उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में स्थित गंगोलीहाट घने देवदार के पेड़ों से घिरा एक ऐसा धार्मिक केंद्र है, जहां मां हाटकलिका का प्रसिद्ध और जागृत शक्तिपीठ स्थित है। इस पावन धाम को मां महाकाली के भक्तों की आस्था का प्रमुख केंद्र माना जाता है। इस मंदिर की पहचान इसकी आध्यात्मिक ऊर्जा, ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और समृद्ध धार्मिक परंपराओं से जुड़ी हुई है। दूर-दराज के क्षेत्रों से श्रद्धालु अपने जीवन की मनोकामनाएं लेकर यहां पहुंचते हैं और मां के जागृत स्वरूप के दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।
कुमाऊं रेजिमेंट की रक्षक और अगाध आस्था का केंद्र
भारतीय सेना की विख्यात कुमाऊं रेजिमेंट के लिए यह सिद्धपीठ अत्यंत पूजनीय है। कुमाऊं रेजिमेंट के जवान और अधिकारी मां हाटकलिका को अपनी आराध्य और संरक्षक देवी मानते हैं। सीमा पर तैनात जवानों और सैनिकों की इस मंदिर के प्रति अटूट आस्था जुड़ी है, और सैन्य कर्मियों द्वारा यहां आकर पूजा-अर्चना करने की एक लंबी परंपरा चली आ रही है। सैनिकों और श्रद्धालुओं का अटूट विश्वास है कि मां हाटकलिका हर विपत्ति और संकट की घड़ी में अपने भक्तों की ढाल बनकर रक्षा करती हैं।
आदि गुरु शंकराचार्य द्वारा स्थापना और पौराणिक इतिहास
धार्मिक मान्यताओं और ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार, इस पावन शक्तिपीठ की स्थापना आदि गुरु शंकराचार्य द्वारा की गई थी। इसके ऐतिहासिक निर्माण और विकास का संबंध 9वीं से 14वीं शताब्दी के दौरान कत्यूरी और चंद वंश के राजाओं के शासनकाल से जोड़ा जाता है। इसके अलावा, स्कंद पुराण के मानस खंड में भी इस पावन स्थल का विशेष उल्लेख मिलता है। पौराणिक कथाओं के मुताबिक, माता काली पश्चिम बंगाल से आकर गंगोलीहाट के इस स्थान पर बस गई थीं। इसी पावन भूमि पर माता काली ने सुमैया नामक दैत्य का संहार कर धर्म की रक्षा की थी।
रात में देवी का विश्राम और सुबह बिस्तर पर सिलवटों का चमत्कार
स्थानीय लोकमान्यताओं में इस मंदिर से जुड़ा एक बड़ा रहस्य सदियों से चर्चा का विषय रहा है। मान्यता है कि रात्रि के समय साक्षात मां काली मंदिर परिसर में विश्राम करने के लिए पधारती हैं। इसी आस्था के तहत मंदिर के पुजारी रोजाना रात को माता रानी के विश्राम हेतु बिस्तर सजाते हैं। अगली सुबह जब पूजा-अर्चना के लिए मंदिर के कपाट खोले जाते हैं, तो उस बिस्तर पर स्पष्ट सिलवटें दिखाई देती हैं। श्रद्धालु और स्थानीय निवासी इसे देवी के जागृत होने और रात में वहां उपस्थित रहने का प्रत्यक्ष प्रमाण मानते हैं।
नकारात्मक शक्तियों का निवारण और नवरात्रि में विशेष अनुष्ठान
धार्मिक परंपराओं में मां हाटकालिका को भगवान शिव की शक्ति और देवी काली के अत्यंत उग्र स्वरूप के रूप में पूजा जाता है। श्रद्धालुओं का दृढ़ विश्वास है कि सच्चे मन से की गई प्रार्थना से हर मनोकामना पूर्ण होती है और देवी की कृपा से सभी प्रकार की नकारात्मक शक्तियों, बाधाओं और कष्टों से मुक्ति मिलती है। नवरात्रि और प्रमुख पर्वों के दौरान इस पहाड़ी परिसर में श्रद्धालुओं का भारी तांता लगता है। मंदिर में गूंजती घंटियों की ध्वनि, वेदमंत्रों का पाठ और देवदार के वनों से घिरी शांत वादियों का संगम यहां आने वाले हर साधक को एक अलौकिक आध्यात्मिक अनुभूति से भर देता है।





















