घर के आंगन या बालकनी में सजे गमलों में जब हरी-भरी पत्तियां लहलहाती हैं और समय पर सुंदर फूल खिलते हैं, तो बागवानी का आनंद दोगुना हो जाता है। बहुत से लोग अपने पौधों को नियमित रूप से पानी देते हैं और धूप वाली जगह पर भी रखते हैं, फिर भी कई बार शाखाओं का विकास रुक जाता है। पत्तियां बेजान और पीली दिखने लगती हैं तथा कलियां खिलना पूरी तरह बंद हो जाती हैं। ऐसे हालात में बाजार में मिलने वाले महंगे रासायनिक उर्वरक खरीदना ही एकमात्र समाधान नहीं है। घर पर मौजूद सामान्य जैविक चीजों के संतुलन से एक असरदार तरल खाद तैयार की जा सकती है जो पौधों को नई जान दे सकती है।
घरेलू पोषण घोल तैयार करने के लिए जरूरी चीजें
इस पोषण घोल को बनाने के लिए किसी जटिल सामग्री की जरूरत नहीं होती। इसके लिए मुख्य रूप से एक से दो ताजी एलोवेरा की पत्तियां चाहिए होती हैं। इसके साथ ही कच्ची हल्दी का एक छोटा टुकड़ा लिया जाता है। जिन घरों में कच्ची हल्दी मौजूद न हो, वहां विकल्प के तौर पर लगभग एक से दो चम्मच सामान्य हल्दी पाउडर का उपयोग भी किया जा सकता है। दोनों ही सामग्रियां अपने प्राकृतिक गुणों के कारण घरेलू उपयोग में खूब जानी जाती हैं। गार्डनिंग एक्सपर्ट तरुण चोपड़ा ने पौधों की उचित देखरेख के लिए इस खास मिश्रण को तैयार करने की विधि साझा की है। उनका कहना है कि इस तरल घोल को संतुलित मात्रा में इस्तेमाल करने से सुस्त पड़े पौधों को बेहतर पोषण मिल सकता है, हालांकि इसे हर पौधे के लिए तत्काल फूल खिलाने का चमत्कारी दावा नहीं समझा जाना चाहिए।
पेस्ट बनाने और पानी में घोलने की सही विधि
सबसे पहले एलोवेरा की ताजी पत्तियों को साफ पानी से अच्छी तरह धो लें ताकि उन पर जमी धूल साफ हो जाए, फिर उन्हें चाकू से छोटे-छोटे टुकड़ों में काट लें। इसी तरह कच्ची हल्दी को भी छोटे टुकड़ों में काटकर अलग रख लें। अब इन दोनों चीजों को मिक्सी के जार में डालकर अच्छी तरह पीस लें। पीसने के बाद एक गाढ़ा और चिकना पेस्ट बनकर तैयार हो जाएगा। इस गाढ़े अर्क को कभी भी सीधे गमले की मिट्टी या जड़ों में नहीं डालना चाहिए, क्योंकि तेज सांद्रता पौधे की जड़ों को नुकसान पहुंचा सकती है। इसे हमेशा पानी में अच्छी तरह पतला करके ही इस्तेमाल किया जाता है।
इस मिश्रण के उपयोग का अनुपात बेहद सटीक होना चाहिए। तैयार गाढ़े पेस्ट में से केवल एक बड़ा चम्मच लें और उसे एक लीटर साफ पानी में पूरी तरह मिला दें। इस घोल को लगभग 24 घंटे के लिए ढककर छोड़ देना चाहिए ताकि दोनों चीजों के पोषक तत्व पानी में पूरी तरह घुल-मिल जाएं। 24 घंटे का समय बीत जाने के बाद, इस एक लीटर तैयार घोल को दस लीटर सादे पानी में मिलाकर अच्छी तरह पतला कर लें। इस प्रकार पौधों के लिए हल्का और सुरक्षित पोषण पानी तैयार हो जाता है।
गमले की मिट्टी में इस्तेमाल करने की प्रक्रिया
इस पतले तरल को गमले में डालने से पहले थोड़ी सावधानी बरतनी चाहिए। गमले की सबसे ऊपरी मिट्टी को खुरपी या हल्के हाथ से थोड़ा ढीला या गुड़ाई कर लें। ऐसा करने से मिट्टी में फंसी कठोर परत टूटती है और जड़ों तक हवा तथा ऑक्सीजन का संचार सुगम हो जाता है। मिट्टी ढीली करने के बाद, पौधे की आवश्यकता और गमले की क्षमता के अनुसार यह पतला घोल मिट्टी में धीरे-धीरे डालें।
