भारत में सड़कों पर सुरक्षा सुनिश्चित करना हमेशा से एक बड़ी चुनौती रही है। आधिकारिक सरकारी आंकड़ों के अनुसार, देश में हर साल करीब 4.8 लाख सड़क दुर्घटनाएं दर्ज की जाती हैं। इन भयावह हादसों में लगभग 1.7 लाख लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ती है, जबकि 4.6 लाख से अधिक लोग गंभीर रूप से घायल हो जाते हैं। सड़क दुर्घटनाओं के इन मामलों में सबसे बड़ी वजह ओवरस्पीडिंग यानी तेज रफ्तार और रैश ड्राइविंग यानी लापरवाही से गाड़ी चलाना सामने आई है। इस गंभीर समस्या से निपटने और सार्वजनिक सुरक्षा को पुख्ता करने के उद्देश्य से भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण यानी ट्राई (TRAI) एक क्रांतिकारी कदम उठाने जा रहा है। देश में सड़क हादसों की दर को घटाने के लिए नियामक एक बेहद आधुनिक V2X तकनीक को अपनाने की दिशा में काम कर रहा है। इस संबंध में ट्राई द्वारा एक व्यापक कंसल्टेशन पेपर भी जारी किया जा चुका है और हाल ही में उद्योग के विभिन्न हितधारकों (स्टेकहोल्डर्स) के साथ इस विषय पर एक खुली चर्चा भी की गई है।
क्या है यह V2X तकनीक?
वीटूएक्स (V2X) का पूरा नाम 'व्हीकल-टू-एवरीथिंग' है। यह एक ऐसी एडवांस संचार तकनीक है जो वाहनों को उनके आसपास के पूरे वातावरण से जोड़ने में सक्षम बनाती है। इसके माध्यम से गाड़ियॉं न केवल आपस में संपर्क साध सकती हैं, बल्कि सड़क के आसपास मौजूद अन्य महत्वपूर्ण घटकों के साथ भी रियल-टाइम डेटा साझा कर सकती हैं। ट्राई के मुताबिक, इस तकनीक के क्रियान्वयन से वाहनों के बीच एक सुदृढ़ कम्युनिकेशन नेटवर्क स्थापित होगा, जिससे हादसों को समय रहते टालने में मदद मिलेगी। इस वायरलेस सिस्टम को मुख्य रूप से चार अलग-अलग श्रेणियों में विभाजित किया गया है जो सुरक्षा चक्र को पूरी तरह से मजबूत बनाते हैं।
V2X तकनीक के चार प्रमुख स्तंभ
- वीकल-टू-वीकल (V2V): इस सिस्टम के तहत दो गाड़ियॉं आपस में सीधे तौर पर संवाद स्थापित करती हैं। इसके लिए वे शॉर्ट रेंज रेडियो फ्रिक्वेंसी का उपयोग करती हैं। यह तकनीक तभी काम करती है जब दोनों गाड़ियॉं एक-दूसरे के निकट संपर्क क्षेत्र में आती हैं।
- वीकल-टू-इंफ्रास्ट्रक्चर (V2I): इसके जरिए गाड़ियॉं सड़क के किनारे लगे बुनियादी ढांचे से जुड़ जाती हैं। इसमें सड़क किनारे मौजूद ट्रैफिक सिग्नल, स्पीड ब्रेकर, डिजिटल साइन बोर्ड और चेतावनी सूचकांक शामिल हैं। गाड़ी का सिस्टम इनसे लगातार संपर्क में रहकर सड़क की स्थिति का आकलन करता रहता है।
- वीकल-टू-पेडेस्ट्रियन (V2P): यह तकनीक सड़क पर चलने वाले राहगीरों की सुरक्षा सुनिश्चित करती है। जैसे ही गाड़ी के सेंसर को यह पता चलता है कि आगे कोई पैदल यात्री सड़क पार कर रहा है, यह सिस्टम गाड़ी में स्वचालित रूप से ब्रेक सक्रिय कर देता है, जिससे संभावित टक्कर से बचा जा सके।
- वीकल-टू-नेटवर्क (V2N): इस प्रणाली के माध्यम से गाड़ियॉं अपने आसपास के मोबाइल नेटवर्क और टेलीकॉम टावरों से संपर्क स्थापित करती हैं। इसके जरिए किसी भी आपातकालीन स्थिति में तुरंत संदेश भेजा जा सकता है। साथ ही इसके द्वारा रियल-टाइम मैप अपडेट, फ्लीट आधारित डेटा कलेक्शन और ऑटोमैटिक क्लाउड सर्विसेज जैसी सुविधाएं भी आसानी से संचालित की जा सकती हैं।
यह प्रणाली किस प्रकार कार्य करती है?
