बाढ़ की तबाही हो, भूकंप से ढही इमारतें हों या संकरी गुफाओं में फंसे लोग, प्राकृतिक और मानव निर्मित आपदाओं के समय राहत और बचाव अभियान हमेशा बेहद चुनौतीपूर्ण साबित होते हैं। भारी मलबे, बेहद संकीर्ण दरारों और खतरनाक स्थानों पर इंसानी रेस्क्यू टीमों का पहुंचना कई बार असंभव हो जाता है, जबकि पारंपरिक बड़े रोबोट भी इन तंग जगहों में प्रवेश नहीं कर पाते। इस गंभीर समस्या से निपटने के लिए ऑस्ट्रेलिया की यूनिवर्सिटी ऑफ क्वींसलैंड के वैज्ञानिकों ने एक नया बायोहाइब्रिड रोबोटिक प्लेटफॉर्म विकसित किया है। इस शोध के तहत वैज्ञानिकों ने जीवित कॉकरोच को बेहद आधुनिक 'पैरामेडिक साइबोर्ग' यानी 'पैराबोर्ग्स' में बदल दिया है। ये छोटे साइबोर्ग कीड़े मलबे के सूक्ष्म रास्तों से होते हुए फंसे हुए घायलों तक आसानी से पहुंच सकते हैं और आवश्यकता पड़ने पर उन्हें जीवन रक्षक दवाएं भी इंजेक्ट कर सकते हैं। हाल ही में प्रयोगशाला में आयोजित 25 प्रायोगिक ट्रायल्स के दौरान इस अत्याधुनिक तकनीक ने 72 प्रतिशत की शानदार सफलता दर हासिल की है। यह सफलता आपदा प्रबंधन और बायोमेडिकल रोबोटिक्स के क्षेत्र में एक नए युग की शुरुआत मानी जा रही है।
ऑब्जर्वर और इंजेक्टर कॉकरोच का द्वि-स्तरीय ऑपरेशनल सिस्टम
इस पैराबोर्ग्स प्रणाली का संचालन मुख्य रूप से दो विशेष कॉकरोच की जोड़ी पर आधारित होता है, जिनमें से प्रत्येक को अलग-अलग जिम्मेदारियां दी गई हैं। पहले कॉकरोच को 'ऑब्जर्वर' कहा जाता है, जिसकी पीठ पर बेहद छोटा और हल्का Wi-Fi कैमरा फिट किया गया है। यह कैमरा मलबे के भीतर की रियल टाइम वीडियो फुटेज और तस्वीरें सीधे कंट्रोल रूम में बैठे ऑपरेटरों के कंप्यूटर स्क्रीन पर भेजता है। इसके माध्यम से मलबे में दबे पीड़ितों की सटीक लोकेशन ट्रेस की जाती है। इसके अलावा, ऑब्जर्वर कॉकरोच दूसरे कॉकरोच की गतिविधियों पर भी लगातार नजर बनाए रखता है।
प्रणाली का दूसरा कॉकरोच दवा की आपूर्ति करने का काम करता है, जिसे 'इंजेक्टर कॉकरोच' कहा जाता है। इसकी पीठ पर एक विशेष रूप से डिजाइन किया गया छोटा ऑटो-इंजेक्टर उपकरण लगाया गया है। जैसे ही कॉकरोच पीड़ित व्यक्ति के पास पहुंचता है, कंट्रोल रूम से एक स्प्रिंग मैकेनिज्म को एक्टिवेट कर दिया जाता है। यह मैकेनिज्म केमिकल रिएक्शन से पैदा हुए दबाव का उपयोग करके फौरन मरीज के शरीर में आवश्यक दवा इंजेक्ट कर देता है। इस तरह दोनों कीड़ों का तालमेल जटिल स्थानों में भी तुरंत चिकित्सा सहायता पहुंचाना संभव बनाता है।
नॉर्थ क्वींसलैंड जायंट बरोइंग कॉकरोच का चयन क्यों किया गया
इस महत्वपूर्ण शोध कार्य के लिए वैज्ञानिकों ने विशेष रूप से 'नॉर्थ क्वींसलैंड जायंट बरोइंग कॉकरोच' प्रजाति का चयन किया। इस प्रजाति के कॉकरोच शारीरिक रूप से काफी मजबूत और बड़े आकार के होते हैं। इनकी लंबाई 8.7 सेंटीमीटर तक और चौड़ाई लगभग 4.5 सेंटीमीटर होती है, जबकि इनका वजन 40 ग्राम तक पहुंच सकता है। इसके अलावा, इनकी प्राकृतिक जीवन अवधि 10 वर्ष तक होती है।
