भारत की राष्ट्रीय साइबर सुरक्षा एजेंसी सीईआरटी-इन को एंथ्रोपिक के आधुनिक मिथॉस एआई मॉडल का एक्सेस मिल गया है। आईटी मंत्रालय के सूत्रों के मुताबिक, सुरक्षा एजेंसी इस शक्तिशाली टूल का इस्तेमाल बेहद सख्त निगरानी और सुरक्षा मानकों के तहत शुरू करने जा रही है। एजेंसी की योजना इस उन्नत मॉडल को सीधे बड़े पैमाने पर उतारने के बजाय अलग-अलग चरणों में परखने की है, ताकि यह सटीक मूल्यांकन किया जा सके कि साइबर रक्षा अभियानों में इसका सुरक्षित उपयोग किस तरह संभव है।
सीमित दायरे में होगा मॉडल का परीक्षण
मिथॉस मॉडल की पहुंच वर्तमान में दुनिया भर में केवल गिने-चुने और भरोसेमंद संगठनों तक ही सीमित रखी गई है। अधिकारियों ने इस बात को लेकर चिंता जताई है कि इस मॉडल में मौजूद आधुनिक साइबर क्षमताओं का गलत हाथों में बड़े पैमाने पर दुरुपयोग हो सकता है। इसी जोखिम को देखते हुए सीईआरटी-इन व्यापक स्तर पर इसका इस्तेमाल करने से पहले यह गहराई से जांचेगी कि यह मॉडल अलग-अलग परिस्थितियों में कैसा व्यवहार करता है। इस एक्सेस की मदद से भारतीय सुरक्षा प्रणालियों की कमजोरियों और खामियों का समय रहते पता लगाने में मदद मिल सकती है। इसके साथ ही, भविष्य में उभरने वाले नए और जटिल साइबर खतरों से निपटने के लिए जवाबी तंत्र को भी मजबूत बनाया जा सकेगा।
धीमी और नियंत्रित रफ्तार से आगे बढ़ने की रणनीति
सीईआरटी-इन शुरुआत में नियंत्रित परीक्षण चलाएगी और उससे मिलने वाले नतीजों से सीख लेकर अपनी कार्यप्रणाली तैयार करेगी। सूत्रों ने स्पष्ट किया कि एजेंसी पहले यह परखेगी कि इस टूल का सबसे बेहतर इस्तेमाल किस तरह किया जा सकता है। अधिकारियों ने इस पूरी प्रक्रिया की रफ्तार को जानबूझकर बेहद नपा-तुला और सतर्क बताया है। अधिकारियों का कहना है कि वे जिस भी पहलू की जांच करना चाहेंगे, उसे बहुत धीरे-धीरे आगे बढ़ाएंगे, इसलिए यह पूरी प्रक्रिया धीमी गति से चलेगी। शुरुआती प्रयोगों के दौरान मुख्य ध्यान सुरक्षा और जोखिम प्रबंधन पर केंद्रित रहेगा।
इलाज समस्या से ज्यादा गंभीर न बन जाए
सूत्रों के अनुसार, यह सतर्क दृष्टिकोण इसलिए अपनाया गया है ताकि तकनीक के लाभ उठाते समय किसी भी संभावित नुकसान को पूरी तरह से रोका जा सके। इस रणनीति का मूल विचार यह है कि 'समाधान ही समस्या से ज्यादा बुरा साबित न हो जाए'। अधिकारी इस मॉडल की तकनीकी खूबियों और इसकी सीमाओं दोनों की गहन समीक्षा करने की तैयारी में हैं। इसके साथ ही साइबर एजेंसी उन खतरों का भी बारीकी से आकलन करेगी जो इसके संभावित दुरुपयोग से उत्पन्न हो सकते हैं। मॉडल का भविष्य में कितना बड़ा इस्तेमाल होगा, यह पूरी तरह से इन शुरुआती जांच परिणामों पर निर्भर करेगा।
साइबर सुरक्षा में एआई के दोहरे उपयोग का संकट
यह कदम ऐसे समय में सामने आया है जब साइबर स्पेस में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के उपयोग को लेकर वैश्विक बहस तेज हो रही है। आधुनिक एआई मॉडल कंप्यूटर सिस्टम की खामियों को तेजी से पहचानने और उन्हें ठीक करने के उपाय सुझाने में बेहद सक्षम हैं। हालांकि, चिंता की बात यह है कि यही तकनीकी खूबियां साइबर हमलावरों के हाथ लगने पर उनके लिए भी औजार बन सकती हैं। सूत्रों का मानना है कि इस तरह के दोहरे उपयोग वाले जोखिमों से बचने के लिए अत्यधिक संयम और कड़े नियंत्रण की आवश्यकता है। ऐसे शक्तिशाली उपकरणों पर व्यापक रूप से निर्भर होने से पहले उनका हर स्तर पर कड़ा परीक्षण अनिवार्य माना गया है।
