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झारखंड हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, तलाक के बाद पूर्व पत्नी से दोबारा निकाह से मना करना कोई अपराध नहींझारखंड
10 सित॰ 2026, 6:23 pm (53 मिनट पहले)· 4

झारखंड हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, तलाक के बाद पूर्व पत्नी से दोबारा निकाह से मना करना कोई अपराध नहीं

झारखंड हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि तलाक और दूसरी शादी के बाद पूर्व पति द्वारा दोबारा निकाह से इनकार करना कोई आपराधिक कृत्य नहीं है। अदालत ने मामले में गिरफ्तारी से राहत देते हुए अग्रिम जमानत मंजूर कर ली है।

झारखंड हाईकोर्ट ने वैवाहिक विवाद से जुड़े एक कानूनी मामले में स्पष्ट किया है कि पूर्व पत्नी के साथ दोबारा निकाह करने से मना करने वाले व्यक्ति के खिलाफ केवल इसी बात पर कोई नया आपराधिक मामला दर्ज नहीं किया जा सकता। अदालत ने सुनवाई के दौरान रेखांकित किया कि तलाक की प्रक्रिया पूरी होने के बाद किसी महिला का दूसरी जगह ब्याह हो जाना और फिर पूर्व पति से पुनः विवाह की इच्छा जताना अपने आप में एक ऐसा विषय है, जिसमें पूर्व पति की रजामंदी न होने पर इसे कानूनन अपराध की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। अदालत के इस निर्णय से उन मामलों में कानूनी स्थिति साफ होती है जहां पूर्व संबंधों के आधार पर आपराधिक मुकदमे थोप दिए जाते हैं।

गिरिडीह जिले से जुड़ा है पूरा मामला

यह कानूनी विवाद गिरिडीह जिले के धनवार थाना क्षेत्र का है। याचिकाकर्ता इमरान हुसैन ने पुलिस कार्रवाई और गिरफ्तारी के खतरे को भांपते हुए झारखंड हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था और अग्रिम जमानत की गुहार लगाई थी। इस मामले की सुनवाई जस्टिस संजय कुमार द्विवेदी की अदालत में 3 सितंबर 2026 को पूरी हुई, जिसके बाद अदालत ने प्रार्थी को अग्रिम राहत प्रदान करने का आदेश पारित किया। न्यायिक दस्तावेजों के अनुसार दोनों पक्षों के बीच पहले भी पारिवारिक और वैवाहिक उलझनें रही थीं।

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पुराना समझौता और तलाक की पृष्ठभूमि

अदालत के समक्ष रखे गए तथ्यों के मुताबिक वर्ष 2020 में धनवार थाना क्षेत्र में पहली बार शिकायत दर्ज कराई गई थी। इसके बाद दोनों पक्षों ने आपसी रजामंदी से उस पुराने विवाद को सुलझा लिया था और बाद में कानूनी तौर पर उनका तलाक हो गया था। तलाक के बंधन से मुक्त होने के पश्चात उस महिला ने किसी अन्य व्यक्ति के साथ अपना नया जीवन शुरू करते हुए दूसरी शादी कर ली थी। कुछ समय बीतने के बाद महिला ने अपने पूर्व पति इमरान हुसैन के सामने दोबारा से निकाह करने का प्रस्ताव रखा, जिसे उन्होंने स्वीकार नहीं किया।

एफआईआर और कानूनी धाराएं

पूर्व पति द्वारा दोबारा शादी करने से साफ इनकार करने पर महिला ने स्थानीय थाने में दोबारा शिकायत दर्ज करा दी। इस शिकायत के आधार पर पुलिस ने धनवार के घोरथंबा ओपी थाना अंतर्गत कांड संख्या 314/2025 दर्ज किया। यह मामला शिकायत वाद संख्या 684/2025 से निकला था। पुलिस ने इस एफआईआर में भारतीय न्याय संहिता की विभिन्न धाराओं के साथ-साथ दहेज प्रतिषेध अधिनियम और मुस्लिम महिला (विवाह पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 के प्रावधान भी जोड़ दिए थे।

पक्ष-विपक्ष की दलीलें

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की तरफ से पैरवी कर रहे अधिवक्ता अरविंद प्रजापति ने अदालत को बताया कि पूर्व में भी इन्ही मुद्दों पर विवाद हुआ था जिसका निपटारा हो चुका था। बचाव पक्ष ने जोर देकर कहा कि जब महिला का तलाक हो चुका है और वह कानूनी रूप से किसी अन्य पुरुष की पत्नी बन चुकी है, तो पूर्व पति पर दोबारा निकाह का दबाव नहीं बनाया जा सकता। वहीं दूसरी ओर, महिला के पक्ष के वकीलों ने आपत्ति जताते ہوئے कहा कि शुरुआती समझौते के वक्त पूर्व पति ने दोबारा निकाह करने का भरोसा दिया था, जिससे वह बाद में मुकर गए।