इनकी यही शारीरिक विशेषताएं इन्हें भारी पेलोड, जैसे कि कैमरे, इलेक्ट्रोड और ऑटो-इंजेक्टर ले जाने के लिए आदर्श बनाती हैं। साधारण छोटे कीड़े इतना वजन उठाने में असमर्थ होते हैं, जबकि यह प्रजाति कठिन परिस्थितियों में भी अपना संतुलन बनाए रखते हुए आसानी से आगे बढ़ सकती है। इनकी लंबी उम्र के कारण इन्हें लंबे समय तक प्रशिक्षित और विभिन्न अभियानों के लिए तैयार रखा जा सकता है।
इलेक्ट्रोड और इलेक्ट्रिक सिग्नल से सधा नेविगेशन कंट्रोल
जीवित कॉकरोच को अपनी इच्छानुसार दिशा देना और उनसे नियंत्रित तरीके से काम लेना वैज्ञानिकों के लिए एक बहुत बड़ी इंजीनियरिंग चुनौती थी। इसे हल करने के लिए शोधकर्ताओं ने कॉकरोच के शरीर में सूक्ष्म इलेक्ट्रोड लगाए। कॉकरोच के सिर पर स्थित एंटीना में इलेक्ट्रोड जोड़कर उन्हें दाएं या बाएं मुड़ने का निर्देश दिया जाता है, जबकि उनके पिछले हिस्से में लगाए गए सेंसरों की मदद से उनकी गति को नियंत्रित किया जाता है।
वैज्ञानिक कंट्रोल रूम से हल्के इलेक्ट्रिक सिग्नल भेजकर इन कीड़ों को सटीक दिशा में नेविगेट करते हैं। इस अध्ययन के सह-लेखक थांग वो-दोआन ने स्पष्ट किया कि उन्होंने इस शोध के माध्यम से एक साइबोर्ग कीड़े को पूरी तरह से रेस्क्यू प्लेटफॉर्म में बदल दिया है। हालांकि, नेविगेशन के लिए इलेक्ट्रिक सिग्नलों का सहारा लिया जाता है, लेकिन दवा देने जैसे सभी महत्वपूर्ण चिकित्सा निर्णय पूरी तरह से इंसानी ऑपरेटरों के नियंत्रण में ही रहते हैं।
25 प्रायोगिक ट्रायल्स में मिला 72 प्रतिशत सफलता का रिकॉर्ड
यूनिवर्सिटी ऑफ क्वींसलैंड के मुख्य शोधकर्ता हाई न्हान ले के अनुसार, इस पूरे प्रयोग में सबसे कठिन काम साइबोर्ग कॉकरोच की सही पोजीशनिंग तय करना था। उन्होंने बताया कि कॉकरोच को मलबे के भीतर टारगेट तक पहुंचाना और उसे सही कोण पर स्थापित करना सफलता की सबसे बड़ी कुंजी है। प्रयोगशाला में परीक्षण के दौरान वैज्ञानिकों ने कुल 25 ट्रायल्स आयोजित किए, जिनमें कॉकरोच को तीन अलग-अलग चेकपॉइंट्स पार करते हुए सिलिकॉन टारगेट को इंजेक्ट करना था।
इन ट्रायल्स के परिणामों का विस्तृत विश्लेषण इस प्रकार है
- सटीक हेड कॉन्टैक्ट (12 सफ़ल ट्रायल्स): जब कॉकरोच का सिर सीधे टारगेट के संपर्क में आया, तब 12 बार बिल्कुल सटीक इंजेक्शन लगे।
- मध्यम दूरी से सफलता (6 सफल ट्रायल्स): 5 से 15 सेंटीमीटर की दूरी रहने पर 6 बार सफल इंजेक्शन प्रक्रिया पूरी हुई।
- अचानक मुड़ने से विफलता (2 विफल ट्रायल्स): 2 अवसरों पर कॉकरोच अचानक दूसरी दिशा में मुड़ गए, जिससे संपर्क टूट गया और ट्रायल असफल रहा।
- ज्यादा दबाव के कारण विफलता (5 विफल ट्रायल्स): 15 से 25 सेंटीमीटर की दूरी से की गई कोशिशों में 5 बार दबाव इतना अधिक था कि इंजेक्टर उछलकर वापस आ गया।
इन सभी ट्रायल्स के बावजूद समग्र रूप से प्राप्त 72 प्रतिशत की सफलता दर यह प्रमाणित करती है कि यह तकनीक वास्तविक दुनिया के कठिन राहत अभियानों में बेहद कारगर साबित हो सकती है।
