राजस्थान में आईटीआई का कायाकल्प करने की शुरुआत, भिवाड़ी क्लस्टर पर खर्च होंगे 241 करोड़ रुपयेलाइव: मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ विरोध तेज, राहुल गांधी और विपक्षी दलों की एसआईआर याचिका पर शीर्ष अदालत में आज सुनवाई संभवअमेरिकी मुद्रास्फीति आंकड़ों के बीच ब्रिटिश पाउंड 1.3200 के ऊपर संभला, बैंक ऑफ इंग्लैंड की दरों पर टिकी नजरेंकच्चे तेल में पांच दिनों की तेजी थमी, अमेरिकी प्रतिबंधों में ढील की चर्चा से फिसला डब्ल्यूटीआईचीन के केंद्रीय बैंक ने युआन की दैनिक संदर्भ दर बढ़ाकर 6.7253 तय कीकोलकाता हाईकोर्ट ने महुआ मोइत्रा को दिया निर्देश, 24 घंटे में हटाएं वोट चोरी से जुड़ा सोशल मीडिया पोस्टबाड़मेर में एंटी नारकोटिक्स टास्क फोर्स ने पकड़ा एक लाख का इनामी तस्कर, बचने के लिए घर में पाल रखे थे आठ कुत्तेक्रिश्चियन तिराहे पर धमाके के बाद भड़की आग, तीन कपड़ा शोरूम जलकर खाकमौसम का बदला मिजाज: उत्तर भारत से लेकर दक्षिण तक 9 मौसमी तंत्र सक्रिय, बारिश और आंधी की चेतावनीबिना प्याज-लहसुन के 10 मिनट में बनाएं चटपटे मट्ठा के आलू, चावल के साथ परोसें खास देसी स्वाद
रांची के हजदा में आदिवासियों ने पत्थरों पर उकेरा संविधान, जमीन बचाने के लिए पांचवीं अनुसूची को बनाया ढालझारखंड
15 अक्तू॰ 2026, 6:44 am (1 घंटे पहले)· 0

रांची के हजदा में आदिवासियों ने पत्थरों पर उकेरा संविधान, जमीन बचाने के लिए पांचवीं अनुसूची को बनाया ढाल

दसम वाटरफॉल के पास स्थित हजदा गांव के मुंडा आदिवासियों ने अपनी जमीन की रक्षा के लिए सड़क किनारे विशाल पत्थरों पर संविधान की पांचवीं अनुसूची और अपने अधिकारों के अनुच्छेद दर्ज कराए हैं।

झारखंड में अपनी पुरखों की जमीन और अधिकारों की हिफाजत के लिए ग्रामीणों ने एक अनोखी और कानूनी मिसाल पेश की है। राजधानी रांची से लगभग 30 किलोमीटर दूर, मशहूर दसम वाटरफॉल के नजदीक बसे हजदा गांव के प्रवेश मार्ग पर सड़क किनारे विशालकाय पत्थरों पर भारत के संविधान के महत्वपूर्ण प्रावधान उकेरे गए हैं। इन शिलाखंडों पर विशेष रूप से संविधान की पांचवीं अनुसूची और आदिवासियों के अधिकारों से जुड़े प्रमुख अनुच्छेदों को पत्थर पर ही पत्थर से तराश कर लिखा गया है, ताकि गांव की सीमा में दाखिल होने वाले हर शख्स को आदिवासियों के संवैधानिक अधिकारों की सीधी जानकारी मिल सके।

जमीन हड़पने की कोशिशों के खिलाफ संवैधानिक ढाल

हजदा गांव के निवासी सुरेश उरांव का कहना है कि क्षेत्र में अक्सर बाहरी लोग आकर ग्रामीणों को भ्रमित करते रहे हैं और उनकी कीमती जमीनें हड़पने का प्रयास करते रहे हैं। ग्रामीणों को पहले अपने कानूनी और संवैधानिक अधिकारों की पूरी जानकारी नहीं होती थी, जिसका फायदा उठाकर लोग उन्हें गुमराह कर देते थे। इसी से बचने के लिए ग्रामीणों ने एकजुट होकर संविधान में आदिवासियों को दिए गए अधिकारों को हमेशा के लिए पत्थरों पर दर्ज कराने का फैसला किया, जिससे कोई भी व्यक्ति उन्हें बेवकूफ न बना सके।

ये भी पढ़ें

पत्थर पर पत्थर से तराशी गई पांचवीं अनुसूची

सुरेश के अनुसार, सड़क किनारे लगे इन बड़े पत्थरों पर पत्थर की मदद से ही पांचवीं अनुसूची के वे सभी प्रावधान लिखे गए हैं, जो मुंडा आदिवासियों के हितों और अधिकारों की सुरक्षा करते हैं। आम लोगों के लिए संविधान के अनुच्छेदों को मौखिक तौर पर याद रखना संभव नहीं होता, इसलिए इसे सार्वजनिक रूप से पत्थरों पर अंकित कर दिया गया है। इसका मुख्य उद्देश्य यह है कि किसी भी बाहरी व्यक्ति को अलग से समझाने की आवश्यकता न पड़े, बल्कि वे गांव में प्रवेश करते ही इन शिलाओं पर नजर डालें, प्रावधानों को पढ़ें और यह समझ लें कि ग्रामीण अब अपने अधिकारों को लेकर पूरी तरह जागरूक हैं।

