उत्तर प्रदेश के झांसी जिले की पहचान 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की उस महागाथा से जुड़ी है, जहां रानी लक्ष्मीबाई ने ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ तलवार थामकर इतिहास रच दिया था। औपनिवेशिक शासकों ने संघर्ष के दौरान उनके पिता को मृत्युदंड दिया था, जिससे रानी का प्रतिरोध और भी मुखर हो गया था। आज विभिन्न बड़े आयोजनों और प्रदर्शनियों के लिए पहचाना जाने वाला झांसी का क्राफ्ट मेला मैदान रानी लक्ष्मीबाई के पारिवारिक संघर्ष और बलिदान का एक अहम गवाह माना जाता है।
मोरोपंत तांबे की फांसी से जुड़ा ऐतिहासिक संदर्भ
स्थानीय ऐतिहासिक विवरणों के आधार पर इसी स्थान पर ब्रिटिश अधिकारियों ने रानी लक्ष्मीबाई के पिता मोरोपंत तांबे को फांसी दी थी। इतिहासकार हरगोविंद कुशवाहा के अनुसार, मोरोपंत तांबे का झांसी से अत्यंत गहरा जुड़ाव था। रानी लक्ष्मीबाई के विवाह के बाद जब वह झांसी आईं, तब उनके पिता भी इसी नगर में आकर बस गए थे और रियासत के घटनाक्रमों में सक्रिय रहे।
मणिकर्णिका से झांसी की रानी बनने तक का सफर
रानी लक्ष्मीबाई के बचपन का नाम मणिकर्णिका था और उन्हें स्नेह से मनु पुकारा जाता था। बिठूर में उनका लालन-पालन हुआ, जहां उन्होंने घुड़सवारी के साथ शस्त्र संचालन की विधिवत शिक्षा हासिल की। वर्ष 1842 में उनका विवाह झांसी के महाराजा गंगाधर राव के साथ संपन्न हुआ। विवाह उपरांत मणिकर्णिका का नाम लक्ष्मीबाई हुआ और वे झांसी की रानी के रूप में प्रतिष्ठित हुईं। अपनी बेटी के झांसी आने के बाद मोरोपंत तांबे भी स्थायी रूप से झांसी में ही रहने लगे थे।
1857 का महासंग्राम और दतिया में गिरफ्तारी
साल 1857 के सैन्य संघर्ष के दौरान जब ब्रिटिश सेना ने झांसी पर आक्रमण किया, तब रानी लक्ष्मीबाई किले से निकलकर रणनीति के तहत कालपी और तत्पश्चात ग्वालियर की ओर आगे बढ़ीं। इसी उथल-पुथल भरे घटनाक्रम के दौरान मोरोपंत तांबे अंग्रेजों की पकड़ में आ गए। ऐतिहासिक अभिलेखों के अनुसार, उन्हें दतिया में गिरफ्तार किया गया था और उसके बाद अंग्रेजी हुकूमत ने उन्हें फांसी की सजा सुनाई।
पिता और पुत्री का अमर बलिदान
झांसी के क्राफ्ट मेला मैदान को मोरोपंत तांबे की शहादत स्थली के रूप में याद किया जाता है, जो इस भूभाग को स्वाधीनता संग्राम की स्मृतियों से जोड़े रखता है। इस घटनाक्रम के कुछ समय पश्चात, 18 जून 1858 को ग्वालियर के रणक्षेत्र में संघर्ष करते हुए रानी लक्ष्मीबाई ने भी वीरगति प्राप्त की। इस तरह पिता और पुत्री दोनों का जीवन 1857 के उस महान संग्राम का अभिन्न हिस्सा बना, जिसने भारतीय इतिहास में झांसी को सदा के लिए अमर कर दिया।



















