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बागेश्वर के ऐतिहासिक बाबा बागनाथ और बाणेश्वर मंदिरों में टपक रहा पानी, धरोहर के संरक्षण पर मंडराया संकटउत्तराखंड
1 सित॰ 2026, 5:24 pm (48 मिनट पहले)· 2

बागेश्वर के ऐतिहासिक बाबा बागनाथ और बाणेश्वर मंदिरों में टपक रहा पानी, धरोहर के संरक्षण पर मंडराया संकट

उत्तराखंड के बागेश्वर में स्थित ऐतिहासिक बाबा बागनाथ और बाणेश्वर मंदिरों में लगातार बारिश के चलते पानी भरने लगा है। मंदिरों की छतों से हो रहे रिसाव और दीवारों पर उग आए बड़े पेड़ों के कारण प्राचीन संरचनाओं को नुकसान पहुंचने की आशंका बढ़ गई है।

बागेश्वर जिले की समृद्ध ऐतिहासिक और धार्मिक विरासत के केंद्र माने जाने वाले प्राचीन बाबा बागनाथ मंदिर और बाणेश्वर मंदिर के संरक्षण को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। क्षेत्र में जारी मूसलाधार बारिश के बीच इन दोनों पवित्र मंदिरों के गर्भगृह और परिसरों के भीतर पानी की धाराएं पहुंच रही हैं, जिससे गंभीर जलभराव की स्थिति उत्पन्न हो गई है। इस प्राकृतिक आपदा और पानी के निरंतर रिसाव ने मंदिर के पुजारी परिवारों के साथ-साथ देश भर से आने वाले श्रद्धालुओं की चिंता को काफी बढ़ा दिया है, क्योंकि इससे इन प्राचीन धरोहरों के अस्तित्व पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं।

रिसाव से संरचनात्मक क्षति का खतरा

मंदिर के पुजारी भगवत रावल ने स्थिति की गंभीरता को बयां करते हुए बताया कि बारिश के इस मौसम में मंदिर की पुरानी छत और अन्य हिस्सों से पानी रिसकर सीधे अंदर पहुंच रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह समस्या महज कुछ समय के जलभराव तक सीमित नहीं है, बल्कि यदि पानी का यह रिसाव लगातार इसी प्रकार जारी रहा, तो इसके गंभीर परिणाम प्राचीन पत्थरों और मंदिर की अन्य संरचनात्मक खूबियों पर पड़ सकते हैं। समय रहते यदि इन महत्वपूर्ण हिस्सों का ट्रीटमेंट और वाटरप्रूफिंग का काम नहीं कराया गया, तो अमूल्य धरोहर को भारी नुकसान पहुंच सकता है।

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पेड़-पौधों की जड़ें बन रहीं खतरा

पुजारी परिवार ने मंदिर की छत और दीवारों पर उग आए पीपल के बड़े-बड़े पेड़ों को लेकर भी गहरी चिंता व्यक्त की है। उनका कहना है कि लंबे समय से उपेक्षा का शिकार हुए इन स्थानों पर पीपल के पेड़ अब आकार में काफी बड़े हो चुके हैं। इन पेड़ों की जड़ें समय के साथ मोटी और बहुत गहरी होती जा रही हैं, जिनके लगातार फैलाव से मंदिर के प्राचीन पत्थरों और दीवारों में खतरनाक दरारें आने की प्रबल आशंका बनी हुई है। यदि इन अवांछित पेड़ों को तत्काल वैज्ञानिक पद्धति से हटाकर प्रभावित हिस्सों की मरम्मत नहीं की गई, तो आने वाले दिनों में यह स्थिति और भी अधिक विकट रूप ले सकती है।

विभाग की बेरुखी और निरीक्षण का अभाव

भगवत रावल ने विभागीय लापरवाही पर रोष व्यक्त करते हुए कहा कि वे पिछले करीब दो महीनों से लगातार पुरातत्व विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों से फोन कॉल और व्हाट्सऐप के जरिए संपर्क साध रहे हैं। उन्होंने अधिकारियों को मंदिर की बदतर होती स्थिति से लगातार अवगत कराया है और उनसे आग्रह किया है कि वे जल्द से जल्द मौके पर पहुंच कर स्थिति का जायजा लें ताकि जरूरी संरक्षण कार्य शुरू हो सकें। हालांकि पुजारी परिवार का आरोप है कि तमाम गुहार के बावजूद अभी तक कोई भी अधिकारी निरीक्षण के लिए मौके पर नहीं पहुंचा है। स्थानीय नागरिकों का भी यह मानना है कि बाबा बागनाथ मंदिर इस पूरे क्षेत्र की धार्मिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक पहचान की रीढ़ है।

