भारतीय राजनीति के समकालीन परिदृश्य में राजनीतिक दलों की चुनावी सफलता और असफलता का आकलन जमीनी हकीकत और चुनावी नतीजों के आधार पर किया जाता है। लगातार तीन संसदीय चुनावों में असफलता झेलने के बाद कांग्रेस अपनी राजनीतिक स्थिति को मजबूत करने के लिए नए गठबंधन और एजेंडे सेट करने का प्रयास करती रही है। वर्षों से चले आ रहे UPA का नाम बदलकर 'INDIA' गठबंधन किया गया और 2024 का लोकसभा चुनाव मिलकर लड़ा गया। हालांकि इस प्रयास से पार्टी को आंशिक सफलता ही हासिल हुई और केंद्र में सरकार बनाने का लक्ष्य लगातार तीसरी बार अधूरा रह गया। वर्ष 2014 में NDA की सरकार बनने के बाद से ही कांग्रेस और उसके प्रमुख नेता राहुल गांधी लगातार कई तरह के विमर्श स्थापित करने में जुटे रहे, लेकिन चुनावी परिणामों में इसका अपेक्षित लाभ मिलता नहीं दिखा।
गठबंधन राजनीति और राज्यों में सिमटता जनाधार
केंद्र के साथ-साथ राज्यों की राजनीति में भी कभी कांग्रेस का एकछत्र वर्चस्व हुआ करता था। लेकिन समय के साथ चुनावी समीकरण बदले और अब कांग्रेस केवल चार राज्यों कर्नाटक, केरल, तेलंगाना और हिमाचल प्रदेश तक ही सीमित रह गई है। इसके अतिरिक्त झारखंड और जम्मू-कश्मीर जैसे राज्यों में कांग्रेस सत्तारूढ़ गठबंधन का हिस्सा तो है, लेकिन वहां उसकी भूमिका एक सहयोगी दल की तरह बनी हुई है। झारखंड में झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) और जम्मू-कश्मीर में नेशनल कॉन्फ्रेंस (NC) की मुख्य भूमिका के कारण सरकार संचालन में इन्हीं अग्रणी दलों का प्रभाव दिखाई देता है।
गठबंधन के भीतर कई बार प्रशासनिक और राजनीतिक मतभेद भी सतह पर आए हैं। झारखंड सरकार में कांग्रेस कोटे के मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने अपनी ही सरकार के कामकाज और प्रशासनिक रवैये पर नाराजगी जाहिर करते हुए कहा था कि राज्य के DGP उनकी बात नहीं सुनते, न तो पत्रों का उत्तर देते हैं और न ही फोन रिसीव करते हैं। दूसरी ओर, जम्मू-कश्मीर में नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता और राज्य के CM उमर अब्दुल्ला भी विपक्षी गठबंधन का नेतृत्व और तालमेल ठीक से न संभाल पाने को लेकर राहुल गांधी के सामने अपनी असंतोषजनक राय व्यक्त करते रहे हैं।
सैन्य कार्रवाइयों और राष्ट्रीय सुरक्षा पर बदलता राजनीतिक रुख
राष्ट्रीय सुरक्षा और सैन्य कार्रवाइयों के संदर्भ में कांग्रेस के बयानों और रुख ने भी व्यापक राजनीतिक चर्चा को जन्म दिया है। वर्ष 2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के दो साल बाद, जम्मू-कश्मीर के उरी सेक्टर में सैन्य शिविर पर हुए आतंकवादी हमले के जवाब में भारतीय वायुसेना ने 29 सितंबर 2016 को POK में सर्जिकल स्ट्राइक की थी। शुरुआत में राहुल गांधी ने इस कार्रवाई की सराहना की, लेकिन बाद में उन्होंने अपने बयान बदलते हुए सरकार पर सेना के पराक्रम का राजनीतिक लाभ उठाने का आरोप लगाया और 'खून की दलाली' जैसे कड़े शब्दों का इस्तेमाल किया।
इसी तरह 2019 के आम चुनावों से ठीक पहले, 14 फरवरी को पुलवामा में हुए आत्मघाती हमले में CRPF के 40 जवान शहीद हो गए थे। उस समय कांग्रेस ने इसे देश की आत्मा पर हमला बताते हुए सरकार के साथ खड़े होने की बात कही थी। परंतु घटना की पहली बरसी पर राहुल गांधी ने सरकार से सवाल पूछते हुए पूछा कि इस हमले से किसको फायदा पहुंचा, जांच में क्या सामने आया और इतनी बड़ी सुरक्षा चूक की जवाबदेही किसकी तय की गई। उन्होंने जवानों को आवाजाही के लिए विमान उपलब्ध न कराए जाने पर भी सवाल उठाए। इसके जवाब में भारतीय वायुसेना ने 26 फरवरी 2019 को तड़के करीब 3:30 बजे पाकिस्तान के बालाकोट स्थित आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद के ठिकानों पर बमबारी की, जिसमें 250 से 300 आतंकियों के हताहत होने की बात सामने आई थी।
चुनावी मुद्दे, वोट चोरी के दावे और संवैधानिक बहस
वर्ष 2024 के लोकसभा चुनावों के दौरान और उसके बाद भी चुनावी प्रक्रियाओं को लेकर नए विवाद खड़े किए गए। विपक्षी गठबंधन की अपेक्षित सफलता न मिलने पर कांग्रेस ने वोट चोरी और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए। राहुल गांधी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस के माध्यम से केंद्र सरकार और चुनाव आयोग पर मिलीभगत के आरोप लगाए और राज्यों में अभियान चलाया।
बिहार में 2025 के विधानसभा चुनाव से पहले चलाए गए गहन मतदाता पुनरीक्षण (SIR) कार्यक्रम को वोट चोरी की साजिश करार दिया गया। राहुल गांधी ने RJD और अन्य सहयोगी दलों के साथ मिलकर 15 दिनों तक बिहार के विभिन्न जिलों का दौरा किया। हालांकि चुनावी नतीजों से यह संकेत मिला कि आम जनता ने इन दावों को पूरी तरह स्वीकार नहीं किया। पश्चिम बंगाल की तत्कालीन CM ममता बनर्जी ने भी SIR का विरोध किया था, परंतु उन्हें भी पराजय का सामना करना पड़ा। इससे पूर्व कांग्रेस द्वारा EVM की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठाए जाते रहे थे, हालांकि हाल के समय में पार्टी नेताओं ने इस मुद्दे को उठाना कम कर दिया है।
राजनीतिक संदेश और जमीनी नतीजों के बीच का अंतर
2024 के आम चुनाव में कांग्रेस ने भाजपा पर संविधान और आरक्षण खत्म करने की योजना बनाने का आरोप लगाया। राहुल गांधी ने तर्क दिया कि सत्तारूढ़ दल द्वारा दिया गया '400 पार' का नारा इसी उद्देश्य से तय किया गया था। गठबंधन के अन्य सहयोगी दलों ने भी इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाया। लेकिन चुनाव विश्लेषकों और परिणामों से यह स्पष्ट होता है कि ऐसे आक्रामक दावों के बावजूद जनता के बीच स्थायी राजनीतिक संदेश बनाने और उसे निर्णायक चुनावी विजय में बदलने में पार्टी को चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।



















