ऑनलाइन डेटिंग की दुनिया में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से बनी फर्जी प्रोफाइल, चैटफिशिंग और वॉइस क्लोनिंग के बढ़ते खतरे ने सुरक्षा चिंताओं को गहरा कर दिया है। इस समस्या से निपटने के लिए अब डिजिटल प्लेटफॉर्म्स अपने यूज़र्स से उनकी सबसे व्यक्तिगत और अनूठी पहचान यानी उनके चेहरे का स्कैन मांग रहे हैं। अमेरिका में ऑनलाइन डेटिंग का इस्तेमाल करने वाले लगभग आधे लोग किसी न किसी डेटिंग स्कैम का शिकार हो चुके हैं। अमरीकी जांच एजेंसी एफबीआई के आंकड़ों के अनुसार 2015 से 2025 के बीच केवल अमरीका में ही रोमांस स्कैम के कारण यूज़र्स को 4 अरब डॉलर से अधिक का वित्तीय नुकसान झेलना पड़ा है। इस व्यापक धोखाधड़ी को रोकने के लिए अब एक दर्जन से भी अधिक प्रमुख डेटिंग ऐप्स और वेबसाइट्स यूज़र्स की पहचान सत्यापित करने के लिए फेस रिकग्निशन तकनीक का सहारा ले रही हैं। इसमें लाइवनेस चेक, 3D ऑथेंटिकेशन, वीडियो सेल्फी और बायोमेट्रिक आईडी सत्यापन जैसी तकनीकों का इस्तेमाल किया जा रहा है ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि स्क्रीन के पीछे मौजूद व्यक्ति वास्तव में इंसान ही है।
ऑनलाइन डेटिंग प्लेटफॉर्म्स पर अनिवार्य होता फेस वेरिफिकेशन
नकली प्रोफाइल और स्कैमर्स पर लगाम लगाने के मकसद से टिंडर ने अक्टूबर 2025 में नए सदस्यों के लिए 'फेस चेक' नामक एक अनिवार्य चेहरा स्क्रीनिंग टूल की शुरुआत की थी। इस कदम पर मैच ग्रुप के ट्रस्ट एंड सेफ्टी प्रमुख योएल रोथ ने एक ईमेल में कहा था कि यह महज एक फीचर नहीं है, बल्कि यह इस बात का एक स्पष्ट बयान है कि ऑनलाइन मानवीय संबंधों को किस तरह की सुरक्षा और सत्यापन की आवश्यकता होनी चाहिए। मैच ग्रुप टिंडर का स्वामित्व रखता है और कंपनी अब अमेरिका और ब्रिटेन जैसे अपने प्रमुख बाजारों में पुराने या मौजूदा यूज़र्स के लिए भी फेस चेक सत्यापन को अनिवार्य कर रही है। जैसे-जैसे चेहरा पहचान तकनीक पूरी इंडस्ट्री में एक अनिवार्य शर्त बनती जा रही है, वैसे-वैसे धोखाधड़ी करने वाले असामाजिक तत्वों से निपटने का यह सामूहिक प्रयास एक ऐसा नया मानक तय कर रहा है, जहां आने वाले समय में 'इंसान होने का प्रमाण' देना ही हर ऑनलाइन प्रोफाइल के लिए सामान्य प्रक्रिया बन जाएगा।
प्राइवेसी और सुरक्षा के मोर्चे पर खड़ा होता गंभीर विरोधाभास
तकनीकी बदलाव की इस पूरी प्रक्रिया के पीछे एक गहरा विरोधाभास छुपा हुआ है। ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर मौजूद व्यक्ति असली है या नहीं, इस मूल समस्या को हल करने की कोशिश में बड़े डेटिंग प्लेटफॉर्म यूज़र्स को अपना बायोमेट्रिक डेटा देने के लिए मजबूर कर रहे हैं। इससे न केवल निजता और डिजिटल सुरक्षा के नए जोखिम पैदा हो रहे हैं, बल्कि समाज में हर गतिविधि पर निगरानी रखने की संस्कृति को भी बढ़ावा मिल रहा है। इस क्षेत्र में बायोमेट्रिक पहचान तकनीक को बढ़ावा देने वाली कंपनियों में टूल्स फॉर ह्यूमैनिटी भी शामिल है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के क्षेत्र में काम करने वाली इस कंपनी ने ऑंखों की पुतली