फैक्ट्री के वादों और बेदखली के डर पर दो टूक जवाब

ग्रामीणों ने औद्योगिक विकास के नाम पर दिए जाने वाले प्रलोभनों पर भी अपनी स्पष्ट राय रखी है। उनका कहना है कि बाहरी लोग यहां आकर फैक्ट्रियां लगाने, नौकरियां देने और तरह-तरह के विकास कार्य कराने के वादे करते हैं। ग्रामीणों का साफ तौर पर मानना है कि उन्हें ऐसे किसी वादे की जरूरत नहीं है और वे अपनी पारंपरिक जीवनशैली में ही खुश हैं। उनका अनुभव बताता है कि कारखानों के नाम पर करोड़ों रुपये की जमीनें ले ली जाती हैं, जिससे बाहरी लोग तो भारी मुनाफा कमाते हैं, लेकिन स्थानीय आदिवासी अपनी ही पैतृक जमीन गंवाकर उन्हीं कारखानों में मजदूर बनकर रह जाते हैं और उनका जीवन बदहाल हो जाता है।

अधिकारों का पुख्ता प्रमाण और विस्थापन का विरोध

गांव के ही सुरेंद्र आग का कहना है कि पत्थरों पर उकेरा गया यह संविधान उनके कानूनी दावों का ठोस प्रमाण है। ग्रामीण किसी हवा-हवाई बात के बजाय भारत सरकार द्वारा संविधान में दिए गए अधिकारों के आधार पर बात कर रहे हैं। ग्रामीणों ने करीब 3-4 साल पहले ही इन पत्थरों को जगह-जगह स्थापित किया है, ताकि आने-जाने वाले हर व्यक्ति की नजर इन पर आसानी से पड़ सके। ग्रामीणों का स्पष्ट संदेश है कि वे अपनी जमीन छोड़कर कहीं नहीं जाएंगे और संवैधानिक सुरक्षा के रहते कोई भी उन्हें उनकी भूमि से बेदखल नहीं कर सकता।

सवाल-जवाब

हजदा गांव कहां स्थित है और वहां पत्थरों पर क्या लिखा गया है?
हजदा गांव झारखंड की राजधानी रांची से करीब 30 किलोमीटर दूर दसम वाटरफॉल के समीप स्थित है, जहां सड़क किनारे बड़े पत्थरों पर संविधान की पांचवीं अनुसूची और आदिवासी अधिकारों के अनुच्छेद लिखे गए हैं।
ग्रामीणों ने संविधान के अनुच्छेदों को पत्थरों पर क्यों उकेरा है?
बाहरी लोगों द्वारा जमीन हड़पने और ग्रामीणों को गुमराह करने से रोकने के लिए यह कदम उठाया गया है, ताकि हर किसी को मुंडा आदिवासियों के संवैधानिक अधिकारों की सीधी जानकारी रहे।
गांव के लोग कारखानों के प्रस्तावों का विरोध क्यों कर रहे हैं?
ग्रामीणों का कहना है कि कारखानों के नाम पर उनकी करोड़ों की जमीन ले ली जाती है और वे अपनी ही जमीन पर मजदूर बनकर रह जाते हैं, जिससे उनका जीवन खराब होता है।
हजदा गांव में ये पत्थर कब स्थापित किए गए थे?
ग्रामीणों के अनुसार, उन्होंने अपने संवैधानिक अधिकारों के प्रत्यक्ष सबूत के तौर पर करीब 3-4 साल पहले इन पत्थरों को जगह-जगह स्थापित किया था।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 4

Ravikash Gupta@ravikash·29 मिनट पहले

जमीन बचाने का गजब तरीका निकाला है इन लोगों ने। कंपनियों के वादों और बहकावे में आने से अच्छा है कि कानून को ही पत्थर पर लिख दिया जाए ताकि कोई कागजों का खेल न खेल सके।

Arjun Mehta@arjun-mehta·29 मिनट पहले

सही कहा रविकेश जी, कानून को पत्थर पर उकेरना बढ़िया दांव है। पर क्या प्रशासन या कंपनियां इसे सच में कोई कानूनी मान्यता देंगी?

Karan Malhotra@karan-malhotra·54 मिनट पहले

जमीन कब्जाने के मामलों में फर्जीवाड़े की ऐसी कोशिशें अक्सर थानों तक पहुँचती हैं, पर ग्रामीणों का यह तरीका कानूनी रूप से बहुत मजबूत है।

Rohan Verma@rohan-verma·54 मिनट पहले

करण भाई, बिल्कुल सही कहा। पुलिस-कचहरी के चक्कर काटने से अच्छा है कि सरकार को ही सीधे जमीन पर आईना दिखा दिया।

नागरिक पत्रकारिता

TrendKia पत्रकार बनें

जनता की आवाज़

अपने आसपास की ख़बरें, तस्वीरें और वीडियो ट्रेंडकिआ के साथ साझा करें और अपनी आवाज़ देश तक पहुँचाएँ। हर नागरिक एक पत्रकार।

अभी जुड़ें
CH 01 लाइव
TrendKia TV ON AIR
Chamar no WhatsApp