भारत के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। जब देश भर में ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ क्रांति की लहर दौड़ रही थी, तब मिर्जापुर के क्रांतिकारियों ने भी आजादी की लड़ाई को नई दिशा दी। इस क्षेत्र के वीरों ने न केवल आम नागरिकों और आदिवासियों को लामबंद किया, बल्कि अंग्रेजी शासन की नींव हिला दी। स्टेशन में आगजनी से लेकर गुप्त बैठकों और आंदोलनों के जरिए इन स्वाधीनता सेनानियों ने स्वतंत्रता की लौ को प्रज्ज्वलित रखा। मिर्जापुर की धरती पर जन्मे पांच ऐसे महान क्रांतिकारियों की गाथा आज भी क्षेत्र के लोगों के दिलों में रची-बसी है।
सुभाष चंद्र बोस का स्वागत और राजा पर जूता उछालने का साहस
मिर्जापुर जिले के अग्रिम स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों में स्व. पं. रविनंदन दुबे का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। लालगंज क्षेत्र के कठवार गांव में 4 सितंबर 1901 को जन्मे रविनंदन दुबे का जीवन देशप्रेम की अनोखी मिसाल है। वर्ष 1939 में जब महान नेता सुभाष चंद्र बोस का आगमन हुआ, तब उनके कार्यक्रम की संपूर्ण व्यवस्था संभालने की जिम्मेदारी रविनंदन दुबे ने उठाई थी। इस ऐतिहासिक आयोजन के बाद वे पूर्ण रूप से स्वतंत्रता की लड़ाई में कूद पड़े। आजादी के आंदोलन के दौरान उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत के वफादार एक राजा के अपमानजनक व्यवहार का कड़ा विरोध किया। जब राजा ने उनका मजाक उड़ाया, तो रविनंदन दुबे ने साहस दिखाते हुए उस पर जूता उछाल दिया। इस निर्भीक कदम के कारण राजा ने उन्हें गिरफ्तार करवाकर जेल भिजवा दिया था।
साइकिल पर गुप्त बैठकें और 'अंग्रेज भगाओ, भारत बचाओ' का नारा
मिर्जापुर के पटेहरा ब्लॉक स्थित रामपुर अतरी गांव के निवासी केदारनाथ तिवारी ने भी ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ संघर्ष की कमान संभाली। वर्ष 1902 में जन्मे केदारनाथ तिवारी ने मिर्जापुर जिले में 'अंग्रेज भगाओ, भारत बचाओ' आंदोलन का सशक्त नेतृत्व किया था। वे अंग्रेजों को खदेड़ने के लिए सोनभद्र, मिर्जापुर, वाराणसी और प्रयागराज जैसे विभिन्न जिलों में लगातार गुप्त बैठकें आयोजित करते थे। इन सांगठनिक बैठकों के लिए वे कई किलोमीटर तक साइकिल चलाकर जाया करते थे। उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ कई बड़े विरोध प्रदर्शनों की अगुवाई की। ब्रिटिश नीतियों के खिलाफ मुखर प्रदर्शन करने के कारण वर्ष 1941 में उन्हें अंग्रेजी सरकार ने गिरफ्तार कर लिया था और नौ माह के कारावास की सजा सुनाई थी।
पूर्वांचल के इकलौते आदिवासी क्रांतिकारी सठौले कोल का नेतृत्व
स्वाधीनता संग्राम में सठौले कोल का योगदान अत्यंत विशिष्ट और ऐतिहासिक माना जाता है। उन्होंने आदिवासी समाज को संगठित करके अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ विद्रोह का बिगुल फूंका। सठौले कोल अंग्रेजी पुलिस से छिपते-छिपाते सुदूर क्षेत्रों में जाते थे और सैकड़ों आदिवासियों को एकत्रित कर स्वतंत्रता आंदोलन से जोड़ते थे। स्थानीय जनश्रुतियों और अभिलेखों के अनुसार वे पूर्वांचल के इकलौते आदिवासी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ आदिवासियों को एकजुट करने की उनकी गतिविधियों की जानकारी मिलने पर अंग्रेजी प्रशासन ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया था। हालांकि, बाद में उन्हें रिहा कर दिया गया था।
16 साल की उम्र में विद्रोह और पहाड़ा स्टेशन में आगजनी
मिर्जापुर के एक अन्य वीर विद्यासागर शुक्ला ने महज 16 वर्ष की अल्प आयु में ही अंग्रेजी शासन के खिलाफ बगावत का बिगुल बजा दिया था। वर्ष 1939 में उन्होंने अंग्रेजी नीतियों के विरोध में घर-घर जाकर नोटिस बांटने, विदेशी वस्त्रों की होली जलाने और घरों के दरवाजे पर लिखे नंबरों को मिटाने का अभियान शुरू किया। इसके बाद वर्ष 1942 में महात्मा गांधी के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान विद्यासागर शुक्ला ने उग्र रूप अपनाया। उन्होंने पहाड़ा रेलवे स्टेशन को लूटने और उसमें आग लगाने की कार्रवाई में मुख्य भूमिका निभाई थी। उनकी इस वीरतापूर्ण कार्रवाई को मिर्जापुर के लोग आज भी याद करते हैं।
भदोही और मिर्जापुर में जन-संगठन तथा दो मुहिया मोड़ पर प्रतिमा
मिर्जापुर के स्वतंत्रता संग्राम इतिहास में झुरी बिंद की भूमिका भी अविस्मरणीय है। उन्होंने उस दौर के मिर्जापुर और वर्तमान भदोही क्षेत्र में लोगों को संगठित करने का व्यापक कार्य किया। झुरी बिंद ने आम जनता को लामबंद करके अंग्रेजों की दमनकारी नीतियों के विरुद्ध कड़ा संघर्ष किया था। उन्होंने स्थानीय स्तर पर अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ विद्रोह खड़ा किया और स्वाधीनता संग्राम की ज्वाला को प्रज्ज्वलित रखा। स्वतंत्रता संग्राम में उनके अमूल्य योगदान को सम्मानित करने के लिए मिर्जापुर जिले के दो मुहिया मोड़ पर उनकी भव्य प्रतिमा स्थापित की गई है।























