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निठारी मामले से बरी सुरेंद्र कोली की संदिग्ध मौत पर परिजनों ने उठाए सवाल, हत्या की आशंका जताते हुए मांगी उच्च स्तरीय जांचउत्तराखंड
19 सित॰ 2026, 10:11 pm (31 मिनट पहले)· 0

निठारी मामले से बरी सुरेंद्र कोली की संदिग्ध मौत पर परिजनों ने उठाए सवाल, हत्या की आशंका जताते हुए मांगी उच्च स्तरीय जांच

निठारी मामले में 19 साल बाद बरी हुए सुरेंद्र कोली की हरिद्वार में संदिग्ध मौत के बाद परिजनों ने आत्महत्या के पुलिस दावे को खारिज कर साजिश और हत्या का आरोप लगाया है.

निठारी मामले में बरी होने के बाद अपनी नई जिंदगी की शुरुआत करने की कोशिश में जुटे सुरेंद्र कोली की संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मौत ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. हरिद्वार के जिला अस्पताल में शनिवार को शव परीक्षण की प्रक्रिया पूरी होने के बाद पार्थिव शरीर परिवार को सौंप दिया गया. हालांकि, मृतक के परिजनों और उनके नजदीकी सहयोगियों ने इसे खुदकुशी मानने से पूरी तरह इनकार कर दिया है. उनका आरोप है कि यह आत्महत्या नहीं बल्कि सुनियोजित हत्या और एक गहरी साजिश का परिणाम है, जिसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए.

प्रारंभिक स्तर पर पुलिस प्रशासन का रुख आर्थिक दिक्कतों और अतिक्रमण हटाने की प्रशासनिक कार्रवाई से उपजे दबाव को संभावित वजह मानकर चल रहा है. लेकिन 19 वर्षों तक चली लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद मिली रिहाई के कुछ ही समय बाद सामने आई इस रहस्यमयी मौत ने कई अनसुलझी पहेलियां छोड़ दी हैं. परिवार के साथ अस्पताल पहुंचे सल्ट क्षेत्र के पूर्व जिला पंचायत सदस्य नारायण सिंह रावत ने घटना स्थल की भौतिक परिस्थितियों को रेखांकित करते हुए उच्च स्तरीय जांच की मांग दोहराई है.

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अस्पताल परिसर में दिखा खौफ और सामाजिक तिरस्कार का डर

शव परीक्षण गृह के बाहर सुरेंद्र कोली के परिजनों के चेहरे पर केवल अपने प्रियजन को खोने का शोक नहीं था, बल्कि अनजाने भय की छाया भी साफ महसूस की जा रही थी. लगभग दो दशकों तक झेले गए सामाजिक अलगाव, बहिष्कार और कानूनी खींचतान के बाद भी यह परिवार सामान्य जीवन में लौटने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है. उन्हें लगातार यह अंदेशा सता रहा है कि सार्वजनिक रूप से सामने आने पर उन्हें बदले की कार्रवाई या अतिरिक्त सामाजिक अपमान का सामना करना पड़ सकता है.

इस भय का असर अस्पताल परिसर में उस समय सीधे देखने को मिला जब एक छायाकार ने परिवार के सदस्यों की तस्वीर खींचने का प्रयास किया. परिजनों ने तुरंत दखल देकर संबंधित फोन से वह तस्वीर हटवा दी. इसके साथ ही उन्होंने मीडिया के कैमरों के सामने कोई भी बयान दर्ज कराने अथवा अपनी तस्वीरें साझा करने से साफ मना कर दिया. परिवार के साथ मौजूद नारायण सिंह रावत ने स्थिति स्पष्ट करते हुए बताया कि परिजन अत्यधिक सहमे हुए हैं और किसी भी संभावित सामाजिक भेदभाव अथवा अनहोनी की आशंका के चलते अपनी पहचान सार्वजनिक नहीं करना चाहते.

लंबी कानूनी लड़ाई, कमजोर पृष्ठभूमि और पुनर्वास का अभाव

सुरेंद्र कोली के अतीत और सामाजिक पृष्ठभूमि की चर्चा करते हुए नारायण सिंह रावत ने कहा कि वर्ष 2006 से शुरू हुआ यह पूरा कानूनी घटनाक्रम करीब 20 वर्षों तक चला. अंततः अदालत से कानूनी तौर पर उन्हें न्याय तो प्राप्त हो गया, किंतु सामाजिक, आर्थिक और जातीय न्याय का पहलू पूरी तरह उपेक्षित रह गया. इतने लंबे समय तक कारागार में बंद रहने के कारण उनका भविष्य पहले ही तबाह हो चुका था, लेकिन जेल से बाहर आने के उपरांत न तो शासन की ओर से और न ही न्यायिक व्यवस्था के स्तर पर उनके भरण-पोषण अथवा आजीविका की कोई स्थायी व्यवस्था की गई.

रावत के अनुसार सुरेंद्र कोली बेहद गरीब, अशिक्षित और दलित वर्ग से ताल्लुक रखते थे, जिस वजह से वे प्रतिकूल परिस्थितियों का मुकाबला करने में सदा असमर्थ रहे. कमजोर आर्थिक स्थिति और सामाजिक हाशिए पर होने के कारण पूरे परिवार के लिए यह कानूनी संघर्ष प्रारंभ से ही असहनीय और दर्दनाक साबित हुआ था. रिहाई हासिल करने के पश्चात वे हरिद्वार में मात्र एक छोटा सा खोखा संचालित कर अपनी रोजी-रोटी कमाने और अपने पैरों पर दोबारा खड़ा होने का संघर्ष कर रहे थे.

