घर के आंगन, छत या बालकनी में खुद उगाई गई हरी सब्जियों का स्वाद और शुद्धता बाजार से खरीदी गई सब्जियों से काफी बेहतर होती है। पौधों पर लटकती ताजी सब्जियां देखकर जहां मन प्रसन्न होता है, वहीं परिवार को रसायनों से मुक्त पौष्टिक आहार भी प्राप्त होता है। यदि आप घर पर बागवानी करने का मन बना रहे हैं, तो करेले की बेल को गमले में लगाना एक बेहतरीन विकल्प साबित हो सकता है। यह बेल जमीन पर फैलने के बजाय लंबवत यानी ऊपर की ओर बढ़ती है, इसलिए सीमित स्थान वाले शहरी घरों और फ्लैटों के लिए यह पूरी तरह उपयुक्त है।
करेले की सफल बागवानी के लिए बहुत अधिक तामझाम की आवश्यकता नहीं होती है। केवल उपयुक्त आकार के गमले का चयन, भुरभुरी और पोषक तत्वों से भरपूर मिट्टी, भरपूर धूप और बेल को ऊपर चढ़ाने के लिए एक मजबूत ढांचे की जरूरत होती है। शुरुआती दिनों में यदि थोड़ी सावधानी और योजनाबद्ध तरीके से काम किया जाए, तो कुछ ही सप्ताह में पौधे पर फूल और फिर करेले लटकते हुए नजर आने लगते हैं।
गमले का चुनाव और धूप की सही व्यवस्था
करेले की जड़ें तेजी से विकसित होती हैं और बेल भी काफी घनी हो जाती है, इसलिए इसके लिए कभी भी छोटे आकार का बर्तन या कंटेनर नहीं चुनना चाहिए। पौधे के समुचित विकास के लिए कम से कम 15 से 18 इंच गहरा और इतना ही चौड़ा गमला इस्तेमाल करना आदर्श माना जाता है। गमला चाहे मिट्टी का हो या प्लास्टिक का, उसके पेंदे में पानी की उचित निकासी के लिए पर्याप्त छेद होने बेहद अनिवार्य हैं। यदि अतिरिक्त पानी गमले से बाहर नहीं निकल पाएगा और मिट्टी लगातार गीली रहेगी, तो जड़ों में सड़न पैदा हो जाएगी और पौधा सूख सकता है।
स्थान के चयन के मामले में यह ध्यान रखें कि करेले का पौधा गर्म मौसम और तेज रोशनी में सबसे तेजी से फलता-फूलता है। ऐसे में गमले को ऐसी जगह पर रखना चाहिए जहां उसे प्रतिदिन कम से कम 6 से 8 घंटे की सीधी धूप मिल सके। अपार्टमेंट की धूपदार बालकनी या घर की खुली छत इस पौधे के लिए सबसे आदर्श स्थान साबित होती है। छायादार जगह पर रखने से पौधे में पत्तियां तो बहुत आएंगी, लेकिन फल लगने की संभावना काफी घट जाएगी।
पौष्टिक और हल्की मिट्टी का मिश्रण ऐसे बनाएं
करेले की बेल की अच्छी बढ़त के लिए भारी और सख्त मिट्टी बिल्कुल अनुकूल नहीं होती है। जड़ों के आसान फैलाव के लिए हल्का और हवादार पॉटिंग मिक्स तैयार करना चाहिए। इसके लिए साधारण बगीचे की मिट्टी, सड़ी हुई गोबर की खाद या केंचुआ खाद यानी कम्पोस्ट और कोकोपीट को बराबर अनुपात में मिलाकर मिश्रण तैयार किया जा सकता है। यह संयोजन मिट्टी में नमी को संतुलित बनाए रखने के साथ-साथ आवश्यक पोषण प्रदान करता है और जलभराव को रोकता है।
यदि आपके क्षेत्र की मिट्टी बहुत अधिक चिकनी या गाद वाली है, तो उसमें थोड़ी मात्रा में साफ बालू रेत मिला लें जिससे जलनिकासी बेहतर हो सके। गमले में यह मिट्टी भरते समय ऊपर से दो से तीन इंच जगह खाली छोड़ देनी चाहिए, ताकि पानी डालते समय मिट्टी और खाद बाहर न छलके। एक बात का विशेष ध्यान रखें कि शुरुआत में ही आवश्यकता से अधिक रासायनिक खाद या भारी खाद डालने की भूल न करें, अन्यथा छोटे पौधे झुलस सकते हैं।
बीज की तैयारी और सही तरीके से बुवाई
