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इलाहाबाद हाईकोर्ट का अहम फैसला: हाइमन की स्थिति रेप साबित करने का एकमात्र पैमाना नहींउत्तर प्रदेश
28 जून 2026, 10:10 am (121 दिन पहले)· 4

इलाहाबाद हाईकोर्ट का अहम फैसला: हाइमन की स्थिति रेप साबित करने का एकमात्र पैमाना नहीं

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि मेडिकल रिपोर्ट में हाइमन फटने के आधार पर किसी आरोपी को बरी नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने जोर दिया कि रेप एक कानूनी शब्द है और पीड़िता की विश्वसनीय गवाही मेडिकल रिपोर्ट से अधिक महत्वपूर्ण है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रेप के एक पुराने मामले पर फैसला सुनाते हुए एक महत्वपूर्ण कानूनी टिप्पणी की है। कोर्ट ने साफ किया है कि मेडिकल जांच के दौरान पीड़िता का हाइमन पुराना फटा हुआ पाए जाने का अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि दुष्कर्म की घटना नहीं हुई है। न्यायाधीश संतोष राय की एकल पीठ ने स्पष्ट किया कि केवल इस चिकित्सकीय आधार पर आरोपी को संदेह का लाभ नहीं दिया जा सकता और यदि पीड़िता की गवाही भरोसेमंद है, तो उसे आधार मानकर सजा बरकरार रखी जा सकती है। यह फैसला 1982 के एक दुष्कर्म मामले में आया है, जिसमें कोर्ट ने दोषी की सजा को न केवल कायम रखा, बल्कि उसे सख्त निर्देश भी दिए।

कानूनी परिभाषा बनाम मेडिकल रिपोर्ट

कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि रेप एक कानूनी शब्दावली है, न कि केवल मेडिकल। अदालत का मानना है कि किसी डॉक्टर द्वारा यह रिपोर्ट देना कि हाइमन पहले से फटा हुआ है, इस बात का प्रमाण नहीं है कि अपराध घटित नहीं हुआ। हाइमन फटने के पीछे कई कारण हो सकते हैं, जैसे कि खेलकूद, जिम्नास्टिक, साइकिल चलाना, घुड़सवारी, या कोई अन्य शारीरिक दुर्घटना। कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि कुछ महिलाओं में जन्मजात रूप से हाइमन नहीं होता या वह अत्यधिक लचीला हो सकता है, जो शारीरिक संबंध के बाद भी नहीं फटता।

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मामले की पृष्ठभूमि

घटना फरवरी 1982 की है। अभियोजन के अनुसार, 15 वर्षीय पीड़िता गांव के निकट शौच के लिए गई थी, जहां आरोपी ने उसके साथ रेप किया और विरोध करने पर मारपीट भी की। निचली अदालत ने 1983 में आरोपी को दोषी मानते हुए तीन साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी। आरोपी ने हाईकोर्ट में दलील दी थी कि मेडिकल रिपोर्ट में हाइमन पुराना फटा होने का जिक्र है, जिसका अर्थ है कि पीड़िता पहले से यौन संबंध बनाने की आदी थी और इसलिए रेप का दावा गलत है। हालांकि, हाईकोर्ट ने इस तर्क को सिरे से खारिज कर दिया।

सजा बरकरार और जुर्माने का आदेश

हाईकोर्ट ने न केवल आरोपी की दोषसिद्धि को बरकरार रखा, बल्कि सजा को लेकर भी कड़ा रुख अपनाया। कोर्ट ने माना कि ट्रायल कोर्ट ने उस समय प्रभावी कानून के अनुसार न्यूनतम सजा देने का कारण स्पष्ट नहीं किया था और जुर्माना भी नहीं लगाया था, जो कानूनी रूप से त्रुटिपूर्ण था। कोर्ट ने आरोपी की प्रोबेशन की अपील को ठुकराते हुए कहा कि दुष्कर्म जैसे गंभीर अपराधों में ऐसी रियायत देना समाज में गलत संदेश भेजेगा। कोर्ट ने आरोपी पर 50 हजार रुपये का जुर्माना लगाया है और उसकी जमानत को रद्द कर दिया है। उसे 10 दिनों के भीतर निचली अदालत में सरेंडर करने का आदेश दिया गया है।

सवाल-जवाब

क्या हाइमन फटने का मतलब हमेशा यौन संबंध ही होता है?
नहीं, इलाहाबाद हाईकोर्ट के अनुसार हाइमन खेलकूद, दुर्घटना, साइकिलिंग, घुड़सवारी या अन्य शारीरिक गतिविधियों से भी फट सकता है।
क्या मेडिकल रिपोर्ट रेप का एकमात्र सबूत है?
नहीं, अदालत ने स्पष्ट किया है कि रेप एक कानूनी शब्द है और पीड़िता की भरोसेमंद गवाही मेडिकल रिपोर्ट से अधिक महत्वपूर्ण हो सकती है।
हाईकोर्ट ने दोषी पर क्या दंड लगाया?
हाईकोर्ट ने आरोपी की दोषसिद्धि को बरकरार रखते हुए उस पर 50 हजार रुपये का जुर्माना लगाया और उसे 10 दिन के भीतर सरेंडर करने का आदेश दिया।
क्या कोर्ट ने आरोपी की प्रोबेशन की मांग स्वीकार की?
नहीं, कोर्ट ने रेप जैसे गंभीर अपराध का हवाला देते हुए प्रोबेशन की मांग को खारिज कर दिया।
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