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कुमाऊं की पहाड़ियों में 3300 मीटर ऊंचा ब्रह्मस्थली मंदिर, 3 किलोमीटर ट्रेक कर देखें अद्भुत नजारायात्रा
27 अग॰ 2026, 12:49 pm (1 घंटे पहले)· 2

कुमाऊं की पहाड़ियों में 3300 मीटर ऊंचा ब्रह्मस्थली मंदिर, 3 किलोमीटर ट्रेक कर देखें अद्भुत नजारा

नैनीताल से 17 किमी दूर स्थित ब्रह्मस्थली मंदिर 3300 मीटर की ऊंचाई पर बसा है। विनायक-कुंजाखरक मार्ग से 3 किमी का पैदल ट्रेक कर श्रद्धालु और पर्यटक यहां पहुंचते हैं।

उत्तराखंड के लोकप्रिय पर्वतीय नगर नैनीताल की प्रसिद्ध झीलों और चहल-पहल भरे बाजारों से दूर, कुमाऊं की ऊंची पहाड़ियों पर एक अत्यंत शांत और आध्यात्मिक स्थल स्थित है। नैनीताल मुख्य शहर से लगभग 17 किलोमीटर की दूरी पर बसा ब्रह्मस्थली मंदिर अपनी प्राकृतिक सुंदरता और धार्मिक आस्था के लिए पहचाना जाता है। समुद्र तल से लगभग 3300 मीटर की ऊंचाई पर स्थित यह धार्मिक स्थल घने जंगलों से घिरा हुआ है। इस पवित्र स्थान तक पहुंचने के लिए श्रद्धालुओं और प्रकृति प्रेमियों को करीब 3 किलोमीटर की पैदल यात्रा करनी पड़ती है। यह ट्रेक विनायक और कुंजाखरक मार्ग के मध्य से आरंभ होता है। घने देवदार और बांज के वृक्षों के बीच से होकर गुजरता हुआ यह पहाड़ी मार्ग आगंतुकों को एक विशिष्ट प्राकृतिक और आध्यात्मिक अनुभूति प्रदान करता है।

13वीं शताब्दी की प्राचीन धार्मिक विरासत और स्थानीय परंपराएं

ब्रह्मस्थली मंदिर का इतिहास सदियों पुराना है और इसका संबंध प्राचीन पौराणिक कथाओं से जोड़ा जाता है। स्थानीय लोकमान्यताओं के अनुसार, इस स्थल की स्थापना लगभग 13वीं शताब्दी में हुई थी। माना जाता है कि प्राचीन काल में महान गर्ग ऋषि ने इस दुर्गम पहाड़ी पर कठिन तपस्या की थी और उन्हीं के द्वारा यहां जगत्पिता भगवान ब्रह्मा की मूर्ति स्थापित की गई थी। उत्तराखंड में भगवान ब्रह्मा को समर्पित मंदिर बहुत कम देखने को मिलते हैं, जिसके कारण इस स्थान का धार्मिक महत्व और अधिक बढ़ जाता है। मंदिर परिसर के निकट ही माधव मुनि की एक प्राचीन कुटिया भी बनी हुई है, जो इस स्थान के ऐतिहासिक और आध्यात्मिक परिवेश को और सुदृढ़ करती है।

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इस मंदिर के प्रति आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों के निवासियों की अगाध श्रद्धा है। पंगोट, घुघुखाम, बेतालघाट तथा समीपवर्ती अन्य गांवों के लोग नियमित रूप से यहां दर्शन एवं पूजन के लिए एकत्र होते हैं। इस मंदिर से जुड़ी एक अनोखी लोक परंपरा भी वर्षों से चली आ रही है। स्थानीय निवासियों के अनुसार, जब भी गांव में किसी गाय या भैंस के यहां बछड़े का जन्म होता है, तो उसके पहले दूध को मंदिर परिसर में स्थित पवित्र कुंड में अर्पित किया जाता है। यह परंपरा भगवान ब्रह्मा के प्रति ग्रामीणों के आभार और गहरी निष्ठा का प्रतीक मानी जाती है। सदियों से चली आ रही यह परंपरा आज भी इन पर्वतीय क्षेत्रों में पूरी जीवंतता के साथ निभाई जाती है।

