टेलीविजन इतिहास के सबसे सफल और लंबे चलने वाले धारावाहिकों में शुमार 'तारक मेहता का उल्टा चश्मा' लगातार 18 वर्षों से दर्शकों का मनोरंजन कर रहा है। समय के साथ शो में कई बदलाव आए और अनेक नए मोड़ भी देखने को मिले, लेकिन इसका मूल मिजाज और दर्शकों से जुड़ाव आज भी वैसा ही बना हुआ है। इस धारावाहिक का हर किरदार अपनी एक विशिष्ट पहचान रखता है। इस लंबे और सफल सफर के पीछे शो के निर्माता असित मोदी की मुख्य भूमिका रही है। धारावाहिक पर समय-समय पर विभिन्न प्रकार के आरोप और आलोचनाएं भी आती रहीं, लेकिन शो ने अपनी लोकप्रियता बनाए रखी। धारावाहिक के प्रसारण के 18 साल सफलतापूर्वक पूरे होने के अवसर पर असित मोदी ने अपने अनुभव, विचार और जीवन से जुड़ी कई अहम यादें साझा की हैं।
गोकुलधाम सोसाइटी की सोच और जमीन पर दिखा असर
धारावाहिक के प्रभाव पर चर्चा करते हुए असित मोदी ने बताया कि उनके शो 'तारक मेहता का उल्टा चश्मा' ने देश के विभिन्न हिस्सों में आवासीय कम्युनिटी और कॉलोनियों को एक साथ मिलकर रहने की प्रेरणा दी है। धारावाहिक में दिखाई जाने वाली काल्पनिक 'गोकुलधाम सोसाइटी' का ताना-बाना इस तरह बुना गया है कि उसने आम लोगों के सामाजिक जीवन और साथ रहने के तौर-तरीकों को गहरा प्रभावित किया है। उन्होंने बताया कि शो का यह सकारात्मक नजरिया बेहद सफल साबित हुआ है। कई शहरों में लोगों ने इस भावना से प्रेरित होकर नई कॉलोनियों का निर्माण किया है। असित मोदी के अनुसार, राजकोट की एक ऐसी ही कॉलोनी से उन्हें विशेष रूप से आमंत्रित भी किया गया है, जिसे गोकुलधाम की तर्ज पर बसाया गया है। उनका मानना है कि मतभेदों के बावजूद शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के तरीकों पर हर नागरिक को विचार करना चाहिए।
धर्म और जाति से ऊपर भारतीयता की पहचान
आज के दौर में समाज में बढ़ते धर्म, जाति और भाषाई विभाजन पर असित मोदी ने स्पष्ट चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में जब भी दो लोग आपस में मिलते हैं, तो बातचीत की शुरुआत अक्सर एक-दूसरे के धर्म, जाति, समुदाय या भाषा से जुड़ी पहचान पूछने से होती है। इस प्रवृत्ति पर विचार व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा, "अगर हम सबसे पहले कहें कि मैं भारतीय हूं, तो समाज की कई समस्याएं हल हो जाएंगी।" उनका मानना है कि जब व्यक्ति अपनी प्राथमिक पहचान भारतीय के रूप में स्वीकार करता है, तो आपसी भाईचारा स्वतः बढ़ता है और साथ मिलकर रहने की भावना को मजबूती मिलती है।
मुंबई के चॉल का दौर और पड़ोसियों का रिश्ता
असित मोदी ने अपने बचपन के दिनों की स्मृतियों को ताजा करते हुए मुंबई के चॉल जीवन के महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने खुलासा किया कि वह खुद और धारावाहिक में जेठालाल का किरदार निभाने वाले अभिनेता दिलीप जोशी, दोनों ही मुंबई के पारंपरिक चॉल माहौल में पले-बढ़े हैं। मुंबई के भूलेश्वर, कालबादेवी और दादर जैसे इलाकों में चॉल संस्कृति काफी समृद्ध रही है। असित मोदी ने बताया कि उन दिनों घर आकार में छोटे होते थे, जिसके कारण पड़ोसी ही एक-दूसरे के परिवार का हिस्सा बन जाते थे। उस दौर में एकल परिवार यानी न्यूक्लियर फैमिली की अवधारणा प्रचलित नहीं थी। वह आज भी छह-सात साल की उम्र के अपने पुराने पड़ोसियों के साथ भावनात्मक रूप से जुड़े हुए हैं।
आपसी तालमेल और बुनियादी सेवाकर्मियों के प्रति आभार
चॉल जीवन से मिली सीख का जिक्र करते हुए असित मोदी ने कहा कि पड़ोसियों के साथ रहने के लिए कई बातों में समझौता करना पड़ता है और आपसी तालमेल बनाना सीखना होता है। आधुनिक शहरी जीवन में लोग अक्सर अपने बगल वाले घर में रहने वाले पड़ोसी तक को नहीं पहचानते। कई लोग अपने बहुमंजिला इमारतों में तैनात वॉचमैन या लिफ्ट ऑपरेटर से मुस्कुराकर बात तक नहीं करते। असित मोदी का मानना है कि वॉचमैन, लिफ्टमैन और दिन-रात सेवा में लगे हर व्यक्ति के प्रति आभारी होना बेहद आवश्यक है। किसी भी आपात स्थिति में पड़ोसी ही सबसे पहला परिवार होता है और सामाजिक ताने-बाने में पड़ोसियों का स्थान सबसे महत्वपूर्ण है।



















