मध्य प्रदेश के धार्मिक शहर उज्जैन में प्राचीन 'खड़े हनुमान' मंदिर की मूर्ति को हटाने का अभियान बीते तीन दिनों से लगातार जारी है, लेकिन तमाम प्रशासनिक प्रयासों और आधुनिक क्रेन के इस्तेमाल के बावजूद इसे अपनी जगह से हिलाया तक नहीं जा सका है। इस अनूठी स्थिति ने अब स्थानीय निवासियों और अधिकारियों दोनों को ही हैरानी में डाल दिया है। प्रशासन का मुख्य उद्देश्य आगामी महाकुम्भ सिंहस्थ 2028 की तैयारियों के तहत सड़क का चौड़ीकरण करना और महाकाल की सवारी के मार्ग को सुगम बनाना है। इसी योजना के अंतर्गत कंठाल चौराहा से छत्री चौक तक के हिस्से में आ रही इस पुरानी धार्मिक संरचना को सुरक्षित रूप से दूसरी जगह विस्थापित करने की कवायद पिछले पांच दिनों से की जा रही है, जबकि मूर्ति हटाने का मैदानी काम गुरुवार से शुरू हुआ था।
प्रशासनिक कोशिशें और क्रेन का असफल होना
नगर निगम के अमले ने मूर्ति को हटाने के लिए भारी-भरकम क्रेन का सहारा लिया, लेकिन वह इस प्राचीन प्रतिमा को टस से मस करने में पूरी तरह नाकाम साबित हुई। इस दौरान मंदिर के बाकी भवन को पहले ही तोड़ा जा चुका है, और हनुमान जी की मूर्ति को सुरक्षित रखने के लिए ऊपर कैनोपी टेंट भी लगाया गया है। उल्लेखनीय है कि छोटा सराफा, बड़ा सराफा, नमक मंडी, गोपाल मंदिर, दानी गेट और शिप्रा नदी के आसपास का यह पूरा इलाका प्राचीन उज्जयिनी का बेहद अहम हिस्सा रहा है। यह क्षेत्र सिंधिया राजवंश के करीब 300 साल पुराने इतिहास के साथ-साथ राजा भोज के काल के चौबीस खंभा क्षेत्र और बाद के दौर के सती गेट की गौरवशाली विरासत से गहराई से जुड़ा हुआ है।
स्थानीय विरोध और लोगों की धार्मिक मान्यताएं
प्रशासन की इस कार्रवाई के खिलाफ हिंदूवादी संगठनों, युवक कांग्रेस और स्थानीय जनता ने खुलकर मोर्चा खोल दिया है। विरोध प्रदर्शन के दौरान लोगों ने हनुमान चालीसा का पाठ कर प्रतिमा को हटाने के इस कदम का कड़ा विरोध किया। स्थानीय लोगों का ऐसा मानना है कि भगवान स्वयं इस स्थान को छोड़कर नहीं जाना चाहते हैं। इस बीच एक दिलचस्प वाकया भी सामने आया कि जब रात के समय मूर्ति हटाने वाले स्थल को प्लास्टिक से ढंका जा रहा था, ठीक उसी वक्त पास के बिजली के पोल पर स्पार्किंग के कारण एक तेज धमाका हुआ और पूरे इलाके की बत्ती गुल हो गई। इस अजीब घटना के बाद शहर में तरह-तरह की चर्चाओं का बाजार गर्म है और कई लोग इसे किसी बड़ी अनहोनी की आशंका से भी जोड़कर देख रहे हैं। दूसरी ओर, संत समाज का कहना है कि सनातन परंपरा में प्राण-प्रतिष्ठित मूर्ति का बहुत ऊंचा धार्मिक महत्व होता है, इसलिए भक्तों की भावनाओं का पूरा सम्मान किया जाना चाहिए।
पुरातत्व विशेषज्ञों की राय और ऐतिहासिक महत्व
इस पूरे मामले पर विक्रम विश्वविद्यालय के पुरातत्ववेत्ता प्रो. डॉ. रमण सोलंकी ने अपने विचार रखते हुए बताया कि यह प्रतिमा मालवा क्षेत्र के मजबूत बेसाल्ट पत्थर से गढ़ी गई है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह मूर्ति लगभग एक हजार साल पुरानी राजा भोज के समय की मूर्तिकला परंपरा का हिस्सा हो सकती है और यह एक अत्यंत मूल्यवान ऐतिहासिक धरोहर है। परमार राजवंश और राजा भोज के कार्यकाल के दौरान इस प्रकार के कठोर पत्थरों पर कलाकृतियां तराशने की परंपरा काफी प्रचलित थी। डॉ. सोलंकी ने यह भी रेखांकित किया कि मंदिर की यह जगह पुरातत्व की दृष्टि से भी बहुत खास है। मूर्ति की सटीक आयु और इसके स्थापना काल का पुख्ता पता लगाने के लिए वैज्ञानिक परीक्षण और विशेषज्ञ जांच की बेहद आवश्यकता है।
वैज्ञानिक तरीके से स्थानांतरण की संभावना
मूर्ति को हटाने में आ रही भारी दिक्कतों पर चर्चा करते हुए पुरातत्व विशेषज्ञ डॉ. सोलंकी ने सुझाव दिया कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण और मध्य प्रदेश पुरातत्व विभाग के पास इस तरह की प्राचीन और संवेदनशील संरचनाओं को पूरी सुरक्षा के साथ दूसरी जगह स्थानांतरित करने की विशेष महारत है। यदि वैज्ञानिक तकनीकों और आधुनिक तौर-तरीकों का सही इस्तेमाल किया जाए, तो इस प्राचीन मूर्ति को बिना किसी प्रकार का नुकसान पहुंचाए सफलताપૂર્વક दूसरी जगह शिफ्ट किया जा सकता है। फिलहाल प्रशासन ने साफ कर दिया है कि मंगलवार को इस मंदिर को हटाने की एक और नई कोशिश की जाएगी, जिस पर सभी की निगाहें टिकी हुई हैं।



