ट्राई का जिम्मेदार एआई फ्रेमवर्क और सेक्टोरल नियम
सूत्रों ने दूरसंचार क्षेत्र में जिम्मेदार एआई के उपयोग को लेकर भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण (ट्राई) द्वारा जारी किए गए मसौदे पर भी विचार साझा किए। उनका कहना है कि हर सेक्टर के लिए अलग नियम बनाना ही व्यावहारिक है, क्योंकि एआई का प्रभाव अलग-अलग क्षेत्रों में एक जैसा नहीं होता। सूत्रों ने रेखांकित किया कि कुछ महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचा क्षेत्रों में एआई से जुड़े जोखिम काफी बड़े होते हैं। ऐसी स्थिति में ट्राई जैसे क्षेत्रीय नियामकों को ही अपने-अपने सेक्टर के लिए दिशा-निर्देश तय करने की अगुवाई करनी चाहिए।
ट्राई ने हाल ही में दूरसंचार नेटवर्क में जिम्मेदार एआई अपनाने के लिए एक ड्राफ्ट फ्रेमवर्क पेश किया था। इसमें प्रस्ताव दिया गया है कि दूरसंचार सेवा प्रदाता अपनी कंपनियों में बोर्ड से स्वीकृत एआई नीतियां लागू करें। इसके अलावा, कंपनियों में समर्पित गवर्नेंस और सुरक्षा समितियां गठित करने का भी सुझाव दिया गया है। मसौदे में यह भी कहा गया है कि एआई से जुड़ी किसी भी गंभीर घटना की जानकारी तुरंत नियामक को दी जानी चाहिए, ताकि दूरसंचार एआई प्रणालियों के लिए साझा सुरक्षा मानक स्थापित किए जा सकें।
आईटी मंत्रालय का आगामी कंसल्टेशन पेपर
इसके समानांतर, केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (एमईआईटीवाई) भी एआई विनियमन पर एक व्यापक परामर्श पत्र (कंसल्टेशन पेपर) तैयार कर रहा है। सूत्रों के मुताबिक, यह दस्तावेज एआई सुरक्षा, डीपफेक और मानव-केंद्रित दृष्टिकोण जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर केंद्रित होगा। अधिकारियों ने बताया कि मंत्रालय उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों में काम कर रहे नियामकों के साथ मिलकर सक्रियता से काम कर रहा है। कुछ क्षेत्र सीधे तौर पर क्रिटिकल इंफ्रास्ट्रक्चर की श्रेणी में आते हैं, इसलिए वहां कड़े नियमों की जरूरत है। सरकार का मकसद जोखिम के स्तर के हिसाब से नियंत्रण स्थापित करना है।
अधिकारियों ने आगाह किया कि सभी क्षेत्रों पर एक ही सख्त नियम पुस्तिका थोपना व्यापक स्तर पर बोझ बन सकता है। अधिकारियों का तर्क है कि यदि आईटी मंत्रालय कोई सर्वव्यापी नियम लागू करता है, तो उसका असर विभिन्न सेक्टरों पर अलग-अलग तरह से पड़ता है। इसलिए सेक्टर-वार नियामकों को आगे आकर नियम बनाने चाहिए। कुछ संवेदनशील क्षेत्रों में जोखिम काफी ऊंचे होते हैं और वे महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे से जुड़े हैं, इसलिए वहां नियम कड़े रखे जा सकते हैं। लेकिन यदि आईटी मंत्रालय पूरे देश में एक समान सख्त नियम लागू कर देगा, तो इसका अनुचित असर हर सेक्टर पर पड़ेगा। यही वजह है कि सीईआरटी-इन जहां मिथॉस की सीमित टेस्टिंग धीमी गति से कर रही है, वहीं सरकार विभिन्न प्रणालियों के जोखिम स्तर को ध्यान में रखकर नियम तय करने की दिशा में आगे बढ़ रही है।



















