उत्तर प्रदेश के बहराइच शहर के मध्य भाग में स्थित पीतांबर टावर हवा महल केवल ईंट और गारे से निर्मित कोई साधारण ढांचा नहीं है, बल्कि यह ब्रिटिश शासन काल के दौरान भारतीय स्वाभिमान और प्रतिरोध की एक जीवंत दास्तान बयां करता है। मकबूल क्लब के नाम से पहचाने जाने वाली यह लगभग एक शताब्दी पुरानी ऐतिहासिक इमारत उस दौर की याद दिलाती है जब स्थानीय नागरिकों और वकीलों ने औपनिवेशिक हुकूमत के भेदभाव का जवाब अपनी आत्मनिर्भरता और एकजुटता से दिया था। आज स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर यह ऐतिहासिक धरोहर एक बार फिर अपने अतीत के गौरव और वर्तमान संरक्षण की आवश्यकताओं को लेकर चर्चा में है।
अंग्रेजी हुकूमत के नस्ली भेदभाव का मुंहतोड़ जवाब
इस ऐतिहासिक स्थल के निर्माण की पृष्ठभूमि 1930 के दशक की घटनाओं से जुड़ी हुई है। उस समय बहराइच में ब्रिटिश अधिकारियों के खेलकूद और मनोरंजन गतिविधियों के संचालन के लिए स्टेशन क्लब की स्थापना की गई थी। हालांकि, औपनिवेशिक मानसिकता के तहत इस क्लब के बाहर स्पष्ट नियम लागू करके भारतीय वकीलों और आम नागरिकों के प्रवेश पर पूरी तरह से रोक लगा दी गई थी। इस रंगभेद और सार्वजनिक अपमान को स्वीकार करने के बजाय स्थानीय भारतीय अधिवक्ताओं ने आत्मसम्मान का मार्ग चुना। उन्होंने निर्णय लिया कि वे अंग्रेजों के सामने गिड़गिड़ाने के बजाय एक ऐसे समानांतर क्लब का निर्माण करेंगे जो सुंदरता और स्थापत्य कला में ब्रिटिश स्टेशन क्लब से भी श्रेष्ठ सिद्ध होगा।
रियासतों का वित्तीय सहयोग और 1933 में क्लब की स्थापना
भारतीय वकीलों की इस महत्वाकांक्षी योजना को साकार करने में क्षेत्र की प्रमुख रियासतों ने ऐतिहासिक भूमिका निभाई। इस निर्माण कार्य में नानपारा के राजा तथा भिनगा के राजा का विशेष सहयोग प्राप्त हुआ। भिनगा के राजा ने भव्य इमारत के निर्माण के लिए आवश्यक वित्तीय साधन और अन्य संसाधन उपलब्ध कराए। इसके परिणामस्वरूप वर्ष 1933 में यह आकर्षक टावर हवा महल बनकर पूरी तरह तैयार हो गया। उद्घाटन के पश्चात इस परिसर का नाम मकबूल क्लब रखा गया। यहां भारतीय अधिवक्ता पूर्ण सम्मान के साथ बैडमिंटन, टेबल टेनिस और अन्य इनडोर खेल खेला करते थे। इसके अतिरिक्त, यह स्थान देश के स्वतंत्रता आंदोलन की गुप्त रणनीतियों और भावी योजनाओं पर चर्चा करने का एक प्रमुख केंद्र भी बन गया।
पारंपरिक निर्माण सामग्री का जादू और नेतृत्व की परंपरा
आधुनिक दौर की इमारतें जहां सीमेंट के उपयोग के बावजूद कुछ ही दशकों में कमजोर पड़ने लगती हैं, वहीं लगभग 100 वर्ष पुरानी यह इमारत आज भी पूरी मजबूती के साथ खड़ी है। इस टिकाऊपन का मुख्य कारण इसका अनोखा और पारंपरिक निर्माण मिश्रण है। इस संरचना को खड़ा करने में सीमेंट का प्रयोग बिल्कुल नहीं किया गया, बल्कि चूना, बेल का शरबत, राख और मौरंग के विशेष मिश्रण से इसे तैयार किया गया था। कुल 12 कमरों, एक विशाल केंद्रीय हॉल, एक ऊंचे टावर और चारों ओर फैले हरे-भरे वृक्षों से सुसज्जित यह परिसर अपनी स्थापत्य दृढ़ता के लिए जाना जाता है। क्लब के प्रबंधकीय नेतृत्व की बात करें तो इसके प्रथम अध्यक्ष के रूप में वरिष्ठ वकील भंडारी ने जिम्मेदारी संभाली थी। उनके बाद बल्लू राम शुक्ला, बच्चन सिंह, कालिया तथा वर्तमान समय में देवेंद्र सिंह जैसी प्रमुख हस्तियों ने इस संस्था के अध्यक्ष पद की कमान संभाली है।
1971 से एक ही परिवार की सेवा और संरक्षण की तत्काल आवश्यकता
पीतांबर टावर हवा महल की विरासत से न केवल स्वतंत्रता संग्राम की यादें जुड़ी हैं, बल्कि इसमें एक परिवार के समर्पण की कहानी भी शामिल है। सन 1971 से लगातार एक ही कर्मचारी अनीस अहमद और उनका परिवार अपनी पुरानी पीढ़ियों की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए इस परिसर की देखरेख का काम कर रहे हैं। बिना किसी रुकावट के यह परिवार इस ऐतिहासिक धरोहर को सहेजने में जुटा हुआ है। हालांकि, 1933 से अब तक अनेक ऐतिहासिक बदलावों का साक्षी रहा यह टावर वर्तमान समय में प्रशासनिक उपेक्षा का सामना कर रहा है। यद्यपि इसका मूल ढांचा आज भी सुरक्षित है, लेकिन समय रहते उचित जीर्णोद्धार न होने की स्थिति में बहराइच अपनी इस अनमोल विरासत को खो सकता है। 15 अगस्त के पावन अवसर पर इस स्वाभिमानी स्मारक को उसका उचित सम्मान और संरक्षण प्रदान करना अत्यंत आवश्यक है।





