देवदार और बांज के जंगलों के बीच 3 किलोमीटर का रोमांचक ट्रेक

ब्रह्मस्थली मंदिर तक की यात्रा केवल एक धार्मिक दर्शन नहीं, बल्कि साहसिक ट्रेकिंग का एक उत्कृष्ट अनुभव भी है। मंदिर पहुंचने का मार्ग विनायक और कुंजाखरक सड़क मार्ग के एक बिंदु से शुरू होता है। यहां से 3 किलोमीटर का पैदल ट्रेक पूरी तरह से घने प्राकृतिक जंगलों के बीच से होकर गुज़रता है। रास्ते में बांज और देवदार के ऊंचे-ऊंचे वृक्ष आच्छादित हैं, जो मार्ग को छायादार और मनोरम बनाते हैं। जैसे-जैसे यात्री चोटी की ओर बढ़ते हैं, चढ़ाई की ढलान काफी तीव्र और चुनौतीपूर्ण होती जाती है, जो ट्रेकिंग के शौकीनों के रोमांच को द्विगुणित कर देती है।

सफर के दौरान जंगलों में फैली असीम शांति और भांति-भांति के पक्षियों का कलरव मन को सुकून देता है। शहरी जीवन के शोर-शराबे से दूर, ठंडी पहाड़ी हवाएं और वनस्पतियों की सोंधी महक यात्रियों की थकान दूर करने में सहायक होती हैं। हालांकि यह चढ़ाई शारीरिक रूप से थोड़ी थका देने वाली होती है, लेकिन जंगल के मार्ग से गुजरते हुए बदलते प्राकृतिक दृश्य इस पैदल सफर को अत्यंत रोचक बना देते हैं।

3300 मीटर की ऊंचाई से हिमालय और कुमाऊं की पहाड़ियों का विहंगम दृश्य

पहाड़ी की अंतिम चोटी पर स्थित ब्रह्मस्थली मंदिर पहुंचने के बाद वहां से दिखाई देने वाला परिदृश्य अत्यंत विहंगम और अद्भुत होता है। समुद्र तल से 3300 मीटर की ऊंचाई पर खड़े होकर चारों दिशाओं में फैली विशाल पर्वत श्रृंखलाओं और हरे-भरे जंगलों का स्पष्ट नजारा दिखता है। चोटी पर खड़े होकर आसपास के कई प्रसिद्ध पर्वतीय क्षेत्रों को निहारा जा सकता है। यहां से नैनीताल, पंगोट, घुघुखाम, कोटाबाग और बेतालघाट की सुंदर पहाड़ियों का मनोरम दृश्य दिखाई देता है।

यदि मौसम पूरी तरह साफ और खुला हो, तो ब्रह्मस्थली की चोटी से अल्मोड़ा और रानीखेत की ओर फैली दूरस्थ पहाड़ियों के साथ-साथ हिमालय की विशाल बर्फ से ढकी चोटियों के भी दर्शन होते हैं। यह स्थान फोटोग्राफी के प्रेमियों के लिए एक आदर्श गंतव्य है, जहां सूर्योदय और सूर्यास्त के समय पहाड़ियों पर बिखरने वाली सुनहरी धूप अद्भुत दृश्य निर्मित करती है। चोटी पर पहुंचकर मिलने वाला अलौकिक सुकून ट्रेक की पूरी थकान को पल भर में मिटा देता है।