बागवानी करते समय यह समझना जरूरी है कि हर गमले की मिट्टी की संरचना, पौधे की आयु, गमले का आकार और मौसम के अनुसार पानी की जरूरतें अलग-अलग होती हैं। किसी भी घरेलू घोल या खाद की अत्यधिक मात्रा पौधे के लिए फायदे की जगह उल्टा नुकसान खड़ी कर सकती है। यदि मिट्टी में पहले से बहुत ज्यादा नमी है, तो उसमें यह घोल डालने से बचना चाहिए ताकि जड़ें सड़ने का खतरा न बने।
पत्तियों पर स्प्रे करने की सावधानी
इस पोषक घोल का छिड़काव पत्तियों और मुख्य तने पर भी किया जा सकता है, जिससे पौधे बाहरी तौर पर भी तरोताजा रह सकें। पत्तियों पर छिड़कने के लिए इस तैयार तरल को किसी महीन कपड़े या छलनी से अच्छी तरह छान लेना आवश्यक है, ताकि कोई भी रेशा या कण स्प्रे बोतल के नोजल को जाम न करे। छने हुए तरल की थोड़ी मात्रा को साफ पानी में मिलाकर स्प्रे बोतल में भर लें और पौधे की पत्तियों पर हल्का फुहारा मारें।
जब भी किसी नए घोल का उपयोग पहली बार किया जाए, तो पूरे पौधे को नहलाने के बजाय केवल दो या तीन पत्तियों पर थोड़ा सा स्प्रे करके पैच टेस्ट करना चाहिए। अगले एक-दो दिन पौधे की उन पत्तियों पर नजर रखें। यदि पत्तियों पर किसी प्रकार के धब्बे, जलने के निशान या मुरझाने के लक्षण दिखाई दें, तो इसका छिड़काव तुरंत रोक देना चाहिए।
मौसम के अनुसार प्रयोग का अंतराल
पौधों को किसी भी तरल खाद की खुराक देने के बीच एक निश्चित समय का अंतराल रखना बहुत जरूरी होता है। सर्दियों के दिनों में जब मौसम ठंडा होता है और पौधों की वृद्धि स्वाभाविक रूप से धीमी रहती है, तब इस घोल का इस्तेमाल लगभग 20 से 22 दिनों के अंतराल पर करना चाहिए। वहीं दूसरी ओर, गर्मी के मौसम में वाष्पीकरण अधिक होता है और पौधे सक्रिय रहते हैं, इसलिए गर्मियों में करीब 15 दिनों के अंतर पर इसका प्रयोग किया जा सकता है।
हालांकि यह समय सीमा हर पौधे पर आंख मूंदकर लागू नहीं की जा सकती। हमेशा पौधे की वर्तमान स्थिति, पत्तियों के रंग और मिट्टी के सूखेपन को जांचने के बाद ही खाद देना बुद्धिमानी है। यदि कोई पौधा पहले से ही बहुत कमजोर है या किसी फंगल रोग की चपेट में है, तो उस पर सीधे कोई नया मिश्रण आजमाने से पहले विशेष सावधानी बरतनी चाहिए।
एलोवेरा और हल्दी से पौधों को मिलने वाला लाभ
एलोवेरा और हल्दी दोनों ही ऐसे कुदरती तत्व हैं जिनमें पौधों के स्वास्थ्य को सहारा देने वाले स्वाभाविक गुण पाए जाते हैं। गार्डनिंग एक्सपर्ट तरुण चोपड़ा के अनुसार, इनका संयुक्त घोल पौधे की जड़ प्रणाली और नई टहनियों के विकास को प्रोत्साहित करने में सहायक हो सकता है। यह कमजोर पड़ चुके पौधों को संभलने में मदद करता है और फूलों की कलियों को प्रेरित कर सकता है।
इसके बावजूद यह याद रखना चाहिए कि केवल खाद डालने से ही पौधे में ढेरों फूल नहीं खिल जाते। फूलों का आना इस बात पर भी निर्भर करता है कि पौधे को दिन भर में कितनी धूप मिल रही है, पानी की मात्रा सही है या नहीं, गमले का ड्रेनेज सिस्टम कैसा है और गमले की मिट्टी कितनी उपजाऊ है। इसलिए इस घरेलू खाद को अपनाने के साथ-साथ पौधे की बुनियादी जरूरतों का संतुलन बनाए रखना सबसे अहम है।



















