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हिमालय में 25 साल में 25 प्रतिशत घटी वन छतरी, उत्तराखंड के जोशीमठ और पहाड़ी इलाकों में बढ़ा भूस्खलन का खतराउत्तराखंड
21 अग॰ 2026, 7:08 pm (78 दिन पहले)· 1

हिमालय में 25 साल में 25 प्रतिशत घटी वन छतरी, उत्तराखंड के जोशीमठ और पहाड़ी इलाकों में बढ़ा भूस्खलन का खतरा

ओडिशा के राउरकेला स्थित एनआईटी के एक अध्ययन के अनुसार, जोशीमठ और आसपास के संवेदनशील हिमालयी क्षेत्रों में पिछले 25 वर्षों के दौरान फॉरेस्ट कैनोपी यानी वन छतरी में 25 प्रतिशत से अधिक की भारी गिरावट दर्ज की गई है। वनों की कटाई, अनियंत्रित निर्माण और जलवायु परिवर्तन के कारण मिट्‌टी की पकड़ कमजोर हो रही है, जिससे पहाड़ों के दरकने की गति तेज हो गई है।

उत्तराखंड के संवेदनशील पर्वतीय तंत्र में पिछले कुछ दशकों से प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन जारी है, जिसके कारण राज्य की स्थानिक जलवायु और पर्यावरण पर गंभीर दुष्प्रभाव दिखने लगे हैं। मानवीय गतिविधियों और प्रकृति के प्राकृतिक संतुलन में पैदा हुए इस व्यवधान के परिणामस्वरूप केदारनाथ की भीषण विभीषिका, जोशीमठ के मकानों में आई भयावह दरारें और समूचे पर्वतीय क्षेत्र में भूस्खलन की बढ़ती घटनाएं सामने आ रही हैं। भूगर्भीय हलचलों और ढलानों की बढ़ती अस्थिरता के बीच हाल में सामने आई एक वैज्ञानिक शोध रिपोर्ट ने भविष्य के बड़े पर्यावरणीय संकट की चेतावनी दी है। यह अध्ययन स्पष्ट करता है कि राज्य के भूभाग को प्राकृतिक सुरक्षा प्रदान करने वाली और तापमान को नियंत्रित रखने वाली वन छतरी में आई निरंतर कमी ही हिमालयी पहाड़ों के दरकने का मुख्य कारण बन रही है।

25 वर्षों में 25 प्रतिशत से अधिक वन छतरी का क्षरण

ओडिशा के राउरकेला स्थित राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान द्वारा किए गए शोध में यह तथ्य उजागर हुआ है कि जोशीमठ और इसके आसपास के आपदा प्रभावित इलाकों में बीते 25 साल की अवधि में वन छतरी में 25 प्रतिशत से ज्यादा की कमी आई है। इस व्यापक अध्ययन को यूरोपियन भूविज्ञान संघ के अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में भी प्रस्तुत किया जा चुका है। शोधकर्ताओं ने पाया कि पेड़ों की पत्तियों और शाखाओं के आवरण में आई इस कमी के सीधे परिणाम स्वरूप वर्षा जल के जमीन में समाने की प्राकृतिक प्रक्रिया बाधित हुई है और ढलानों पर मिट्टी की पकड़ काफी कमजोर हो गई है।

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देहरादून के पर्यावरणविद आशीष गर्ग के अनुसार, इस अध्ययन के निष्कर्ष बताते हैं कि वनों की कटाई, पहाड़ों पर बिना किसी नियोजन के किया जा रहा अनियंत्रित निर्माण कार्य और लगातार बदल रही जलवायु ही इस वन छतरी के घटने के तीन मुख्य कारक हैं। जब घने वृक्षों की ऊपरी पत्तियों और टहनियों की सुरक्षात्मक परत नष्ट हो जाती है, तो मूसलाधार बारिश की बूंदें बिना किसी रुकावट के सीधे ढलानदार जमीन पर गिरती हैं। इसके कारण मिट्टी पर जल का अत्यधिक दबाव बनता है। पेड़-पौधों की जड़ें मिट्टी को कसकर बांधे रखने में असमर्थ हो जाती हैं, जिससे ढलाने खिसकने लगती हैं और पहाड़ों के दरकने की गति अचानक तेज हो जाती है।

जोशीमठ में बढ़ता संकट और बारिश का घातक असर

चमोली जिले में स्थित जोशीमठ में भूस्खलन और जमीन धंसने के लक्षण वास्तव में साल 2018 से ही दिखाई देने लगे थे। हालांकि, अक्टूबर 2022 में हुई अत्यधिक और मूसलाधार बारिश ने पहाड़ों के दरकने की रफ्तार को कई गुना बढ़ा दिया। इसके बाद साल 2023 तक पहुंचते-पहुंचते स्थिति बेहद चिंताजनक हो गई और पूरे इलाके में भारी भूगर्भीय अस्थिरता दर्ज की गई। मकानों, सड़कों और खेतों में बड़ी-बड़ी दरारें आ गईं, जिससे स्थानीय निवासियों के अस्तित्व पर संकट गहरा गया।

