मानसून की बारिश के साथ ही प्राकृतिक पर्यटन स्थलों की रौनक लौट आई है। झारखंड के लातेहार जिले में स्थित प्रसिद्ध मिरचैया जलप्रपात इन दिनों अपनी अद्भुत छटा से सैलानियों का दिल जीत रहा है। पहाड़ियों और घने जंगलों के बीच से बहता ठंडा पानी जब विशाल चट्टानों पर गिरता है, तो पूरा नजारा दूधिया सफेद दिखाई देने लगता है। इस प्राकृतिक सौंदर्य और सुहावने मौसम का आनंद लेने के लिए दूर-दूर से लोग यहां पहुंच रहे हैं।
मेदिनीनगर से 60 किलोमीटर दूर स्थित है यह खूबसूरत प्रपात
भौगोलिक स्थिति की बात करें तो यह मनोरम जलप्रपात पलामू जिला मुख्यालय मेदिनीनगर से करीब 60 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। बेतला और महुआडांड़ को जोड़ने वाले मुख्य मार्ग पर मौजूद होने के कारण यहां तक पहुंचना काफी आसान है। इस प्रपात में पानी लगभग 100 फीट की ऊंचाई से सीधा नीचे चट्टानों पर गिरता है। पानी के पत्थरों से टकराने की वजह से बनने वाली झाग दूर से ही दूधिया रंग जैसी दिखती है। इसके साथ ही जंगल में गूंजती पानी की कलकल आवाज प्रकृतिप्रेमियों को अपनी ओर खींच लेती है।
प्राकृतिक कुंड में स्नान और सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम
झरने के नीचे एक प्राकृतिक जलकुंड बना हुआ है, जहां पानी का स्तर आमतौर पर घुटनों तक ही रहता है। सैलानी खुले आसमान के नीचे इस ठंडे पानी में उतरकर स्नान का आनंद लेते हैं। हालांकि, किसी भी अप्रिय घटना या दुर्घटना को रोकने के लिए वन विभाग ने यहां कड़े सुरक्षा प्रबंध किए हैं। खतरनाक और गहरे पानी वाले हिस्सों में पर्यटकों को जाने से रोकने के लिए मुस्तैद गार्ड तैनात किए गए हैं ताकि सभी सुरक्षित रहकर भ्रमण का आनंद उठा सकें।
मात्र 10 रुपये का एंट्री टिकट और पिकनिक का माहौल
पर्यटन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से स्थानीय प्रशासन और वन विभाग ने इस परिसर को विकसित किया है। जलप्रपात क्षेत्र में प्रवेश के लिए प्रति व्यक्ति 10 रुपये का मामूली एंट्री टिकट निर्धारित किया गया है। सैलानियों के बैठने के लिए परिसर में गजीबो और पक्की कुर्षियों का निर्माण कराया गया है। इसके बावजूद कई लोग प्राकृतिक चट्टानों और पेड़ों की छांव में बैठकर घर से लाए भोजन और नाश्ते का मजा लेते हैं। रविवार और त्योहारों की छुट्टियों के दिन मेदिनीनगर और आसपास के इलाकों से भारी संख्या में परिवार और युवा यहां पिकनिक मनाने आते हैं।
जानिए 'मिरचैया' नाम पड़ने के पीछे का दिलचस्प इतिहास
यह जलप्रपात केवल अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए ही नहीं, बल्कि अपने अनूठे नाम के कारण भी जाना जाता है। यहां सुरक्षा में तैनात गार्ड हरिनंद उरांव बताते हैं कि अतीत में इस पहाड़ी क्षेत्र में विशेष प्रकार की 'जैया मिर्च' की बड़े पैमाने पर खेती की जाती थी। यहां पैदा होने वाली मिर्च की मांग न केवल स्थानीय बाजारों में थी, बल्कि पूरे झारखंड, छत्तीसगढ़ और उत्तर प्रदेश तक फैली हुई थी। अत्यधिक मिर्च उत्पादन के कारण ही इस गांव का नाम मिरचैया पड़ा और कालांतर में इस झरने को भी मिरचैया जलप्रपात के नाम से पहचान मिली।
अक्टूबर से मार्च के बीच पहुंचती है सबसे ज्यादा भीड़
यूं तो बारिश के दिनों में चारों तरफ फैली हरियाली और उफनता झरना पर्यटकों को आकर्षित करता है, लेकिन यहां पर्यटन का मुख्य सीजन अक्टूबर से शुरू होकर मार्च तक चलता है। शरद ऋतु और सर्दियों के महीनों में यहां सैलानियों का हुजूम उमड़ पड़ता है। शांति, कुदरती खूबसूरती और एडवेंचर की तलाश करने वालों के लिए यह जगह एक आदर्श गंतव्य बनकर उभरी है।



