अच्छी पैदावार पाने के लिए हमेशा किसी प्रमाणित बीज भंडार या नर्सरी से उन्नत किस्म के बीज ही खरीदने चाहिए। करेले के बीजों का बाहरी छिलका काफी कड़ा और मोटा होता है, जिसकी वजह से सीधे बोने पर अंकुरण में अधिक समय लग सकता है। बीजों को मिट्टी में लगाने से पहले लगभग कुछ घंटों के लिए साफ गुनगुने या सामान्य पानी में भिगोकर रख देना चाहिए। पानी सोखने से छिलका थोड़ा नरम हो जाता है और अंकुरण की प्रक्रिया तेज हो जाती है।
तैयार गमले की मिट्टी में लगभग एक इंच गहरा गड्ढा बनाकर दो से तीन बीज डाल दें और फिर उनके ऊपर हल्की मिट्टी की परत बिछा दें। इसके बाद फव्वारे या स्प्रेयर की मदद से हल्के हाथों से पानी दें। कभी भी मग या पाइप की तेज धार से सीधा पानी न डालें, क्योंकि तेज बहाव से बीज गहराई में चले जाते हैं या अपनी जगह से हटकर सतह पर आ सकते हैं।
अंकुरण की देखभाल और पौधों की छंटाई
बीज बोने के बाद गमले को गर्म और उजाले वाली जगह पर रखना आवश्यक है। सामान्य तापमान और अनुकूल नमी मिलने पर बीज लगभग 7 से 10 दिनों के भीतर अंकुरित होकर बाहर निकलने लगते हैं। कुछ दिनों बाद जब पौधे लगभग 3 से 4 इंच बड़े हो जाएं और उनमें कई पत्तियां दिखने लगें, तो उनमें से केवल एक सबसे स्वस्थ और मजबूत पौधे को गमले में बनाए रखें। बाकी कमजोर पौधों को सावधानीपूर्वक काटकर हटा देना चाहिए, ताकि मुख्य पौधे को पूरा पोषण और स्थान मिल सके।
लकड़ी या जाली से सहारा देना है बेहद जरूरी
चूंकि करेला एक लता यानी बेल वर्गीय सब्जी है, इसलिए जैसे ही पौधा बड़ा होने लगे, उसे सहारा देना अनिवार्य हो जाता है। बेल को फर्श या मिट्टी पर फैलने देने से पत्तियों में कीड़े लगने और सड़न का खतरा बढ़ जाता है, जबकि ऊपर चढ़ाने से फल सुरक्षित रहते हैं और जगह की बचत होती है। इसके लिए आप लकड़ी की खपच्चियों, बांस, नायलॉन की जाली या लोहे की ग्रिल का इस्तेमाल कर सकते हैं।
जब पौधे से मुख्य बेल और उप-शाखाएं निकलने लगें, तो उन्हें हल्के हाथों से जाली या डंडे की ओर मोड़कर दिशा दें। बेल को कभी भी तार या धागे से बहुत कसकर नहीं बांधना चाहिए। तने को सुरक्षित रखने के लिए किसी मुलायम सूती कपड़े की पट्टी या ढीली रस्सी का सहारा लेकर सहारा देना सबसे सुरक्षित तरीका है।
पानी का सही संतुलन, खाद और कीट नियंत्रण
गमले में लगे पौधे को पानी देते समय हमेशा मिट्टी की ऊपरी सतह की जांच करें। यदि ऊपरी एक इंच मिट्टी सूखी महसूस हो, तभी उसमें पानी डालें। केवल नियमित आदत के आधार पर रोज-रोज गमला भरने से बचें। विशेष रूप से बरसात के दिनों में यह सुनिश्चित करें कि गमले में पानी न ठहरे। बेल की बेहतर बढ़वार और अधिक फल पाने के लिए पौधे की वृद्धि के दौरान हर 15 से 20 दिनों के अंतराल पर थोड़ी मात्रा में अच्छी तरह सड़ी हुई जैविक कम्पोस्ट खाद देनी चाहिए। इसके अलावा समय-समय पर पत्तियों के निचले हिस्से का निरीक्षण करते रहें ताकि किसी भी प्रकार के चिपचिपे कीड़ों या सफेद फफूंद का संक्रमण होने पर तुरंत जैविक उपचार किया जा सके।
हाथ से परागण कर बढ़ाएं फलों की संख्या
करेले की बेल पर दो तरह के फूल खिलते हैं, जिनमें नर फूल और मादा फूल अलग-अलग होते हैं। मादा फूल के पीछे छोटा सा करेला पहले से बना हुआ दिखता है। यदि आपके घर के आसपास मधुमक्खियां, तितलियां या अन्य परागण करने वाले कीट कम संख्या में आते हैं, तो कई बार फूल झड़ जाते हैं और फल नहीं बन पाते। ऐसी स्थिति में सुबह के समय एक ताजा नर फूल तोड़कर उसकी पंखुड़ियां हटा दें और उसके परागकणों को धीरे से मादा फूल के बीच वाले हिस्से पर स्पर्श कराकर हाथ से परागण कर दें। इस साधारण तकनीक से फल बनने की संभावना कई गुना बढ़ जाती है।



















