सन 1947 में हुआ भारत और पाकिस्तान का विभाजन इतिहास की सबसे दुखद घटनाओं में से एक है। इस बंटवारे की टीस और टीस भरा दर्द आज भी देश के अनगिनत परिवारों के दिलों में जिंदा है। विभाजन के खूनी दौर ने लाखों लोगों को रातों-रात उनके पुश्तैनी घरों से बेदखल कर दिया और उनकी पूरी जिंदगी बदल दी। बड़े पर्दे पर सिनेमा जगत ने समय-समय पर इस विस्थापन और त्रासदी को दिखाने का प्रयास किया है। हाल ही में फिल्म निर्देशक इम्तियाज अली ने अपनी फिल्म 'मैं पावस आउंगा' में विभाजन की कहानी को पर्दे पर उतारा, जिसे दर्शकों ने पसंद भी किया। लेकिन छोटे पर्दे यानी टेलीविजन पर बंटवारे के मानवीय दर्द को जिस भावनात्मक सादगी और गहराई के साथ पेश किया गया, उसने भारतीय टीवी के पूरे इतिहास को ही नया रूप दे दिया।
फिल्म निर्देशक रमेश सिप्पी का टीवी जगत में ऐतिहासिक कदम
हिंदी सिनेमा को 'शोले' जैसी कल्ट और सर्वकालिक महान फिल्म देने वाले दिग्गज निर्देशक रमेश सिप्पी ने अपने लंबे करियर में सिर्फ एक ही टीवी सीरियल बनाया था। वह ऐतिहासिक धारावाहिक कोई और नहीं बल्कि दूरदर्शन पर आने वाला 'बुनियाद' था। 1980 के दशक में जब सिनेमाई भव्यता के लिए प्रसिद्ध फिल्म मेकर ने टेलीविजन की ओर रुख किया, तो उन्होंने किसी तड़क-भड़क के बजाय इंसानी रिश्तों की सादगी को चुना। इस धारावाहिक की पटकथा और संवाद हिंदी के सुप्रसिद्ध लेखक मनोहर श्याम जोशी ने लिखे थे। साल 1986 में दूरदर्शन पर प्रसारित होने के बाद 'बुनियाद' ने सफलता के नए कीर्तिमान स्थापित किए। यह सीरियल महज एक धारावाहिक नहीं था, बल्कि विभाजन की आग में अपना सब कुछ गंवा चुके लाखों परिवारों के दर्द, संघर्ष और आंसुओं का वास्तविक प्रतिबिंब बन गया था।
लाहौर से दिल्ली का सफर और रिफ्यूजी कैंपों का सजीव चित्रण
इस सीरियल की पूरी कहानी मुख्य पात्र मास्टर जी यानी मास्टर हवेली राम के परिवार के इर्द-गिर्द घूमती है। बंटवारे के बाद मास्टर जी का परिवार लाहौर से अपना सब कुछ छोड़कर दिल्ली आता है। वहां वे शरणार्थी शिविरों में रहकर नए सिरे से अपने जीवन को संवारने की कोशिश करते हैं। रमेश सिप्पी ने अपनी परिचित बड़े पर्दे वाली भव्य शैली को छोड़कर इस शो में बहुत ही सादगी से मानवीय संबंधों, प्यार, धोखे और जीवन के कड़े संघर्ष को दिखाया। दूरदर्शन के पुराने रिकॉर्ड और मीडिया विवरणों के मुताबिक 'बुनियाद' को उस दौर का सबसे रियल और प्रामाणिक शो माना गया। रमेश सिप्पी ने बंटवारे के दौर की हर छोटी-छोटी बारीक चीज़ पर गहरा काम किया था। उस ज़माने के कपड़े, पंजाबी और हिंदी का मिला-जुला बोलने का लहजा और दिल्ली के रिफ्यूजी कैंपों का माहौल इतने जीवंत रूप में दिखाया गया कि जो लोग खुद बंटवारे की त्रासदी झेलकर आए थे, वे इस धारावाहिक से सीधे तौर पर जुड़ गए। दूरदर्शन के रिकॉर्ड बताते हैं कि जब 1986 में यह शो टीवी पर आता था, तो देश भर में सड़कों पर सन्नाटा पसर जाता था।
घर-घर में मशहूर हुए यादगार किरदार और स्टारकास्ट
'बुनियाद' सीरियल की सबसे बड़ी खासियत इसकी जानदार स्टारकास्ट और उनके द्वारा निभाए गए जीवंत किरदार थे। मास्टर हवेली राम के रोल में अभिनेता आलोक नाथ ने अपनी अदाकारी से ऐसा जादू चलाया कि यह शो उन्हें टीवी का सबसे लोकप्रिय और चहेता बाबूजी बना गया। वहीं मास्टर जी की धर्मपत्नी लाजो के किरदार में अभिनेत्री अनीता कंवर की एक्टिंग इतनी स्वाभाविक थी कि आम लोग उन्हें असल ज़िंदगी में भी लाजो जी ही समझ बैठे थे। इनके अलावा लोचन के रोल में कंवलजीत सिंह, भूषण के रूप में दलीप ताहिल और सतो के किरदार में क्रुतिका देसाई ने अभिनय के नए मानदंड कायम किए। इसके साथ ही किरण जुनेजा, मजहर खान और सुधीर पांडे जैसे प्रतिभावान कलाकारों ने अपने शानदार काम से कहानी में नई जान फूंक दी थी।
आज के दौर में 'बुनियाद' की सादगी और यूट्यूब पर डिजिटल लिगेसी
आज के दौर में जहां टीवी पर अक्सर बनावटी और कृत्रिम कहानियां ज्यादा देखने को मिलती हैं, वहीं 'बुनियाद' अपनी सादगी, दमदार संवादों और मज़बूत स्क्रिप्ट की वजह से आज भी लोगों को खूब पसंद आता है। दूरदर्शन ने अपने ऑफिशियल यूट्यूब चैनल पर इस सीरियल के एपिसोड्स को संभालकर सुरक्षित रखा है। आज भी इन एपिसोड्स को यूट्यूब पर लाखों व्यूज मिलते हैं। यह शो इस बात की याद दिलाता है कि जब एक बेहतरीन फिल्म मेकर और एक दूरदर्शी लेखक एक साथ आते हैं, तो छोटे पर्दे पर भी अद्भुत जादू बिखेरा जा सकता है।



















