देशभर में मोबाइल रिचार्ज प्लान महंगे होने की चर्चाओं के बीच भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण यानी ट्राई ने किसी भी संभावित टैरिफ बढ़ोतरी की पुष्टि करने से इनकार किया है। ट्राई के चेयरमैन अनिल कुमार लाहोटी ने स्पष्ट किया है कि यदि टेलीकॉम ऑपरेटर अपनी दरों में 10 से 15 फीसदी तक की वृद्धि करने का निर्णय लेते हैं, तो नियामक केवल अटकलों या शुरुआती अनुमानों के आधार पर कोई कदम नहीं उठाएगा। उन्होंने बताया कि भारतीय दूरसंचार क्षेत्र में मौजूदा व्यवस्था फॉरबियरेंस के तहत काम करती है, जिसका सीधा अर्थ है कि कंपनियां अपने रिचार्ज प्लान की कीमतें तय करने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र हैं। ट्राई का मुख्य दायित्व बाजार में प्रतिस्पर्धा पर नजर रखना और नियमों का उचित पालन सुनिश्चित करना है।
टैरिफ बढ़ोतरी और नियामक के हस्तक्षेप पर स्थिति
जब ट्राई चेयरमैन से यह सवाल किया गया कि क्या मोबाइल कंपनियां 10-15 फीसदी तक दरें बढ़ाती हैं तो विनियामक दखल देगा, तो उन्होंने कहा कि ट्राई अनुमान या अटकलों पर आधारित फैसले नहीं लेता है। लाहोटी के अनुसार, भविष्य में यदि कोई ऐसी परिस्थिति उत्पन्न होती है जहां बाजार या उपभोक्ताओं के हित में हस्तक्षेप जरूरी लगे, तो ट्राई उस पर विधिवत विचार कर कदम उठाएगा। इसका मतलब यह है कि मौजूदा समय में 10-15 फीसदी टैरिफ वृद्धि को लेकर नियामक की ओर से न तो कोई आधिकारिक मंजूरी दी गई है और न ही किसी योजना की पुष्टि की गई है। जब तक कंपनियां औपचारिक रूप से नए टैरिफ लागू नहीं करतीं, तब तक इस पर विनियामक स्तर पर कोई पूर्व-हस्तक्षेप नहीं होगा।
कंपनियां खुद तय करती हैं मोबाइल प्लान की कीमतें
दूरसंचार सेवाओं की मूल्य निर्धारण प्रक्रिया समझाते हुए लाहोटी ने बताया कि टैरिफ फॉरबियरेंस व्यवस्था के चलते कंपनियां अपने प्लान का ढांचा और दरें तय करने के लिए आजाद हैं। इस समय भारतीय टेलीकॉम बाजार में कंपनियों के बीच सीधी प्रतिस्पर्धा है। ऑपरेटर अपने प्लान की लागत, मिलने वाले कॉलिंग मिनट, एसएमएस और डेटा लाभों के आधार पर ग्राहकों को आकर्षित करने की होड़ में रहते हैं। इस पूरी व्यवस्था में ट्राई की भूमिका एक निष्पक्ष निगरानीकर्ता की है, जो यह सुनिश्चित करता है कि बाजार में स्वस्थ प्रतिस्पर्धा बनी रहे और कोई भी सेवा प्रदाता निर्धारित विनियामक दिशा-निर्देशों का उल्लंघन न करे।
भारतीय बाजार में सबसे किफायती दूरसंचार सेवाएं
अनिल कुमार लाहोटी ने वैश्विक स्तर पर भारतीय टेलीकॉम दरों का मूल्यांकन करते हुए कहा कि भारत में मोबाइल टैरिफ संभवतः दुनिया में सबसे कम हैं। इसका व्यावहारिक परिणाम यह है कि अन्य अंतरराष्ट्रीय बाजारों की तुलना में भारतीय उपभोक्ताओं को बेहद किफायती दरों पर कॉलिंग और हाई-स्पीड डेटा सेवाएं मिल रही हैं। हालांकि, यदि ऑपरेटर अपनी दरों में 10 से 15 फीसदी की बढ़ोतरी करते हैं, तो इसका सीधा असर आम उपभोक्ताओं के मासिक बजट और मोबाइल खर्च पर पड़ेगा। इसी कारण से संभावित टैरिफ वृद्धि को लेकर उपभोक्ताओं के बीच निरंतर चर्चा बनी हुई है।
सिर्फ कॉलिंग और एसएमएस चाहने वालों के लिए अलग प्लान
चर्चा के दौरान ट्राई चेयरमैन ने केवल महंगे होते प्लान पर ही नहीं, बल्कि केवल वॉयस कॉल और एसएमएस चाहने वाले उपभोक्ताओं के अधिकारों पर भी अपनी बात रखी। ट्राई ने सभी सेवा प्रदाता कंपनियों को ऐसे विशेष प्लान पेश करने का स्पष्ट निर्देश दिया है जिनमें उपभोक्ताओं को केवल वॉयस कॉलिंग और एसएमएस की सुविधा मिले, और उनके लिए डेटा पैक खरीदना अनिवार्य न हो। लाहोटी ने बताया कि टेलीकॉम कंपनियों की ओर से इस निर्देश पर अभी औपचारिक जवाब नहीं मिला है, लेकिन यह नियम पहले ही अधिसूचित किया जा चुका है और सभी कंपनियों के लिए इसका पालन करना अनिवार्य है।
डेटा का इस्तेमाल न करने वाले करोड़ों ग्राहकों को राहत की जरूरत
नियामक के इस निर्देश के पीछे मुख्य तर्क यह है कि देश के प्रत्येक मोबाइल यूजर को इंटरनेट डेटा की आवश्यकता नहीं होती है। भारत में करोड़ों लोग आज भी साधारण फीचर फोन का उपयोग करते हैं, जिनमें इंटरनेट की सुविधा नहीं होती या वे उसका इस्तेमाल नहीं करते। इसके अलावा वरिष्ठ नागरिकों का भी एक बड़ा वर्ग ऐसा है जो मोबाइल फोन का इस्तेमाल केवल बातचीत करने या जरूरी संदेश प्राप्त करने के लिए करता है। ऐसे उपभोक्ताओं के लिए महंगे कॉम्बो डेटा पैक खरीदना गैर-जरूरी वित्तीय बोझ साबित होता है। उनके लिए केवल वॉयस और एसएमएस वाला किफायती विकल्प अधिक व्यावहारिक और उपयोगी है।
उपभोक्ताओं को जरूरत के अनुसार विकल्प चुनने का अधिकार
ट्राई चेयरमैन के अनुसार, प्रत्येक ग्राहक को वही सेवा खरीदने की स्वतंत्रता होनी चाहिए जिसकी उसे वास्तविक आवश्यकता है। इसका सीधा सिद्धांत यह है कि यदि किसी उपयोगकर्ता को इंटरनेट सेवाओं की दरकार नहीं है, तो उसे अनिवार्य रूप से डेटा सेवाओं के लिए अतिरिक्त भुगतान करने पर मजबूर नहीं किया जाना चाहिए। नियामक का मानना है कि इस तरह के विकल्प उपलब्ध होने से उपभोक्ताओं को अपनी जरूरत के अनुसार सही प्लान चुनने में मदद मिलेगी।



