V2X तकनीक को मूल रूप से वाहनों के बीच सूचनाओं के आदान-प्रदान के लिए एक साझा नेटवर्क के रूप में तैयार किया गया है। इसके जरिए सड़क पर दौड़ रही गाड़ी दूसरी गाड़ियों से सीधे जुड़कर खुद को अपडेट रखती है, जिसे V2V कहा जाता है। इसी नेटवर्क का विस्तार वीकल-टू-इंफ्रास्ट्रक्चर (V2I), वीकल-टू-पेडेस्ट्रियन (V2P) और वीकल-टू-डिवाइस (V2D) के रूप में होता है। इस पूरी संचार प्रक्रिया को अंजाम देने के लिए गाड़ियों में कई तरह के वायरलेस कम्युनिकेशन प्रोटोकॉल्स का उपयोग किया जाता है, जिनमें सेलुलर नेटवर्क, WiFi और शॉर्ट रेंज रेडियो फ्रिक्वेंसी शामिल हैं। ये सभी प्रोटोकॉल मिलकर एक ऐसा सुरक्षा तंत्र बनाते हैं जो चालक को पल-पल की जानकारी उपलब्ध कराता है।
इलेक्ट्रिक और स्वायत्त वाहनों में इसका वैश्विक स्तर पर उपयोग
वर्तमान समय में दुनिया के कई विकसित देशों में इलेक्ट्रिक गाड़ियों (EV) के भीतर V2X तकनीक का सफलतापूर्वक उपयोग किया जा रहा है। वहां इसे चार्जिंग मैनेजमेंट के तौर पर भी काम में लाया जाता है। इस प्रक्रिया में इलेक्ट्रिक वाहनों को एक प्रकार के ऊर्जा भंडारण साधन (एनर्जी स्टोरेज डिवाइस) के रूप में उपयोग किया जाता है। जब जरूरत होती है, तब EV में संग्रहित बिजली को V2I तकनीक की मदद से वापस मुख्य बिजली ग्रिड में भेज दिया जाता है। इसके अलावा, चालक रहित या ऑटोनोमस वाहनों में भी यह तकनीक सबसे अहम भूमिका निभाती है। उदाहरण के तौर पर, गूगल के स्वामित्व वाली प्रसिद्ध कंपनी वेमो (Waymo) अमेरिका में अपनी सेल्फ-ड्राइविंग कारों को इसी V2X तकनीक की मदद से सुरक्षित रूप से सड़कों पर संचालित करने में सफल रही है।
भारतीय सड़कों पर इसके इस्तेमाल से होने वाले बड़े फायदे
इस तकनीक के लागू होने से सड़क परिवहन व्यवस्था में क्रांतिकारी बदलाव आने की उम्मीद है। इसके मुख्य लाभ इस प्रकार हैं
- वाहन चालकों को सड़क पर लगने वाले भारी ट्रैफिक जाम की जानकारी बहुत पहले ही मिल जाएगी, जिससे वे वैकल्पिक मार्ग चुन सकेंगे।
- यदि आगे का रास्ता बंद है या वहां कोई काम चल रहा है, तो इसकी सूचना सीधे गाड़ी की स्क्रीन पर पहले ही फ्लैश हो जाएगी।
- यह तकनीक भीषण सर्दियों के मौसम में, विशेष रूप से घने कोहरे के दौरान बेहद उपयोगी साबित होगी। यह आगे चल रहे वाहनों की सही स्थिति से पीछे आ रहे वाहन चालक को लगातार सचेत रखेगी।
- सड़क पर सुरक्षा का स्तर इतना बढ़ जाएगा कि यदि आगे चल रही गाड़ी अचानक से ब्रेक लगाती है, तो पीछे चल रही गाड़ी को तुरंत एक चेतावनी अलर्ट प्राप्त हो जाएगा।
- आपातकालीन सेवाओं जैसे एम्बुलेंस के आने की स्थिति में, यह तकनीक सड़क पर चल रहे अन्य वाहनों को रास्ता खाली करने के लिए तुरंत अलर्ट जारी करेगी, जिससे मरीजों को समय पर अस्पताल पहुंचाया जा सके।



















