पारंपरिक फसलों से अलग हटकर नए प्रयोग करने वाले किसानों के लिए सिंदूर की बागवानी एक बेहतरीन और मुनाफेदार विकल्प बनकर उभरी है। मुरादाबाद के ग्रामीण इलाकों में अब सिंदूर के पेड़ लगाकर काश्तकार अपनी आय को तेजी से बढ़ा रहे हैं। इस पौधे से निकलने वाले बीजों का इस्तेमाल पूरी तरह प्राकृतिक सिंदूर बनाने के साथ-साथ खाद्य पदार्थों में इस्तेमाल होने वाले सुरक्षित फूड कलर तैयार करने में किया जाता है। बाजार में प्राकृतिक उत्पादों की जबरदस्त मांग होने के कारण इसकी उपज हाथों-हाथ बिक रही है, जिससे काश्तकारों को कम लागत में शानदार रिटर्न मिल रहा है।
अनुकूल मिट्टी और पौध तैयार करने का सही तरीका
इस बहुवर्षीय पेड़ को तैयार करने के लिए बलुई दोमट मिट्टी को सबसे बेहतर माना जाता है। शुरुआत में इसके बीजों से नर्सरी में पौधे तैयार किए जाते हैं, जिन्हें बारिश के दिनों में खेतों में रोपा जाता है। इसके अलावा लेयरिंग तकनीक का इस्तेमाल करके भी इसके पौधे तैयार किए जा सकते हैं। कृषि वैज्ञानिक डॉक्टर दीपक मेहंदी रत्ता के अनुसार इस पौधे की एक बड़ी खासियत यह है कि यह कम पानी की उपलब्धता में भी आसानी से पनप जाता है। कम लागत और न्यूनतम देखभाल की बदौलत यह बागवानी किसानों के बीच काफी लोकप्रिय हो रही है।
मैदानी इलाकों में रोपाई और उपज की प्रक्रिया
आमतौर पर यह पेड़ पहाड़ी इलाकों में ज्यादा देखने को मिलता रहा है, लेकिन अब मैदानी भागों में भी इसकी खेती पूरी तरह कामयाब साबित हो रही है। किसान चाहें तो अपने पूरे खेत में इसके बाग लगा सकते हैं। चूंकि इसका पेड़ 4 से 5 मीटर की ऊंचाई तक पहुंचता है, इसलिए कतार से कतार और पौधे से पौधे के बीच 4 मीटर की दूरी रखना जरूरी होता है। रोपाई के लगभग तीन साल बाद पेड़ पर फल आने शुरू हो जाते हैं, जबकि तीसरे से चौथे साल में यह पूरी क्षमता के साथ उपज देने लगता है। इसके फल गुच्छों में लगते हैं, जो एक बार रोपने के बाद लगातार 4 से 5 साल तक फल देते हैं। किसान इन गुच्छों को तोड़कर बीज अलग करते हैं और फिर प्रोसेसिंग के जरिए असली व प्राकृतिक सिंदूर बनाकर बाजार में बेचते हैं।
हरियाली के साथ कार्बन क्रेडिट का अतिरिक्त लाभ
सिंदूर के पेड़ों का सघन रोपण पर्यावरण के लिए भी बेहद फायदेमंद साबित हो रहा है। खेतों में बड़े पैमाने पर इन पेड़ों के लगने से वनीकरण को सीधा बढ़ावा मिलता है। पर्यावरण संरक्षण की इस मुहिम के चलते किसानों को कार्बन क्रेडिट का भी सीधा आर्थिक फायदा मिलने की राह खुली है। वन विभाग के साथ-साथ कई निजी कंपनियां भी काश्तकारों को इस तरह के पेड़ लगाने के लिए लगातार प्रोत्साहित कर रही हैं।





















