झारखंड में अपनी पुरखों की जमीन और अधिकारों की हिफाजत के लिए ग्रामीणों ने एक अनोखी और कानूनी मिसाल पेश की है। राजधानी रांची से लगभग 30 किलोमीटर दूर, मशहूर दसम वाटरफॉल के नजदीक बसे हजदा गांव के प्रवेश मार्ग पर सड़क किनारे विशालकाय पत्थरों पर भारत के संविधान के महत्वपूर्ण प्रावधान उकेरे गए हैं। इन शिलाखंडों पर विशेष रूप से संविधान की पांचवीं अनुसूची और आदिवासियों के अधिकारों से जुड़े प्रमुख अनुच्छेदों को पत्थर पर ही पत्थर से तराश कर लिखा गया है, ताकि गांव की सीमा में दाखिल होने वाले हर शख्स को आदिवासियों के संवैधानिक अधिकारों की सीधी जानकारी मिल सके।
जमीन हड़पने की कोशिशों के खिलाफ संवैधानिक ढाल
हजदा गांव के निवासी सुरेश उरांव का कहना है कि क्षेत्र में अक्सर बाहरी लोग आकर ग्रामीणों को भ्रमित करते रहे हैं और उनकी कीमती जमीनें हड़पने का प्रयास करते रहे हैं। ग्रामीणों को पहले अपने कानूनी और संवैधानिक अधिकारों की पूरी जानकारी नहीं होती थी, जिसका फायदा उठाकर लोग उन्हें गुमराह कर देते थे। इसी से बचने के लिए ग्रामीणों ने एकजुट होकर संविधान में आदिवासियों को दिए गए अधिकारों को हमेशा के लिए पत्थरों पर दर्ज कराने का फैसला किया, जिससे कोई भी व्यक्ति उन्हें बेवकूफ न बना सके।
पत्थर पर पत्थर से तराशी गई पांचवीं अनुसूची
सुरेश के अनुसार, सड़क किनारे लगे इन बड़े पत्थरों पर पत्थर की मदद से ही पांचवीं अनुसूची के वे सभी प्रावधान लिखे गए हैं, जो मुंडा आदिवासियों के हितों और अधिकारों की सुरक्षा करते हैं। आम लोगों के लिए संविधान के अनुच्छेदों को मौखिक तौर पर याद रखना संभव नहीं होता, इसलिए इसे सार्वजनिक रूप से पत्थरों पर अंकित कर दिया गया है। इसका मुख्य उद्देश्य यह है कि किसी भी बाहरी व्यक्ति को अलग से समझाने की आवश्यकता न पड़े, बल्कि वे गांव में प्रवेश करते ही इन शिलाओं पर नजर डालें, प्रावधानों को पढ़ें और यह समझ लें कि ग्रामीण अब अपने अधिकारों को लेकर पूरी तरह जागरूक हैं।
फैक्ट्री के वादों और बेदखली के डर पर दो टूक जवाब
ग्रामीणों ने औद्योगिक विकास के नाम पर दिए जाने वाले प्रलोभनों पर भी अपनी स्पष्ट राय रखी है। उनका कहना है कि बाहरी लोग यहां आकर फैक्ट्रियां लगाने, नौकरियां देने और तरह-तरह के विकास कार्य कराने के वादे करते हैं। ग्रामीणों का साफ तौर पर मानना है कि उन्हें ऐसे किसी वादे की जरूरत नहीं है और वे अपनी पारंपरिक जीवनशैली में ही खुश हैं। उनका अनुभव बताता है कि कारखानों के नाम पर करोड़ों रुपये की जमीनें ले ली जाती हैं, जिससे बाहरी लोग तो भारी मुनाफा कमाते हैं, लेकिन स्थानीय आदिवासी अपनी ही पैतृक जमीन गंवाकर उन्हीं कारखानों में मजदूर बनकर रह जाते हैं और उनका जीवन बदहाल हो जाता है।
अधिकारों का पुख्ता प्रमाण और विस्थापन का विरोध
गांव के ही सुरेंद्र आग का कहना है कि पत्थरों पर उकेरा गया यह संविधान उनके कानूनी दावों का ठोस प्रमाण है। ग्रामीण किसी हवा-हवाई बात के बजाय भारत सरकार द्वारा संविधान में दिए गए अधिकारों के आधार पर बात कर रहे हैं। ग्रामीणों ने करीब 3-4 साल पहले ही इन पत्थरों को जगह-जगह स्थापित किया है, ताकि आने-जाने वाले हर व्यक्ति की नजर इन पर आसानी से पड़ सके। ग्रामीणों का स्पष्ट संदेश है कि वे अपनी जमीन छोड़कर कहीं नहीं जाएंगे और संवैधानिक सुरक्षा के रहते कोई भी उन्हें उनकी भूमि से बेदखल नहीं कर सकता।