यानी आईरिस को स्कैन करने वाला बायोमेट्रिक वेरिफिकेशन सिस्टम 'वर्ल्ड आईडी' तैयार किया है। अप्रैल में कंपनी ने टिंडर के साथ साझेदारी की थी, हालांकि यूज़र्स के लिए इसका इस्तेमाल फिलहाल ऐच्छिक रखा गया है। वर्ल्ड आईडी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि जो यूज़र्स सत्यापन प्रक्रिया से गुजरते हैं, उन्हें ऐप पर 'वेरीफाइड ह्यूमन' का बैज मिलता है। इसके लिए यूज़र्स को कंपनी के 'ऑर्ब' नामक विशेष उपकरण से अपनी आंख के रंगीन हिस्से को स्कैन कराना होता है, जिसके बाद उन्हें एक आधिकारिक वर्ल्ड आईडी नंबर जारी किया जाता है।
बायोमेट्रिक डेटा संग्रहण और तकनीकी सुरक्षा के दावे
टूल्स फॉर ह्यूमैनिटी के चीफ प्रोडक्ट ऑफिसर टियागो सादा का मानना है कि निकट भविष्य में किसी भी डेटिंग ऐप या आम ऑनलाइन प्लेटफॉर्म को इस तरह की 'प्रूफ ऑफ ह्यूमन' प्रणाली की आवश्यकता होगी। उन्होंने कहा कि अधिकांश डेटिंग प्लेटफॉर्म जिस तरह से वर्तमान में सत्यापन संभालते हैं, वह बेहद अजीब और चिंताजनक है क्योंकि यूज़र्स को अपनी हर इस्तेमाल की जाने वाली ऐप के पास अपनी व्यक्तिगत जानकारी जमा करनी पड़ती है। कंपनी की नीति के अनुसार ऑर्ब डिवाइस यूज़र्स का कोई भी डेटा साझा या सुरक्षित नहीं रखता है। यह उपकरण यूज़र के डेटा को किसी केंद्रीय सर्वर पर भेजे बिना ही पहचान सत्यापित करने में सक्षम है। कंपनी का दावा है कि एक बार यूज़र के चेहरे या आंख की छवि की पुष्टि हो जाने के बाद, ऑर्ब उस कोडेड इमेज को यूज़र के फोन पर भेज देता है और मूल डेटा को हमेशा के लिए डिलीट कर देता है। इसी तरह मैच ग्रुप ने भी स्पष्ट किया है कि टिंडर का फेस चेक टूल यूज़र की वास्तविक तस्वीर को सेव करने के बजाय उनके चेहरे के आकार और संरचना का एक एन्क्रिप्टेड मैप तैयार करके सुरक्षित रखता है।
साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों की चेतावनी और 'सिक्योरिटी थिएटर' का सच
डेटिंग प्लेटफॉर्म्स भले ही यह दावा करें कि यूज़र्स का बायोमेट्रिक डेटा पूरी तरह सुरक्षित है, लेकिन साइबर सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंताएं बनी हुई हैं। डेटिंग ऐप्स समय-समय पर डेटा लीक और साइबर हमलों का शिकार होते रहे हैं। हालांकि इन पहचान प्रणालियों का मूल आधार यह है कि सत्यापन से भरोसा कायम होता है, लेकिन साइबर सुरक्षा शोधकर्ता केटी मौसोरिस इसे महज एक छलावा मानती हैं। उनका कहना है कि इस विचार को सामान्य बनाना कि चेहरा स्कैन करने से पहचान या उम्र की कोई गारंटी मिलती है, वास्तव में महज 'सिक्योरिटी थिएटर' यानी सुरक्षा का एक दिखावा है। केटी मौसोरिस के अनुसार चेहरा स्कैनिंग और लाइव वीडियो पर आधारित लाइवनेस चेक केवल यह साबित करता है कि अकाउंट बनाते समय कोई व्यक्ति भौतिक रूप से मौजूद था। यह इस बात की कोई गारंटी नहीं देता कि वह व्यक्ति वास्तविक समय में अपनी उपस्थिति बदलने के लिए एआई टूल्स का उपयोग नहीं कर रहा है। इसी प्रकार किसी सरकारी आईडी को स्कैन करने से केवल यह साबित होता है कि एक दस्तावेज प्रस्तुत किया गया था, न कि वह दस्तावेज उसी व्यक्ति का है जो उसे जमा कर रहा है। इनमें से किसी भी प्रक्रिया को वास्तविक भरोसे के साथ नहीं जोड़ा जा सकता, क्योंकि एक सत्यापित प्रोफाइल भी किसी ऐसे साइबर अपराधी की हो सकती है जिसने किसी का अकाउंट हैक कर लिया हो या एआई तकनीक से नई प्रोफाइल बनाई हो।
