केंद्र सरकार ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की मदद से तैयार की जाने वाली डीपफेक तस्वीरों, वीडियो और ऑडियो क्लिप्स के जरिए होने वाले डिजिटल फ्रॉड पर लगाम कसने के लिए एक बेहद सख्त और निर्णायक कदम उठाया है। नए दिशा-निर्देशों के तहत सोशल मीडिया कंपनियों और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के लिए आपत्तिजनक एआई सामग्री पर कार्रवाई करने और उसे अपने प्लेटफॉर्म से पूरी तरह हटाने की प्रक्रिया को बहुत सख्त बना दिया गया है। सरकार का स्पष्ट निर्देश है कि इंटरनेट पर फर्जी और भ्रामक एआई कंटेंट के प्रसार को रोकने के लिए टेक प्लेटफॉर्म्स को तय समय सीमा के भीतर त्वरित कार्रवाई करनी होगी, वरना उन्हें गंभीर कानूनी नतीजों को भुगतने के लिए तैयार रहना होगा।
डीपफेक पर सख्त कदम और शिकायत निपटाने की नई समय सीमा
नए नियमों के अंतर्गत सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण बदलाव यूजर्स की शिकायतों के निपटारे की समय सीमा में किया गया है। पहले किसी नागरिक द्वारा फर्जी पहचान, अश्लीलता, न्यूडिटी या इसी तरह की अन्य बेहद संवेदनशील शिकायतों के संबंध में दी गई अर्जी पर सोशल मीडिया कंपनियों को 24 घंटे के भीतर कार्रवाई करने की छूट मिली हुई थी। हालांकि, अब इस समयावधि में भारी कटौती करते हुए इसे घटाकर मात्र 2 घंटे कर दिया गया है। इसका सीधा मतलब यह है कि शिकायत दर्ज होते ही प्लेटफॉर्म को 2 घंटे के भीतर संबंधित डीपफेक सामग्री को हटाना या ब्लॉक करना अनिवार्य होगा।
आईटी नियमों में बदलाव: एआई कंटेंट की पहचान और मेटाडेटा अनिवार्य
सरकार ने आईटी एक्ट के तहत लागू नियमों में कई आवश्यक संशोधन किए हैं ताकि आम नागरिक असली मीडिया और एआई जनरेटेड कंटेंट के बीच का अंतर आसानी से पहचान सकें। नए प्रावधानों के अनुसार, अब बिना स्पष्ट घोषणा के कोई भी एआई निर्मित सामग्री इंटरनेट पर प्रसारित नहीं की जा सकेगी। यदि कोई फोटो, वीडियो या ऑडियो किसी एआई टूल की मदद से तैयार किया गया है, तो उस पर एक साफ और दृश्यमान लेबल लगाना अनिवार्य होगा जो यह बताएगा कि यह सामग्री एआई से तैयार की गई है। इसके अलावा, हर एआई कंटेंट के साथ एक ट्रेसेबल मेटाडेटा जोड़ना भी आवश्यक कर दिया गया है, ताकि जरूरत पड़ने पर यह आसानी से पता लगाया जा सके कि सामग्री का मूल स्रोत क्या है।
अदालती आदेश और ऑटोमेटेड टूल्स को लेकर कड़े निर्देश
अदालत या सरकार की ओर से जारी किसी भी गैरकानूनी कंटेंट को हटाने से जुड़े निर्देशों के मामले में भी नियमों को काफी सख्त किया गया है। पहले सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के पास ऐसे सरकारी आदेशों या अदालती निर्देशों का पालन करने के लिए 36 घंटे का समय होता था, जिसे अब घटाकर केवल 3 घंटे कर दिया गया है। इस कदम का मुख्य उद्देश्य इंटरनेट पर किसी भी भ्रामक, भड़काऊ या अवैध सामग्री को लंबे समय तक लाइव रहने से रोकना है। इसके साथ ही, कंपनियां केवल यूज़र शिकायतों का इंतजार नहीं कर सकती हैं। अब प्लेटफॉर्म्स को अपने सिस्टम में एआई आधारित ऑटोमेटेड टूल्स लगाना अनिवार्य होगा जो खुद ही डीपफेक सामग्री, अश्लील एआई कंटेंट और बच्चों से जुड़ी आपत्तिजनक सामग्री (CSAM) की पहचान कर उसे तुरंत रिमूव कर सकें।