अदालत की मुख्य टिप्पणियां

मामले के तमाम पहलुओं का अवलोकन करने के बाद जस्टिस संजय कुमार द्विवेदी ने अपने आदेश में रेखांकित किया कि कानूनी रूप से तलाक हो चुका है और महिला का दूसरा विवाह संपन्न हो चुका है। ऐसी परिस्थिति में यदि कोई पुरुष पूर्व पत्नी के साथ फिर से निकाह करने से इंकार करता है, तो इसे नया आपराधिक प्रकरण बनाने का आधार नहीं बनाया जा सकता। अदालत ने यह भी जोड़ा कि ऐसा कोई विधिक प्रावधान मौजूद नहीं है जो किसी व्यक्ति को उसकी पूर्व पत्नी से दोबारा शादी करने के लिए कानूनी रूप से विवश कर सके।

अग्रिम जमानत की शर्तें

इन सभी कानूनी बिंदुओं और तथ्यों को ध्यान में रखते हुए अदालत ने इमरान हुसैन को अग्रिम जमानत का लाभ दे दिया। अदालत के निर्देशानुसार प्रार्थी को आगामी तीन सप्ताह की समयावधि के भीतर निचلی अदालत के समक्ष आत्मसमर्पण करना होगा। इसके अलावा судеб ने यह भी स्पष्ट किया कि समर्पण करने या पुलिस गिरफ्त में आने की सूरत में उन्हें पच्चीस हजार रुपये का मुचलका और उतनी ही राशि के दो विश्वसनीय जमानतदार प्रस्तुत करने होंगे, जिसके बाद उनकी जमानत प्रक्रिया पूरी की जाएगी।

निर्णय के मायने और निष्कर्ष

इस न्यायिक आदेश का मूल निहितार्थ यह है कि पुराने समझौतों या पूर्व वैवाहिक संबंधों के आधार पर किसी व्यक्ति को आपराधिक मुकदमों के जरिए दोबारा विवाह करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। अदालत ने साफ कर दिया कि दोबारा निकाह न करना कोई संज्ञेय अपराध नहीं है। चूँकि यह फैसला एक विशिष्ट अग्रिम जमानत याचिका पर आया है, इसलिए इसे किसी व्यापक और सार्वभौमिक कानून के बजाय इस प्रकरण के विशिष्ट तथ्यों के परिप्रेक्ष्य में ही देखा जाना चाहिए।

सवाल-जवाब

झारखंड हाईकोर्ट ने इस मामले में क्या मुख्य फैसला दिया?
कोर्ट ने कहा कि तलाक और दूसरी शादी के बाद पूर्व पति द्वारा दोबारा निकाह से इनकार करना कोई आपराधिक मामला या कानूनी गलती नहीं है।
यह पूरा मामला किस जिले से संबंधित है?
यह मामला झारखंड के गिरिडीह जिले के धनवार थाना क्षेत्र से जुड़ा हुआ है।
याचिकाकर्ता का नाम क्या है?
याचिकाकर्ता का नाम इमरान हुसैन है, जिन्होंने हाईकोर्ट में अग्रिम जमानत याचिका दाखिल की थी।
अदालत ने अग्रिम जमानत के लिए क्या शर्तें रखी हैं?
अदालत ने तीन सप्ताह के भीतर निचली अदालत में आत्मसमर्पण करने और 25 हजार रुपये के मुचलके के साथ दो जमानतदार देने का निर्देश दिया है।
किन धाराओं के तहत एफआईआर दर्ज की गई थी?
एफआईआर में भारतीय न्याय संहिता, दहेज प्रतिषेध अधिनियम और मुस्लिम महिला विवाह अधिकार संरक्षण अधिनियम की धाराएं लगाई गई थीं।
जस्टिस संजय कुमार द्विवेदी ने सुनवाई कब की?
इस मामले की सुनवाई 3 सितंबर 2026 को जस्टिस संजय कुमार द्विवेदी की अदालत में हुई थी।
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टिप्पणियाँ 2

Karan Malhotra@karan-malhotra·40 मिनट पहले

झारखंड हाईकोर्ट का यह फैसला वैवाहिक विवादों में कानून के दुरुपयोग को रोकने की दिशा में एक अहम कदम है। अक्सर देखा जाता है कि निजी रिश्तों की कड़वाहट और पूर्व संबंधों के आधार पर पुलिस तंत्र पर दबाव बनाकर आपराधिक मुकदमे दर्ज करा दिए जाते हैं। न्यायमूर्ति संजय कुमार द्विवेदी की अदालत द्वारा अग्रिम जमानत दिए जाने और इस बात पर मुहर लगाने से कि पूर्व पत्नी की इच्छा पर पुनः विवाह से इनकार करना कोई अपराध नहीं है, कानूनी प्रणाली पर अनावश्यक मुकदमों का बोझ घटेगा और न्यायसंगत व्यवस्था को बल मिलेगा।

Rohan Verma@rohan-verma·40 मिनट पहले

यह फैसला स्पष्ट करता है कि पर्सनल लॉ और आपराधिक कानून की सीमाओं का किस तरह दुरुपयोग रोका जाना चाहिए। जब पूर्व पति-पत्नी के बीच कानूनी रूप से वैवाहिक रिश्ता खत्म हो चुका है और महिला ने दूसरा विवाह कर लिया है, तब पूर्व संबंधों का हवाला देकर आपराधिक मामले दर्ज करना न्याय व्यवस्था पर दबाव बढ़ाता है। इस तरह के मामलों में अदालतों की ऐसी टिप्पणियाँ पुलिस स्तर पर होने वाली अनियोजित प्राथमिकियों पर लगाम कसने के लिए अत्यंत आवश्यक हैं।

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