उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में आयोजित विरासत मेले में इस बार अफगान कारीगरों की अनूठी शिल्पकला दर्शकों के आकर्षण का प्रमुख केंद्र बनी हुई है। यहां अफगानिस्तान से लाए गए काबुल के प्रसिद्ध ओनिक्स पत्थर से तैयार सजावटी सामान और घरेलू बर्तनों की विशेष प्रदर्शनी लगाई गई है। इस पत्थर की प्राकृतिक आभा और भीतरी चमक किसी भी बनावटी रंग या केमिकल पॉलिश के बिना ही बेहद शाही और विलासितापूर्ण अहसास कराती है, जिसे देखकर मेले में आने वाले लोग दंग हैं। आगामी दिवाली पर्व को ध्यान में रखते हुए लोग अपने घरों की सजावट के साथ-साथ प्रियजनों को उपहार देने के लिए भी इन शिल्पों को जमकर पसंद कर रहे हैं।
कुदरती चमक और पारदर्शी बनावट की खासियत
काबुल के ओनिक्स पत्थर की सबसे बड़ी पहचान उसकी प्राकृतिक अर्ध-पारदर्शी यानी ट्रांसलूसेंट चमक मानी जाती है। जब भी इस पत्थर पर कोई हल्की रोशनी पड़ती है, तो ऐसा प्रतीत होता है मानो यह अपने भीतर से ही जगमगा रहा हो। इस पत्थर की सबसे विशिष्ट बात यह है कि इस पर ऊपर से कोई कृत्रिम रंग, पेंट या रासायनिक परत नहीं चढ़ाई जाती। पत्थर की यह अंतर्निहित गुणवत्ता ही इसे दुनिया भर के अन्य साधारण पत्थरों की तुलना में बेहद खास और राजसी बनाती है। इन्हीं खूबियों के चलते अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इंटीरियर और लक्जरी सजावट के लिए इस पत्थर की काफी मांग रहती है।
अफगान कारीगरों की महीने भर की बारीक मेहनत
इस प्रदर्शनी स्टॉल के संचालक जमशेद के अनुसार, इन खूबसूरत कलाकृतियों का निर्माण अफगानिस्तान के प्रसिद्ध खदमत ग्रुप द्वारा कराया जाता है, जिसके प्रबंध निदेशक अब्दुल वली शाराफजाई हैं। उन्होंने बताया कि इस पत्थर से एक अत्यंत छोटा सा शो-पीस तराशने में भी लगभग एक पूरे महीने का समय लग जाता है। हालांकि पत्थरों की कुछ बेहद बारीक कटाई का काम मशीनों की मदद से पूरा किया जाता है, परंतु वास्तविक आकार देने, घिसाई करने और उन पर अंतिम चमक लाने की पूरी प्रक्रिया कुशल कारीगर अपने हाथों से ही पूरी करते हैं। यही मानवीय श्रम और पारंपरिक हुनर इन वस्तुओं को अद्वितीय बनाता है।
छोटे शो-पीस से लेकर फव्वारे और रसोई के बर्तन तक
विरासत मेले के इस स्टॉल पर काबुल ओनिक्स की एक विस्तृत श्रृंखला प्रदर्शित की गई है। यहां मेज पर रखने वाले छोटे सजावटी नमूनों से लेकर बड़े आकार के पानी के फव्वारे तक उपलब्ध हैं। विशेष रूप से फलों के आकार में तराशे गए सेब और अंगूर के गुच्छे, विभिन्न जानवरों की आकर्षक मूर्तियां, टेबल पर रखी जाने वाली घड़ियां और दीवार घड़ियां लोगों को बहुत लुभा रही हैं। केवल सजावटी सामान ही नहीं, बल्कि दैनिक उपयोग में आने वाले बर्तन जैसे चाय का सेट, पानी के जग, कप-प्लेट और मसाले कूटने वाला इमामदस्ता भी इस प्राकृतिक पत्थर से बेहद कुशलता से तैयार किए गए हैं।
घर की सजावट, वास्तु संतुलन और रखरखाव
इन कलाकृतियों को आवासीय परिसर के किसी भी हिस्से में सजाया जा सकता है। बैठक कक्ष यानी ड्राइंग रूम में इसका पानी का फव्वारा स्थापित करने से सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह बढ़ता है और घर के वास्तु दोषों को संतुलित करने में मदद मिलती है। डाइनिंग टेबल या सेंटर टेबल पर रखा ओनिक्स का सेब या अंगूर का गुच्छा घर आने वाले मेहमानों का ध्यान बरबस अपनी ओर खींच लेता है। इसके अलावा, काबुल ओनिक्स की मजबूती और टिकाऊपन भी इसकी प्रमुख विशेषता है। यह पत्थर आसानी से टूटता या चटकता नहीं है और दशकों तक इसकी प्राकृतिक चमक यूं ही बरकरार रहती है। यदि समय के साथ इस पर धूल जम जाए, तो महज एक हल्के नम कपड़े से पोंछते ही यह पत्थर दोबारा पूरी तरह नए जैसा चमकने लगता है।
त्योहारी सीजन में उपहार के किफायती विकल्प
दिवाली जैसे बड़े त्योहारों के मौके पर अपनों को पारंपरिक और यादगार भेंट देने के लिए ये कलाकृतियां एक बेहतरीन माध्यम बन रही हैं। स्टॉल पर प्रत्येक बजट वर्ग के ग्राहकों के लिए विकल्प मौजूद हैं। यहां उत्पादों की शुरुआती कीमत मात्र 350 रुपये है, जिसमें छोटे आकार के शो-पीस या फलों के मॉडल खरीदे जा सकते हैं। वहीं बड़े और जटिल नक्काशीदार फव्वारे अथवा संपूर्ण टी-सेट कुछ हजार रुपये की कीमत में उपलब्ध कराए गए हैं। मेले में आने वाले लोग न केवल अपने आशियाने को नया और भव्य रूप देने के लिए बल्कि रिश्तेदारों और मित्रों को सौगात देने के लिए भी इनकी खरीदारी कर रहे हैं।


















