उत्तराखंड की राजधानी देहरादून के मुख्य व्यापारिक केंद्र पलटन बाजार में इन दिनों पारंपरिक आभूषणों और आधुनिक फैशन का एक अनोखा संगम देखने को मिल रहा है। कश्मीरी झुमकों की जबरदस्त लोकप्रियता के बाद अब कलाई पर सजने वाली ट्रेंडी कश्मीरी घड़ियां स्थानीय महिलाओं, युवतियों और कॉलेज जाने वाली छात्राओं की पहली पसंद बन गई हैं। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इंस्टाग्राम पर रील्स और स्टोरीज में वायरल होने की वजह से शहर के इस व्यस्त बाजार की स्थायी दुकानों से लेकर अस्थायी रेहड़ियों तक हर जगह खरीदारों की लंबी कतारें लगी हुई हैं। पारंपरिक नक्काशी और समकालीन अंदाज का यह आकर्षक मेल फैशन के शौकीनों को अपनी तरफ तेजी से खींच रहा है।
गहने और घड़ी का अनूठा मेल
यह एक्सेसरी केवल समय देखने का साधारण साधन नहीं है, बल्कि इसने एथनिक ज्वेलरी और कलाई घड़ी के बीच की दूरी को पूरी तरह खत्म कर दिया है। सामान्य तौर पर महिलाएं हाथों में कड़ा, चूड़ियां या ब्रेसलेट अलग से पहनती थीं और कलाई पर घड़ी अलग बांधती थीं। कश्मीरी घड़ियों ने इस दोहरी जरूरत को एक ही सुंदर डिजाइन में समेट दिया है। इसमें की गई पारंपरिक कश्मीरी कलाकारी इसे किसी भी आम ब्रेसलेट या रोजमर्रा की साधारण वॉच से बिल्कुल अलग और बेहद खास दर्जा देती है। इसी वजह से कॉलेज की छात्राओं से लेकर दफ्तर जाने वाली कामकाजी महिलाएं इसे अपनी रोजमर्रा की पोशाक का अनिवार्य हिस्सा बना रही हैं।
पारंपरिक और इंडो-वेस्टर्न दोनों परिधानों के लिए मुफीद
वर्तमान समय में फैशन उद्योग के भीतर एथनिक और इंडो-वेस्टर्न फ्यूजन की मांग सबसे ज्यादा देखी जा रही है। कश्मीरी घड़ियों की सबसे व्यावहारिक खूबी यह है कि इन्हें साड़ी, सलवार-सूट, अनारकली और भारी लहंगे जैसे विशुद्ध पारंपरिक परिधानों के साथ जितनी सहजता से पहना जा सकता है, उतनी ही खूबसूरती से यह जींस-टॉप, ट्यूनिक और कुर्ती जैसे मॉडर्न इंडो-वेस्टर्न कपड़ों पर भी जंचती हैं। कलाई पर बंधते ही यह पूरे पहनावे को एक शाही, क्लासी और गरिमामय रूप दे देती हैं। किसी भी पारिवारिक समारोह, शादी-ब्याह या बड़े त्योहार के मौके पर इन्हें पहनने के बाद हाथों में अलग से भारी आभूषण पहनने की जरूरत महसूस नहीं होती।
कारीगरी, धातु और डिजाइनों की विस्तृत श्रृंखला
इन घड़ियों की बनावट और विविधता को देखें तो बाजार में विकल्पों की भरमार है। मुख्य तौर पर इन्हें एंटीक फिनिश वाले अलॉय, पीतल यानी ब्रास और ऑक्सीडाइज्ड मेटल के आधार पर तैयार किया जाता है। घड़ियों के स्ट्रैप या ब्रेसलेट वाले हिस्से में रंग-बिरंगे बारीक मोती, बहुरंगी नग, चमकदार कुंदन वर्क और छोटी-छोटी छन-छन करती घंटियों या घुंगरू का कलात्मक इस्तेमाल किया गया है। कुंदन और घुंगरू के काम से सजे ये ब्रेसलेट स्ट्रैप देखने में बिल्कुल कश्मीरी झुमके का अहसास कराते हैं। डिजाइन के स्तर पर फ्लोरल पैटर्न, बारीक ज्योमैट्रिक नक्काशी, भारी ब्राइडल कड़ा वॉच, पतली चेन स्ट्रैप वॉच के साथ-साथ चौकोर और गोल डायल वाले कई विकल्प मौजूद हैं। सादगी पसंद करने वालों के लिए पतली बीड्स वाली घड़ियां उपलब्ध हैं, जबकि भव्य और राजसी अंदाज चाहने वाले लोग बड़े पत्थरों, मोतियों और लटकते घुंगरू वाली घड़ियों को हाथों-हाथ खरीद रहे हैं।
दिल्ली के थोक बाजारों से देहरादून तक का सफर
पलटन बाजार के स्थानीय व्यापारियों के अनुसार यह नया फैशन चलन राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के मशहूर स्ट्रीट मार्केट्स से देहरादून पहुंचा है। दिल्ली के सरोजिनी नगर, जनपथ और चांदनी चौक जैसे प्रमुख थोक बाजारों से सीधे माल मंगाया जाता है। थोक आपूर्ति के चलते दुकानदारों को यह घड़ियां बहुत ही कम लागत में मिल जाती हैं, जिससे वे इन्हें फुटकर बाजार में बेहद आकर्षक दामों पर बेचने में सक्षम हैं। दिल्ली की सड़कों पर धूम मचाने वाला यह स्ट्रीट स्टाइल अब दून की गलियों और बाजारों में पूरी तरह छा चुका है।
सस्ती कीमत और पर्यटकों का आकर्षण
इस पूरे ट्रेंड के अचानक बेहद लोकप्रिय होने का सबसे बड़ा कारण इसकी पॉकेट-फ्रेंडली कीमत है। पलटन बाजार में इन कश्मीरी घड़ियों की शुरुआती कीमत मात्र ₹150, ₹200 और ₹250 रखी गई है। इतने कम बजट में प्रीमियम दिखने वाला पारंपरिक लुक और घड़ी की कार्यक्षमता एक साथ पाना ग्राहकों के लिए बेहद लुभावना सौदा साबित हो रहा है। यही वजह है कि अधिकांश खरीदार एक की बजाय दो-तीन अलग-अलग रंगों और डिजाइनों की घड़ियां एक साथ खरीद रहे हैं। स्थानीय लोगों के साथ-साथ देहरादून से मसूरी जाने वाले सैलानी भी इन घड़ियों को स्मृति चिन्ह और तोहफे के रूप में खरीदने के लिए दुकानों पर जुट रहे हैं। लगातार बदलती मांग को पूरा करने के लिए दुकानदार भी हर हफ्ते सोशल मीडिया पर चल रहे नए डिजाइनों का ताजा स्टॉक मंगवा रहे हैं।




















