हिमालयी देश नेपाल के सबसे बड़े धार्मिक उत्सव दशैं के दौरान टीका लगाने की रस्म को लेकर शुभ मुहूर्त सामने आ चुके हैं। नेपाली समुदाय में इस अनुष्ठान का विशेष महत्व माना गया है, जिसमें घर के बुजुर्ग अपने से छोटे परिजनों के मस्तक पर अक्षत, दही और रोली से बना टीका लगाकर जमरा अर्पित करते हैं। वर्ष 2026 के पंचांग के मुताबिक काठमांडू में यह अनुष्ठान 21 अक्टूबर की सुबह 10:26 बजे निर्धारित है। वहीं सीमा पार भारत की राजधानी दिल्ली में बसे नेपाली परिवारों के लिए यही मंगल मुहूर्त उसी तारीख को सुबह 9:11 बजे का रहेगा। दोनों स्थानों के लिए तय यह समय वहां की स्थानीय घड़ियों के अनुरूप है।
भारत और नेपाल में तिथियों का यह बदलाव क्यों
विजयादशमी के मौके पर एक ही पर्व की तिथियों को लेकर अक्सर लोगों के मन में जिज्ञासा रहती है। वर्ष 2026 में उत्तर, मध्य और पश्चिमी भारत के अधिकांश हिस्सों में दशहरा 20 अक्टूबर को मनाया जा रहा है, जबकि नेपाल में मुख्य आयोजन यानी दशैं टीका 21 अक्टूबर को संपन्न होगा। इसके विपरीत भारत के पश्चिम बंगाल राज्य जैसे कई क्षेत्रों में विजयादशमी से जुड़ी गतिविधियां 21 अक्टूबर के दिन ही पड़ रही हैं।
इस फेरबदल की मुख्य वजह दोनों भूभागों में पंचांग की अलग गणनाएं, दशमी तिथि के लगने का समय और स्थानीय सूर्योदय का समय है। दोपहर के पूजा मुहूर्त और तिथियों के आरंभ व समापन के आधार पर क्षेत्रीय परंपराएं अलग-अलग दिन तय करती हैं। इसके अलावा दोनों देशों के आधिकारिक टाइम जोन में पंद्रह मिनट का स्वाभाविक अंतर भी मौजूद है, लेकिन मुहूर्तों के निर्धारण में सूर्योदय और वैदिक पंचांग के नियम मुख्य भूमिका निभाते हैं।
पंचांग समितियों द्वारा अधिकृत समय
नेपाल पञ्चाङ्ग निर्णायक विकास समिति ने काठमांडू में दशैं टीका लगाने के लिए 21 अक्टूबर को सुबह 10:26 बजे का शुभ समय अधिकृत किया है। दूसरी तरफ, अंतरराष्ट्रीय पंचांग निर्धारण समिति ने भारत सहित अन्य देशों में निवासरत प्रवासी नेपाली नागरिकों की सुविधा को देखते हुए अलग-अलग शहरों के मुताबिक अनुष्ठान का समय जारी किया है। इसी क्रम में दिल्ली के लिए सुबह 9:11 बजे का समय निकाला गया है, ताकि प्रवासी परिवार अपने स्थानीय समय के अनुसार धार्मिक परंपरा का विधिपूर्वक पालन कर सकें।
पारिवारिक मिलन और टीका-जमरा का आध्यात्मिक पक्ष
दशैं को नेपाली समाज में केवल एक धार्मिक विधि नहीं बल्कि आत्मीय मिलन का उत्सव माना जाता है। इस अवसर पर लोग दूर-दराज से अपने पैतृक निवास पहुंचते हैं, देवी दुर्गा की आराधना करते हैं और परिवार के सभी सदस्य एकत्र होते हैं। मस्तक पर लगाया जाने वाला लाल टीका और जौ के अंकुरों से तैयार जमरा को भगवती का साक्षात प्रसाद माना जाता है।
अनुष्ठान के दौरान परिवार के वयोवृद्ध सदस्य छोटों को सुख, दीर्घायु, शांति और सफलता की कामना के साथ शुभाशीष देते हैं। धार्मिक मान्यताओं में यह उत्सव अधर्म पर धर्म और बुराई पर अच्छाई की शाश्वत विजय का संदेश देता है, जिसे भारत में दशहरा के नाम से भी श्रद्धापूर्वक मनाया जाता है। अलग-अलग भूभागों में पूजन के तौर-तरीके और शुभ घड़ियां भिन्न हो सकती हैं, लेकिन उत्सव के मूल में निहित सद्भाव और विजय की भावना एक समान रहती है।


