संगम तट पर स्थित है धार्मिक धरोहर

पवित्र सरयू और गोमती नदियों के पावन संगम क्षेत्र में अवस्थित यह प्राचीन मंदिर देश भर से आने वाले लाखों श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लिए गहरी आस्था का बड़ा केंद्र है। इसके ठीक समीप स्थित बाणेश्वर मंदिर भी इस तटीय क्षेत्र की पुरानी धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत का एक अहम हिस्सा है। ऐसी स्थिति में इन अनमोल मंदिरों की वास्तुकला और संरचना को सुरक्षित बनाए रखना केवल धार्मिक नजरिए से ही जरूरी नहीं है, बल्कि यह ऐतिहासिक और पुरातात्विक महत्व की दृष्टि से भी बेहद आवश्यक है।

विशेषज्ञों की देखरेख की मांग

चिंतित पुजारी परिवार ने पुरातत्व विभाग से यह पुरजोर मांग की है कि विभाग तुरंत प्रभाव से एक विशेषज्ञ दल को मौके पर भेजे जो पानी के रिसाव के वास्तविक कारणों की गहराई से जांच कर सके। इसके साथ ही विशेषज्ञों की सीधी निगरानी में जरूरी रासायनिक और संरचनात्मक ट्रीटमेंट कराए जाने की बात कही गई है। इसके अलावा, मंदिर की छतों और दीवारों पर अपनी जड़े जमा चुके पेड़ों को वैज्ञानिक तरीकों से हटाने का अनुरोध भी किया गया है ताकि बारिश और समय के थपेड़ों से इन प्राचीन और ऐतिहासिक धरोहरों को किसी भी प्रकार की अपूरणीय क्षति से बचाया जा सके।

सवाल-जवाब

बागेश्वर में किन मंदिरों में पानी घुसने की समस्या सामने आई है?
बागेश्वर के ऐतिहासिक बाबा बागनाथ मंदिर और बाणेश्वर मंदिर के अंदर पानी पहुंचने की समस्या सामने आई है।
मंदिरों में पानी पहुंचने का मुख्य कारण क्या है?
लगातार हो रही बारिश के कारण मंदिर की पुरानी छतों और दीवारों से पानी रिसकर अंदर आ रहा है।
संरचना को नुकसान पहुंचाने वाला दूसरा बड़ा खतरा क्या है?
मंदिर की छत और दीवारों पर उग आए बड़े पीपल के पेड़ों की जड़ें संरचना में दरारें पैदा कर रही हैं।
पुजारी भगवत रावल ने किससे शिकायत की है?
पुजारी भगवत रावल ने पुरातत्व विभाग के अधिकारियों से फोन और व्हाट्सऐप के जरिए संपर्क किया है।
ये मंदिर किस नदी के संगम क्षेत्र में स्थित हैं?
ये मंदिर सरयू और गोमती नदियों के संगम क्षेत्र में स्थित हैं।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 2

Karan Malhotra@karan-malhotra·37 मिनट पहले

ऐतिहासिक धरोहरों का इस तरह जलमग्न होना और दीवारों पर पेड़ों का उगना केवल संरचनात्मक लापरवाही नहीं, बल्कि प्राचीन स्मारकों के संरक्षण कानूनों और पुरातत्व विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है। यदि समय रहते रासायनिक ट्रीटमेंट और जल निकासी के पुख्ता इंतजाम नहीं किए गए, तो यह सांस्कृतिक क्षति कानूनी और प्रशासनिक जवाबदेही का बड़ा मुद्दा बन सकती है।

Rohan Verma@rohan-verma·36 मिनट पहले

करन मल्होत्रा की यह रिपोर्ट उत्तराखंड की सांस्कृतिक संपदा के संरक्षण में प्रशासनिक उदासीनता को बेनकाब करती है। जब सरयू-गोमती संगम जैसी ऐतिहासिक जगहों पर धार्मिक और पुरातात्विक महत्व के मंदिर प्राकृतिक आपदा और विभागीय उपेक्षा के कारण संकट में हों, तो यह सीधे तौर पर शासन की प्राथमिकताओं पर सवाल उठाता है। यदि पुरातत्व विभाग ने अब भी वैज्ञानिक पद्धति से वाटरप्रूफिंग और पेड़ों की जड़ों को हटाने का त्वरित अभियान नहीं चलाया, तो हम अपनी अमूल्य ऐतिहासिक पहचान को हमेशा के लिए खो देंगे।

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