नवरात्रि का उत्सव केवल धार्मिक आस्था और उपासना का ही माध्यम नहीं है, बल्कि सदियों से चली आ रही इसकी पूजा परंपराएं सीधे तौर पर मानव स्वास्थ्य और तंदुरुस्ती से जुड़ी हुई हैं। शारदीय नवरात्रि के पांचवें दिन मां दुर्गा के पंचम स्वरूप मां स्कंदमाता की उपासना की जाती है। इस स्वरूप को पीला रंग विशेष रूप से भाता है, जिसके कारण साधक पीले रंग का नैवेद्य अर्पित करते हैं। मां स्कंदमाता को केला, शहद और पीली मिठाइयों का अर्पण किया जाता है। पूरे नौ दिनों के अनुष्ठान के दौरान कलश स्थापना से लेकर हवन और आरती तक लौंग, पान, ज्वार और विभिन्न मेवे चढ़ाए जाते हैं।
धार्मिक दृष्टिकोण के साथ अगर इन सामग्रियों को आयुर्वेद के नजरिए से देखा जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि पूजा में उपयोग होने वाला हर पदार्थ औषधीय गुणों का भंडार है। ऋतु परिवर्तन के समय आने वाले इस पर्व में उपवास और इन सात्विक चीजों का सेवन शरीर की आंतरिक सफाई करता है। यह प्रसाद पाचन तंत्र, श्वसन प्रणाली और रोग प्रतिरोधक क्षमता को सुदृढ़ बनाकर तन और मन को ताजगी प्रदान करता है।
दांत और पेट के लिए रामबाण है लौंग
हवन और पूजा में अनिवार्य रूप से उपयोग की जाने वाली लौंग को आयुर्वेद में प्राकृतिक दर्द निवारक का दर्जा प्राप्त है। लौंग में मौजूद यूजेनॉल नामक सक्रिय तत्व इसे शक्तिशाली एंटी बैक्टीरियल और एंटी इंफ्लेमेटरी क्षमता देता है। यदि किसी को दांत दर्द, माइग्रेन या सिरदर्द की समस्या सता रही हो, तो लौंग का उपयोग तुरंत आराम दिलाता है।
इसके नियमित सेवन से मुंह की दुर्गंध दूर होती है और सांसों में ताजगी बनी रहती है। बदलते मौसम में होने वाली सर्दी, खांसी और जुकाम से राहत पाने के लिए लौंग बेहद कारगर मानी जाती है। पाचन के स्तर पर यह पेट की गैस, एसिडिटी और भारीपन को शांत कर पाचन क्रिया को दुरुस्त रखती है और शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत करती है।
ज्वारे का रस है पोषक तत्वों से भरा प्राकृतिक टॉनिक
नवरात्रि में कलश स्थापना के समय बोए जाने वाले जौ यानी ज्वार का आध्यात्मिक और स्वास्थ्य दोनों दृष्टि से गहरा महत्व है। आयुर्वेद में ज्वारे के रस को अमृत के समान माना गया है, क्योंकि यह विटामिन्स, मिनरल्स और एंटीऑक्सीडेंट्स का बेहतरीन स्रोत है। यह रस शरीर से हानिकारक तत्वों को बाहर निकालकर आंतरिक शुद्धिकरण करता है।
डायबिटीज के मरीजों के लिए ज्वारे का रस रक्त शर्करा के स्तर को संतुलित रखने में मदद करता है। यह मेटाबॉलिज्म को तेज कर पाचन में सुधार लाता है और वजन नियंत्रित करने में सहायक साबित होता है। इसके साथ ही जोड़ों में होने वाले दर्द और सूजन को कम करने में भी इसके पोषक तत्व महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
मुख शुद्धि और श्वसन के लिए पान के पत्ते का उपयोग
नवरात्रि के नौ स्वरूपों के अलावा दस महाविद्याओं की साधना में भी तांबूल यानी पान के पत्ते का विशेष स्थान है। विशेष रूप से मां कात्यायनी की आराधना के समय साधक मुख में पान का पत्ता रखकर मंत्र जाप करते हैं। औषधीय दृष्टि से पान का पत्ता एंटीसेप्टिक गुणों से भरा होता है, जो मुंह के भीतर हानिकारक बैक्टीरिया का खात्मा कर सांसों की बदबू समाप्त करता है।
पान के पत्तों में भरपूर मात्रा में विटामिन सी और कैल्शियम मौजूद होता है, जिससे शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। यह पत्ता पाचन रसों के स्राव को तेज करता है, जिससे कब्ज, एसिडिटी और अपच की परेशानी दूर होती है। श्वसन तंत्र को साफ रखने और पुरानी खांसी में राहत पहुंचाने के लिए भी इसका सेवन लाभकारी माना गया है।