निगरानी का खतरा और कानूनी तंत्र की विफलता
पासवर्ड और यूज़रनेम लीक होने पर उन्हें आसानी से बदला जा सकता है, लेकिन इंसान का चेहरा बदला नहीं जा सकता। इसी वजह से बायोमेट्रिक डेटा साइबर हमलों के लिए एक अनूठा और बेहद संवेदनशील लक्ष्य बन जाता है। बोस्टन यूनिवर्सिटी में टेक्नोलॉजी लॉ के प्रोफेसर वुडरो हार्टजॉग, जो पहले मैसाचुसेट्स विशेष चेहरे की पहचान आयोग में भी सेवा दे चुके हैं, का कहना है कि बायोमेट्रिक सत्यापन एक खतरनाक मिसाल कायम कर रहा है। उन्होंने चेतावनी दी कि जब हम ऑनलाइन की जाने वाली हर गतिविधि के लिए अपना चेहरा स्कैन कराने के आदी हो जाते हैं, तो यह न केवल प्राइवेसी के लिहाज से खतरनाक है, बल्कि पूरी आबादी को इस तरह के व्यवहार को सामान्य मानने के लिए ढाल देता है। वुडरो हार्टजॉग के अनुसार फेशियल रिकग्निशन अब तक का सबसे खतरनाक निगरानी उपकरण है। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि मौजूदा निजता कानून डेटिंग ऐप्स पर बायोमेट्रिक सत्यापन की चुनौतियों से निपटने में सक्षम नहीं हैं। उनका मानना है कि सरकारी नीतियों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि जब भी कम आक्रामक विकल्प उपलब्ध हों, उनका ही उपयोग किया जाए। फिंगरप्रिंट की तुलना में चेहरे का डेटा संग्रह करना कहीं अधिक जोखिम भरा है, क्योंकि चेहरे की ट्रैकिंग इंसान के कहीं भी जाने पर लगातार की जा सकती है।
डिजिटल पहचान कानून और भविष्य की नीतियां
इस दिशा में मई में लागू हुआ यूटा राज्य का 'स्टेट-एंडोर्स्ड डिजिटल आइडेंटिटी' कानून एक महत्वपूर्ण विधायी प्रयास माना जा रहा है। यह कानून ऑनलाइन प्लेटफॉर्म द्वारा मांगे जाने वाले डेटा की सीमा को केवल अत्यंत आवश्यक जानकारी तक सीमित करता है और 'ड्यूटी ऑफ लॉयल्टी' का सिद्धांत लागू करता है। इसका अर्थ यह है कि डेटा एकत्र करने वाले प्लेटफॉर्म ऐसी प्रथाओं में संलग्न नहीं हो सकते जो किसी व्यक्ति के सर्वोत्तम हितों के विपरीत हों या उन्हें अत्यधिक जोखिम में डालती हों। यह कानून उस स्थिति को रोकने की कोशिश करता है जहां लोगों को हर बार ऑनलाइन लॉगिन करते समय अपनी आईडी दिखानी पड़े, और डेटा एकत्र करने वाली संस्थाओं पर सख्त नियम लागू करता है। अमेरिकन सिविल लिबर्टीज यूनियन (एसीएलयू) ने इसे देश का सबसे मजबूत डिजिटल पहचान विधेयक करार दिया है। प्रोफेसर वुडरो हार्टजॉग का कहना है कि किसी वस्तु या सेवा को प्राप्त करने की शर्त के रूप में लोगों से उनके चेहरे का स्कैन कराने के लिए सहमति लेना कितना आसान बना दिया गया है। ऐसे में हमें उन नीतिगत ढांचों को अपनाने की सख्त जरूरत है जो किसी व्यक्ति पर अपनी पहचान उजागर करने का बोझ डालने के बजाय सीधे कंपनियों पर सख्त प्राइवेसी सुरक्षा लागू करने की जिम्मेदारी डालते हैं।



















