उत्तर प्रदेश के बलिया सदर में स्थित पुरानी तहसील केवल एक साधारण सरकारी इमारत नहीं है, बल्कि यह इतिहास के उन स्वर्णिम पन्नों की जीवंत निशानी है जिसे समय की धारा भी मिटा नहीं पाई है। ब्रिटिश हुकूमत के दौर में तैयार की गई यह ऐतिहासिक इमारत बलिया के गौरवशाली अतीत की मूक गवाही दे रही है। प्रशासनिक बदलावों के शुरुआती दौर की बात करें तो साल 1798 में जब ईस्ट इंडिया कंपनी ने गाजीपुर जिला बनाया था, तब बलिया को उसकी एक तहसील का दर्जा दिया गया था। इसके बाद के प्रशासनिक फेरबदल में 01 नवंबर 1879 को बलिया को एक स्वतंत्र जिला घोषित किया गया, जिसके परिणामस्वरूप बलिया, बांसडीह और रसड़ा तहसीलें अस्तित्व में आईं।
बलिया सदर की यह पुरानी तहसील आज भी बीते वक्त की दास्तान सुनाती है, और इसकी दीवारें मानो खुद ब खुद यह कहती नजर आती हैं कि उन्होंने इतिहास के तमाम बदलते दौर अपनी आंखों से देखे हैं। हालांकि, बलिया की यह अमूल्य ऐतिहासिक धरोहर आज काफी जर्जर हालात में पहुंच चुकी है, लेकिन इसकी बुनियादी संरचना और दीवारें आज भी उतनी ही मजबूत बनी हुई हैं। कहीं न कहीं यह शानदार इमारत प्रशासनिक अनदेखी का गंभीर शिकार हो चुकी है। यदि इस धरोहर पर किसी जिम्मेदार की नजरें इनायत हो जातीं, तो शायद इसका कायाकल्प हो जाता और यह यादगार ऐतिहासिक तस्वीर एक बार फिर अपने मूल अस्तित्व में लौट आती।
126 साल पुरानी ऐतिहासिक इमारत और उसका अतीत
प्रख्यात इतिहासकार डॉ. शिवकुमार सिंह कौशिकेय ने इस बारे में विस्तार से बताते हुए कहा कि आपके सामने जो इमारत मौजूद है, वह बेहद खास और ऐतिहासिक है। इस इमारत ने ब्रिटिश हुकूमत की गुलामी की दास्तान को भी बहुत करीब से देखा है, देश के महान स्वाधीनता संग्राम का दौर भी झेला है और आज यह स्वाधीन भारत की विकास यात्रा को भी देख रही है। यह बलिया सदर की पुरानी तहसील है जो आज पूरे 126 वर्ष पुरानी हो चुकी है। इस शानदार इमारत का निर्माण 19वीं सदी के दौरान अंग्रेजों द्वारा करवाया गया था। यदि इसके प्राचीन वास्तुशिल्प और डिजाइन को गौर से देखा जाए, तो पता चलता है कि उस समय पूरी बलिया तहसील इसी परिसर में बैठा करती थी और यहीं से पूरे क्षेत्र का प्रशासनिक संचालन होता था।
इस तहसील भवन को बलिया के जिला बनने का एक बड़ा प्रतीक भी माना जाता है। जब सन 1798 ईस्वी में ईस्ट इंडिया कंपनी की सरकार ने गाजीपुर को जिला का दर्जा दिया था, तब बलिया को एक तहसील के रूप में सीमित क्षेत्र के साथ स्थापित किया गया था। आगे चलकर जब 01 नवंबर 1879 को बलिया को आधिकारिक तौर पर जिला बनाया गया, तब इसी परिसर में बलिया सदर तहसील की स्थापना की गई। यदि आप बारीकी से निरीक्षण करेंगे तो पाएंगे कि यहीं अंग्रेजों के द्वारा एक मालखाना भी बनवाया गया था और इसके साथ ही एक कैदखाना यानी हवालात भी बनाई गई थी।
लगान न चुकाने पर होती थी कैद और ब्रिटिश वास्तुकला का नमूना
ब्रिटिश काल और आजादी के शुरुआती वर्षों की कार्यप्रणाली पर प्रकाश डालते हुए इतिहासकार ने बताया कि उस दौर में जो किसान या जमींदार ब्रिटिश शासन को समय पर मालगुजारी यानी लगान देने में देरी करते थे, उन्हें सजा के तौर पर इसी हवालात में बंद किया जाता था। यही नहीं, बल्कि देश के आजाद होने के बाद भी जब कई किसान लगान चुकाने में असमर्थ रहते थे या देरी करते थे, तो उन्हें इसी जगह पर बंद किया जाता था। यह बलिया की एक ऐसी अनमोल ऐतिहासिक तहसील है जिसने गुलामी की जंजीरों को भी देखा और देश को आजादी मिलने के बाद के जश्न को भी महसूस किया है।
यह इमारत भले ही आज नियमित उपयोग में नहीं लाई जा रही है, लेकिन इसके बावजूद इसकी संरचना काफी मजबूत बनी हुई है और यह ब्रिटिश वास्तुशास्त्र का एक बेहद अनुपम और बेहतरीन नमूना है। हालांकि वर्तमान समय में यह पूरी तरह से जर्जर अवस्था में पहुंच चुकी है और इस पर ताले लटके हुए हैं। यह ऐतिहासिक धरोहर लगातार उपेक्षा का शिकार हो रही है। इस कालखंड में बनी अन्य इमारतें जो आज भी सुचारू रूप से इस्तेमाल की जा रही हैं, उनकी तरह यह तहसील भवन भी काफी मजबूत और शानदार है, लेकिन विडंबना यह है कि इस पर आज तक किसी की भी नजरें इनायत नहीं हो पाई हैं।



