मानसून में प्राकृतिक निखार, कैंपिंग का अनुभव और यात्रा की जरूरी सावधानियां

वर्ष के विभिन्न मौसमों में ब्रह्मस्थली का वातावरण बदलता रहता है, लेकिन मानसून के दौरान इस पूरे क्षेत्र का सौंदर्य चरम पर होता है। वर्षा ऋतु के पश्चात जंगलों का हरा रंग और अधिक गहरा एवं जीवंत हो जाता है। पहाड़ियों पर तैरते धुंध के बादल और चोटियों को छूकर गुजरती घनी घटाएं इस स्थान को एक काल्पनिक दृश्य जैसा रूप प्रदान करती हैं। कई बार बादल इतने नीचे आ जाते हैं कि लगता है जैसे आप बादलों के बीच यात्रा कर रहे हों।

स्थानीय ट्रेकर मनोज बताते हैं कि ब्रह्मस्थली का ट्रेक बेहद खूबसूरत है और वह अक्सर प्रकृति के बीच शांति की खोज में यहां आते हैं। उनके अनुसार, रात के समय यदि आसमान साफ हो, तो यहां से नीचे घाटियों में जलती दूर-दराज के गांवों की रोशनियां और ऊपर तारों से भरा आकाश एक जादुई अनुभव कराता है। यह क्षेत्र रात में कैंपिंग के लिए भी बेहद उपयुक्त माना जाता है। हालांकि, कैंपिंग करने से पूर्व यात्रियों को स्थानीय प्रशासन और वन विभाग के सुरक्षा नियमों की जानकारी अवश्य जुटा लेनी चाहिए।

मानसून में यात्रा करते समय विशेष सतर्कता बरतने की सलाह दी जाती है। बारिश के कारण मिट्टी और पत्थरों वाला पैदल रास्ता काफी फिसलन भरा हो सकता है। ऐसे में ट्रेकर्स को मजबूत ग्रिप वाले ट्रैकिंग जूते पहनकर ही चढ़ाई करनी चाहिए। साथ ही, प्राथमिक चिकित्सा किट, पर्याप्त पेयजल, रेनकोट और आवश्यक बरसाती सामान साथ रखना अनिवार्य है। मौसम का पूर्व अनुमान देखकर ही यात्रा की योजना बनाना समझदारी भरा कदम होगा।

सवाल-जवाब

ब्रह्मस्थली मंदिर कहां स्थित है और यह नैनीताल से कितना दूर है?
ब्रह्मस्थली मंदिर उत्तराखंड में नैनीताल मुख्य शहर से लगभग 17 किलोमीटर की दूरी पर विनायक-कुंजाखरक मार्ग के समीप एक ऊंची पहाड़ी पर स्थित है।
ब्रह्मस्थली मंदिर पहुंचने के लिए कितना पैदल चलना पड़ता है?
मंदिर तक पहुंचने के लिए विनायक-कुंजाखरक मार्ग से घने बांज और देवदार के जंगलों के बीच से होकर करीब 3 किलोमीटर का पैदल ट्रेक करना पड़ता है।
ब्रह्मस्थली मंदिर का धार्मिक इतिहास और मान्यता क्या है?
यह मंदिर 13वीं शताब्दी का माना जाता है, जहां गर्ग ऋषि ने तपस्या कर भगवान ब्रह्मा की स्थापना की थी। यहां पशु के पहले दूध को मंदिर कुंड में चढ़ाने की पुरानी लोक परंपरा है।
ब्रह्मस्थली मंदिर समुद्र तल से कितनी ऊंचाई पर है और वहां से क्या दिखता है?
यह मंदिर लगभग 3300 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। साफ मौसम में यहां से नैनीताल, पंगोट, अल्मोड़ा, रानीखेत और हिमालय की पर्वत श्रृंखलाएं दिखाई देती हैं।
मानसून में ब्रह्मस्थली ट्रेक करते समय क्या सावधानियां रखनी चाहिए?
बारिश के दौरान रास्ता फिसलन भरा हो जाता है। इसलिए मजबूत ग्रिप वाले जूते पहनें, बरसाती व प्राथमिक चिकित्सा किट साथ रखें और मौसम का पूर्वानुमान देखकर ही निकलें।
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