सेफ हार्बर की ढाल खत्म, लापरवाही पर होगी कानूनी कार्रवाई
डिजिटल प्लेटफॉर्म्स की जवाबदेही तय करते हुए सरकार ने एक बेहद कड़ी चेतावनी भी दी है। यदि कोई सोशल मीडिया कंपनी नए आईटी नियमों और सख्त टेकडाउन समय सीमा का पालन करने में विफल रहती है, तो उसे आईटी एक्ट के तहत मिलने वाली 'सेफ हार्बर' (Safe Harbour) की कानूनी सुरक्षा से वंचित कर दिया जाएगा। अब तक इस कानूनी ढाल के तहत प्लेटफॉर्म्स को यूज़र्स द्वारा पोस्ट की गई सामग्री के लिए सीधे कानूनी रूप से जिम्मेदार नहीं माना जाता था। परंतु, इस ढाल के हटने के बाद नियम तोड़ने वाली कंपनियों के खिलाफ भी सीधे तौर पर आपराधिक और दीवानी कानूनी कार्रवाई करने का रास्ता खुल गया है।
तकनीकी मोर्चे पर आईआईटी का योगदान और 13 अहम प्रोजेक्ट्स
डीपफेक से निपटने के लिए सरकार केवल कानूनी प्रावधानों तक सीमित नहीं है, बल्कि स्वदेशी तकनीक के विकास पर भी पूरा जोर दे रही है। 'रिस्पॉन्सिबल एआई' (Responsible AI) पहल के तहत 13 प्रमुख तकनीकी परियोजनाओं को मंजूरी दी गई है, जिनका मुख्य उद्देश्य डीपफेक और फर्जी कंटेंट को पकड़ने वाली अत्याधुनिक तकनीकों को तैयार करना है। इस दिशा में देश के शीर्ष संस्थान काम कर रहे हैं। आईआईटी जोधपुर द्वारा एक समर्पित डीपफेक डिटेक्शन सिस्टम विकसित किया जा रहा है। इसी तरह, आईआईटी मद्रास एआई से तैयार की गई फर्जी विजुअल सामग्री की पहचान करने वाली तकनीक पर काम कर रहा है। वहीं, आईआईटी खड़गपुर एक विशेष वॉइस डीपफेक डिटेक्शन सिस्टम विकसित कर रहा है, जो एआई से बनाई गई नकली आवाजों को पकड़ने में सक्षम होगा।
जन जागरूकता अभियान और सरकार का डिजिटल सुरक्षा का संकल्प
कड़े कानूनों और नई तकनीक के साथ-साथ आम जनता की जागरूकता को भी सरकार बेहद आवश्यक मान रही है। नागरिकों को डिजिटल फ्रॉड और एआई के गलत इस्तेमाल से बचाने के लिए देशभर में बड़े पैमाने पर जागरूकता कार्यक्रम चलाए गए हैं। अब तक देश भर में 6,650 जागरूकता कार्यशालाएं आयोजित की जा चुकी हैं, जिनसे 11.37 लाख से अधिक लोगों को सीधा लाभ पहुंचा है। इसके अलावा सरकार ने डीपफेक, धार्मिक सामग्री, गैर-सहमति से बनाई गई निजी तस्वीरों और भ्रामक एआई कंटेंट से जुड़े मामलों पर अलग-अलग एडवाइजरी भी जारी की है।
केंद्रीय राज्य मंत्री जितिन प्रसाद ने सरकार के इस रुख को स्पष्ट करते हुए कहा कि सरकार देश में एक सुरक्षित, भरोसेमंद और पूरी तरह से जवाबदेह डिजिटल इकोसिस्टम बनाने के लिए लगातार काम कर रही है। इसी उद्देश्य के तहत कानून, तकनीक और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स की जिम्मेदारी तीनों को एक साथ मजबूत करके डीपफेक और एआई फ्रॉड पर प्रभावी अंकुश लगाया जा रहा है।



















