अंबिकापुर के ग्रामीण अंचलों में पक्षियों की मौजूदगी को लेकर एक चिंताजनक बदलाव सामने आया है। स्थानीय निवासी सलीमा मिंज के अनुसार, पहले गांव तथा उसके आसपास के क्षेत्रों में कौवे हर तरफ आसानी से देखने को मिल जाते थे। अब स्थिति यह हो गई है कि इन इलाकों में उनकी संख्या बेहद सीमित रह गई है और कई जगहों पर तो केवल गिनती के ही कौवे नजर आते हैं। इस तेजी से घटती संख्या को सीधे तौर पर पर्यावरणीय असंतुलन का स्पष्ट संकेत माना जा रहा है।
पेड़ों की कटाई से छिन रहा प्राकृतिक बसेरा
कौवों की संख्या में इस भारी गिरावट के पीछे वृक्षों की निरंतर हो रही कटाई को एक प्रमुख वजह बताया गया है। पहले इन इलाकों में घने जंगल और पर्याप्त संख्या में पेड़ मौजूद थे, जो पक्षियों के लिए सुरक्षित प्राकृतिक ठिकाना प्रदान करते थे। वनों और पेड़ों के नष्ट होने के कारण इन पक्षियों के ठहरने की जगह तो कम हुई ही है, साथ ही उनके लिए प्राकृतिक भोजन ढूंढना भी मुश्किल हो गया है। प्राकृतिक आवास के नुकसान ने कौवों की दिनचर्या और उनके जीवन चक्र को बुरी तरह प्रभावित किया है।
रसायनों का असर और प्रजनन चक्र में बाधा
कृषि और सब्जियों के उत्पादन को तेजी से बढ़ाने के लिए खेतों में रासायनिक कीटनाशकों का अंधाधुंध उपयोग किया जा रहा है, जिसने स्थिति को और नाजुक बना दिया है। सलीमा मिंज ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि इन जहरीले रसायनों का गहरा प्रभाव पूरे पर्यावरण के साथ-साथ सीधे पक्षियों तक पहुंच रहा है। ऐसा माना जा रहा है कि इन रसायनों की वजह से कौवों की प्रजनन क्षमता प्रभावित हो रही है, जिससे उनकी कुल तादाद लगातार कम होती जा रही है।
संरक्षण के लिए पौधारोपण और जैविक विकल्पों पर जोर
कौवों सहित अन्य स्थानीय पक्षियों की घटती आबादी को थामने के लिए व्यापक स्तर पर पेड़ लगाने की सलाह दी गई है। इसके अतिरिक्त, खेती में विषैले रसायनों पर निर्भरता कम करके जैविक तरीकों को अपनाने और कम नुकसानदेह कीटनाशकों के विकल्पों का प्रयोग करने की अपील की गई है। पक्षियों के संरक्षण के लिए रिहायशी और ग्रामीण इलाकों में नियमित रूप से दाना और पानी रखने की पहल भी उनकी मौजूदगी को फिर से बहाल करने में मददगार साबित हो सकती है।





