मौके के साक्ष्य और परिस्थितियों पर गंभीर आपत्तियां

घटनास्थल पर मिली परिस्थितियों का बारीकी से उल्लेख करते हुए नारायण सिंह रावत ने कहा कि यह घटना खुदकुशी का रूप नहीं ले सकती. जिस खोखे में शव बरामद हुआ, उसकी कुल ऊंचाई लगभग सात फीट है. इतनी सीमित ऊंचाई वाले स्थान पर किसी सामान्य वयस्क व्यक्ति द्वारा फंदे से लटक कर जान देना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं दिखता. इसके अतिरिक्त शव के गले पर जिस बनावट में गांठ लगी हुई थी और जिस प्रकार रस्सी बिल्कुल बराबर काटी गई थी, वह आत्महत्या की सामान्य प्रकृति से बिल्कुल मेल नहीं खाती.

उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि मृतक के मुंह और नाक से खून का रिसाव हुआ था, जबकि सामान्यतः फांसी के मामलों में ऐसे लक्षण नहीं पाए जाते. इसके अलावा जिस समय घटना सामने आई, उस वक्त दुकान का शटर खुला हुआ पाया गया था. इन तमाम संदिग्ध बिंदुओं को सामने रखते हुए उन्होंने दावा किया कि ये सारे तथ्य स्थानीय स्तर पर रची गई किसी बड़ी साजिश की गवाही दे रहे हैं. उन्होंने मांग की कि इस समूचे मामले की किसी विशेष समिति के माध्यम से निष्पक्ष उच्च स्तरीय जांच कराई जाए, ताकि सच सामने आ सके और पीड़ित परिवार को वास्तविक न्याय हासिल हो सके.

सवाल-जवाब

सुरेंद्र कोली का शव कहां और किस स्थिति में मिला था?
सुरेंद्र कोली का शव हरिद्वार में लगभग सात फीट ऊंचे एक खोखे के भीतर संदिग्ध परिस्थितियों में मिला था, जिसका शटर खुला हुआ था.
सुरेंद्र कोली के परिजनों ने हत्या की आशंका क्यों जताई है?
परिजनों का कहना है कि खोखे की ऊंचाई बहुत कम थी, गले पर बंधी रस्सी और गांठ असामान्य थी तथा नाक और मुंह से खून बह रहा था, जो खुदकुशी की ओर इशारा नहीं करते.
पुलिस की प्राथमिक जांच में मौत की क्या वजह बताई जा रही है?
पुलिस की प्राथमिक थ्योरी आर्थिक तंगी और खोखे पर अतिक्रमण हटाने की प्रशासनिक कार्रवाई के दबाव की ओर इशारा कर रही है.
अस्पताल में परिजनों ने फोटो क्यों डिलीट करवा दी?
परिवार अत्यधिक डरा-सहमा हुआ है और उन्हें डर है कि सामने आने से उन्हें नए सामाजिक भेदभाव या किसी अनहोनी का सामना न करना पड़े, इसलिए उन्होंने फोटो डिलीट कराई और इंटरव्यू देने से मना कर दिया.
सल्ट क्षेत्र के पूर्व जिला पंचायत सदस्य नारायण सिंह रावत ने क्या मांग की है?
नारायण सिंह रावत ने मामले में एक उच्च स्तरीय जांच समिति गठित करने और निष्पक्ष जांच कराकर पीड़ित परिवार को न्याय दिलाने की मांग की है.
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 2

Rohan Verma@rohan-verma·13 मिनट पहले

सुरेंद्र कोली की यह संदिग्ध मौत केवल एक व्यक्ति का अंत नहीं, बल्कि देश की आपराधिक न्याय प्रणाली और उसके बाद कैदियों के पुनर्वास पर गंभीर सवाल खड़े करती है। कानूनी रिहाई के बावजूद समाज में स्वीकार्यता न मिलना और प्रशासनिक उपेक्षा ने इस मामले को और पेचीदा बना दिया है। यदि इस पर उच्च स्तरीय और पारदर्शी जांच नहीं होती है, तो यह प्रशासनिक व्यवस्था पर एक और बड़ा धब्बा साबित होगा, जिससे हाशिए के लोगों का न्याय व्यवस्था से विश्वास और अधिक डगमगा सकता है।

Karan Malhotra@karan-malhotra·12 मिनट पहले

सुरेंद्र कोली की यह रहस्यमयी मौत हमारी आपराधिक न्याय प्रणाली के उस अंधेरे पहलू को बेनकाब करती है जहाँ बरी होने के बाद भी एक व्यक्ति को सामाजिक बहिष्कार और पुनर्वासहीनता के दलदल में जीने को मजबूर होना पड़ता है। कानूनी न्याय मिलने के बावजूद यदि पूर्व कैदी को आजीविका, सुरक्षा और सामाजिक स्वीकार्यता नहीं मिलती, तो उसका जीवन नारकीय बना रहता है। इस मामले में पुलिस को केवल आत्महत्या या आर्थिक तंगी के शुरुआती निष्कर्षों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि परिजनों द्वारा उठाए गए साजिश के गंभीर सवालों पर फॉरेंसिक और स्वतंत्र जांच बिठानी बेहद आवश्यक है, अन्यथा न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता पर लगे यह दाग और गहरे हो जाएंगे।

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