बायोहाइब्रिड रोबोटिक्स की लागत और ऊर्जा दक्षता
पूरी तरह से कृत्रिम और यांत्रिक माइक्रो-रोबोट बनाने में भारी लागत आती है और उनकी बैटरी क्षमता भी बेहद सीमित होती है। इसके विपरीत, बायोहाइब्रिड रोबोट की निर्माण लागत बहुत कम होती है क्योंकि इनमें कीड़े के प्राकृतिक जैविक शरीर का उपयोग किया जाता है। इनकी ऊर्जा मांग बहुत कम होती है, क्योंकि कॉकरोच अपनी चलने की ऊर्जा अपने सामान्य भोजन से प्राप्त करते हैं, जबकि इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को चलाने के लिए केवल बहुत छोटी बैटरी की आवश्यकता होती है।
यूनिवर्सिटी ऑफ न्यू साउथ वेल्स की मेडिकल रोबोटिक्स लैब के निदेशक थान न्हो डो ने इस नवाचार का मूल्यांकन करते हुए कहा कि बायोमेडिकल दृष्टिकोण से यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण अवसर है। जब किसी गंभीर रूप से घायल व्यक्ति को तुरंत अस्पताल पहुंचाना संभव न हो, तब यह तकनीक उसके लिए जीवन रक्षक साबित हो सकती है। मलबे के नीचे फंसे व्यक्ति को सांप काटने, ट्रॉमा या गंभीर एलर्जिक रिएक्शन की स्थिति में ये कॉकरोच तुरंत प्राथमिक दवा दे सकते हैं, जिससे डॉक्टरों को मरीज को बचाने का अतिरिक्त समय मिल जाता है।
जापान और ऑस्ट्रेलिया के पिछले प्रयोगों से आगे बढ़ा विज्ञान
कीड़ों को साइबोर्ग में बदलने का यह पहला प्रयास नहीं है, बल्कि यह शोध पिछले कई वर्षों की वैज्ञानिक प्रगति का परिणाम है। वर्ष 2022 में जापान के शोधकर्ताओं ने मेडागास्कर हिसिंग कॉकरोच का उपयोग करके रिमोट कंट्रोल वाले कीड़े बनाए थे। इसके बाद पिछले साल इसी ऑस्ट्रेलियाई शोध दल ने डार्कलिंग बीटल्स को वीडियो गेम कंट्रोलर के जरिए सफलतापूर्वक गाइड करके दिखाया था।
अब यूनिवर्सिटी ऑफ क्वींसलैंड के वैज्ञानिकों ने उन पुराने प्रयोगों को आगे बढ़ाते हुए कॉकरोच में ऑटो-इंजेक्टर प्रणाली को एकीकृत कर दिया है। इससे यह तकनीक केवल निगरानी करने तक सीमित न रहकर सीधे चिकित्सा उपचार प्रदान करने में सक्षम हो गई है।
अगले 5 से 10 वर्षों में आपदा प्रतिक्रिया अभियानों का भविष्य
वैज्ञानिकों का लक्ष्य इंसानी रेस्क्यू टीमों को पूरी तरह से रिप्लेस करना नहीं है, बल्कि उन्हें कठिन परिस्थितियों में काम करने का एक नया और असरदार जरिया प्रदान करना है। भविष्य में आपदा स्थलों पर साइबोर्ग कीड़ों की एक पूरी टीम को एक साथ तैनात किया जा सकता है, जिसमें कुछ कीड़े कैमरों से निगरानी करेंगे और अन्य कीड़े आवश्यक चिकित्सा सामग्री ले जाएंगे।
हालांकि आम तौर पर लोग बड़े आकार के कॉकरोच को देखकर घबरा सकते हैं, लेकिन किसी ढही हुई इमारत के नीचे फंसे व्यक्ति के लिए यह कीड़ा जीवन और मृत्यु के बीच का अंतर साबित हो सकता है। शोधकर्ताओं को उम्मीद है कि अगले 5 से 10 वर्षों के भीतर यह पैराबोर्ग्स तकनीक वास्तविक बचाव अभियानों का हिस्सा बन जाएगी।



