खून की कमी दूर कर ऊर्जा देती है किशमिश
देवी दुर्गा के भोग में सूखे मेवों के रूप में किशमिश अर्पित की जाती है। आयुर्वेद में किशमिश को उत्तम रक्त शोधक और शारीरिक बल बढ़ाने वाली औषधि माना गया है। आयरन की प्रचुर मात्रा होने के कारण यह एनीमिया की शिकायत को दूर कर हीमोग्लोबिन के स्तर को तेजी से सुधारती है।
किशमिश में मौजूद फाइबर आंतों को साफ कर कब्ज से स्थायी राहत दिलाते हैं और हृदय प्रणाली को स्वस्थ बनाए रखते हैं। इसके एंटीऑक्सीडेंट तत्व शरीर की थकान मिटाकर ऊर्जा का संचार करते हैं तथा त्वचा में प्राकृतिक निखार लाते हैं।
गुड़ से मिलता है शरीर को पोषण और प्राकृतिक गर्माहट
गुप्त नवरात्रि के पहले दिन मां काली की पूजा की जाती है, जिन्हें गुड़ का भोग अत्यंत प्रिय है। आयुर्वेद में गुड़ को मिठास का सबसे शुद्ध और गुणकारी स्रोत स्वीकार किया गया है। इसमें आयरन, मैग्नीशियम और पोटेशियम जैसे आवश्यक खनिज प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं, जो हड्डियों को सुदृढ़ बनाते हैं और खून की कमी से बचाते हैं।
गुड़ शरीर के तापमान को संतुलित रखकर ठंड से बचाता है और फेफड़ों व श्वासनली को साफ कर श्वसन विकारों में आराम पहुंचाता है। यह पाचन क्रिया को तेज कर कब्ज रोकता है और शरीर को डिटॉक्स करता है। महिलाओं के लिए मासिक धर्म के दौरान होने वाले दर्द और ऐंठन से राहत पाने में भी गुड़ का सेवन अत्यंत उपयोगी सिद्ध होता है।
हड्डियों की मजबूती और वात शमन के लिए तिल
पूजा अनुष्ठान और हवन में काले और सफेद दोनों प्रकार के तिलों का प्रयोग किया जाता है। आयुर्वेद के अनुसार तिल वात दोष को शांत करने वाला और शरीर को गहरा पोषण देने वाला आहार है। तिल में कैल्शियम की उच्च मात्रा पाई जाती है, जो हड्डियों के घनत्व को बढ़ाकर ऑस्टियोपोरोसिस जैसी गंभीर बीमारी से सुरक्षा प्रदान करती है।
तिल का सेवन जोड़ों के दर्द, जकड़न और सूजन को दूर कर शरीर को निरंतर ऊर्जा प्रदान करता है। इसके अलावा इसमें मौजूद प्राकृतिक तेल त्वचा में नमी बनाए रखते हैं, बालों की जड़ों को मजबूत करते हैं और रोग प्रतिरोधक क्षमता में वृद्धि करते हैं।
त्रिदोष नाशक और पाचन रक्षक छोटी इलायची
मां दुर्गा को अर्पित की जाने वाली हरी इलायची को आयुर्वेद में वात, पित्त और कफ तीनों दोषों को शांत करने वाली त्रिदोष नाशक औषधि माना जाता है। इलायची का सेवन पेट में बनने वाली गैस, भारीपन और ब्लोटिंग की समस्या को तुरंत खत्म कर पाचन अग्नि को प्रदीप्त करता है।
इलायची श्वसन तंत्र की नलियों को साफ कर बलगम और खांसी से मुक्ति दिलाती है। इसके जीवाणुरोधी गुण मुंह को तरोताजा रखते हैं। इलायची में पाए जाने वाले शक्तिशाली एंटीऑक्सीडेंट्स दिल की सेहत को दुरुस्त रखते हैं और शरीर की बीमारियों से लड़ने की ताकत बढ़ाते हैं।
कफ संतुलन और संक्रमण से बचाव करता है शुद्ध शहद
मां स्कंदमाता के प्रिय भोग में शामिल शहद को आयुर्वेद में संजीवनी या अमृत तुल्य माना गया है। शहद प्राकृतिक एंटी बैक्टीरियल, एंटी इंफ्लेमेटरी और एंटीऑक्सीडेंट गुणों से संपन्न होता है। यह कफ दोष को संतुलित करने में अद्वितीय परिणाम देता है।
खांसी, गले की खराश, सर्दी और जुकाम होने पर शहद का सेवन गले को तुरंत आराम पहुंचाता है। यह शरीर के भीतर और बाहर के घावों को जल्दी भरने में सहायक है। इसके साथ ही यह पाचन तंत्र को संतुलित रखता है, आंतों के स्वास्थ्य को सुधारता है और शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को कई गुना मजबूत बनाता है।



















