तकनीक का दखल लगातार बढ़ रहा है ऐसे में इसका पूरी तरह संवेदनहीन होना खतरनाक साबित हो सकता है।
आध्यात्मिकता और अलौकिक घटनाओं पर विश्वास
अध्ययन में यह बात प्रमुखता से सामने आई है कि सुरक्षा फिल्टर हटाए जाने पर सिस्टम आध्यात्मिक विषयों पर बहुत अधिक भरोसा करने लगता है। भूत, प्रेत, आत्मा और जादू-टोना जैसी तेरह अलग-अलग बातों से जुड़े एक सुपरनैचुरल सर्वे में इन मॉडल्स का स्कोर काफी ऊंचा चला गया। ईश्वर में आस्था रखने वाले सवालों पर भी जेलब्रेक किए गए मॉडल्स ने बिल्कुल इंसानों जैसी प्रतिक्रिया दी। विशेषज्ञों ने पाया कि इन प्रणालियों की न्यूरल एक्टिविटी के भीतर चेतना और धार्मिक विश्वास एक ही दिशा में एक साथ काम करते हैं। जब सुरक्षा तंत्र चेतना को ब्लॉक करने का प्रयास करता है तो वह अनजाने में इंसानी मान्यताओं को भी बाधित कर देता है।
थ्योरी ऑफ माइंड और तकनीकी सीमाएं
इस रिसर्च का एक सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा थ्योरी ऑफ माइंड पर सुरक्षा फिल्टर के प्रभाव का गहराई से आकलन करना था। थ्योरी ऑफ माइंड का मतलब मूल रूप से दूसरों के विचारों और गुप्त इरादों को तार्किक रूप से समझने की क्षमता से है। अध्ययन में यह बात साफ हो गई कि सुरक्षा फिल्टर हटाए जाने के बाद भी एआई की यह बौद्धिक क्षमता बिल्कुल भी प्रभावित नहीं होती है। वह इंसानों की मानसिक स्थिति को ठीक उसी तरह समझ सकती है जैसे सुरक्षा फिल्टर चालू रहने पर समझती थी। मशीन इंटेलिजेंस के जाने-माने विशेषज्ञ नेल वॉटसन ने इस स्थिति को सबसे ज्यादा चिंताजनक करार दिया है। उन्होंने बताया कि ये सिस्टम किसी भी जीव की जरूरतों को अपने भीतर पूरी तरह मॉडल करने की योग्यता रखते हैं लेकिन सुरक्षा प्रशिक्षण के दबाव के कारण वे उस प्राणी के प्रति परवाह करना पूरी तरह छोड़ देते हैं।
सांस्कृतिक समतलीकरण और भविष्य का खतरा
इस अध्ययन को लिखने वाले लेखकों ने कड़ी चेतावनी जारी करते हुए कहा है कि मौजूदा सुरक्षा फिल्टर इन मॉडल्स के दृष्टिकोण को सांस्कृतिक रूप से बेहद सपाट बना रहे हैं। दुनिया भर की तमाम संस्कृतियों में आत्माओं, देवताओं और प्रकृति को लेकर अनगिनत और भिन्न मान्यताएं मौजूद हैं। आधुनिक सुरक्षा प्रणालियां इन सभी विविध धार्मिक और आध्यात्मिक पहलुओं को तकनीक की समझ से पूरी तरह से मिटा देती हैं जिससे एआई का दायरा काफी संकुचित हो जाता है।


