भारतीय वन सर्वेक्षण की 2023 की रिपोर्ट भी इस पर्यावरणीय बदलाव की पुष्टि करती है। रिपोर्ट के अनुसार, उत्तराखंड सहित देश के चार राज्यों में अति सघन वन और मध्यम श्रेणी के घने जंगल तेजी से घटकर खुले वन श्रेणी में तब्दील हो गए हैं। पर्यावरणविद आशीष गर्ग का कहना है कि हिमालयी क्षेत्रों में वन छतरी के सिमटने के साथ-साथ भूस्खलन और भूगर्भीय हलचलें समान अनुपात में बढ़ रही हैं। पूर्व में सघन वन छतरी भारी बारिश के प्रचंड वेग को सोख लेती थी और पानी पत्तियों से छनकर धीरे-धीरे जमीन पर गिरता था, जिससे मिट्‌टी का कटाव रुकता था और भूमि की उर्वर क्षमता बनी रहती थी। अब इस सुरक्षा चक्र के खत्म होने से जब बादल फटने या अत्यधिक तेज बारिश जैसी स्थितियां बनती हैं, तो पानी पूरे वेग के साथ सीधे नंगी जमीन पर गिरता है और व्यापक तबाही मचाता है।

भविष्य के अस्तित्व और संरक्षण की चुनौतियां

उत्तराखंड का यह पूरा हिमालयी क्षेत्र भूकंपीय और अन्य भूगर्भीय आपदाओं के दृष्टिकोण से पहले से ही अत्यंत संवेदनशील माना जाता है। राज्य के गठन के बाद से बीते 25 वर्षों के भीतर वन छतरी में आई 25 प्रतिशत से अधिक की यह भारी गिरावट प्राकृतिक संतुलन को पूरी तरह बिगाड़ चुकी है। वनों के इस क्षरण ने न केवल जल स्रोतों को प्रभावित किया है, बल्कि पहाड़ों की आंतरिक स्थिरता को भी ध्वस्त कर दिया है।

पर्यावरण विशेषज्ञों की चेतावनी है कि यदि समय रहते व्यापक स्तर पर सघन पौधरोपण नहीं किया गया, निर्माण कार्यों पर सख्त नियमन लागू नहीं हुआ और प्राकृतिक वनों के संरक्षण को प्राथमिकता नहीं दी गई, तो आने वाले दिनों में पहाड़ी इलाकों में रहने वाली आबादी के समक्ष जीवन और आजीविका का संकट और ज्यादा गंभीर रूप ले लेगा।

सवाल-जवाब

वन छतरी (फॉरेस्ट कैनोपी) में कितनी गिरावट आई है?
एनआईटी राउरकेला के शोध के अनुसार, जोशीमठ और आसपास के आपदा प्रभावित क्षेत्रों में पिछले 25 वर्षों में वन छतरी में 25 प्रतिशत से अधिक की कमी आई है।
जोशीमठ में भूस्खलन और जमीन धंसने की शुरुआत कब हुई थी?
जोशीमठ में साल 2018 से भूस्खलन शुरू हुआ था, लेकिन अक्टूबर 2022 की भारी बारिश के बाद दरारों और अस्थिरता की रफ्तार काफी तेज हो गई।
वन छतरी घटने से भूस्खलन क्यों बढ़ता है?
घने वनों की छतरी बारिश की बूंदों के वेग को रोकती है। छतरी कम होने पर बारिश का पानी सीधे ढलानों पर गिरता है, जिससे मिट्टी पर दबाव बढ़ता है और पेड़ की जड़ें मिट्टी को बांध नहीं पातीं।
एफएसआई 2023 की रिपोर्ट में क्या चेतावनी दी गई है?
भारतीय वन सर्वेक्षण (एफएसआई) की 2023 रिपोर्ट के मुताबिक उत्तराखंड सहित चार राज्यों में सघन और मध्यम वन घटकर खुले वन श्रेणी में आ गए हैं।
इस संकट से बचने के लिए विशेषज्ञों ने क्या सुझाव दिए हैं?
विशेषज्ञों ने पर्वतीय क्षेत्रों में तत्काल व्यापक पौधरोपण करने, अनियंत्रित निर्माण कार्यों पर नियमन लागू करने और वनों के संरक्षण पर ध्यान देने का सुझाव दिया है।
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