शारदीय नवरात्रि के पावन पर्व पर मां भगवती की विशेष कृपा प्राप्त करने हेतु श्रद्धालु नौ दिनों का कठिन उपवास रखते हैं और भक्तिभाव के साथ दुर्गा सप्तशती का विधिवत पाठ करते हैं। सात सौ श्लोकों से युक्त इस पवित्र ग्रंथ की साधना से जीवन के समस्त संकट दूर होने तथा मन की सभी इच्छाएं पूरी होने का धार्मिक विश्वास है। नौ दिवसीय इस विस्तृत साधना क्रम में कई बार मंत्रों के उच्चारण अथवा पूजन विधान में अनजाने में कुछ त्रुटियां रह जाती हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यदि इन भूलों का विधिवत सुधार न किया जाए, तो उपवास और उपासना का संपूर्ण पुण्य प्राप्त नहीं हो पाता।
दुर्गा सप्तशती के विभिन्न अंगों का धार्मिक महत्व
हरिद्वार निवासी पंडित योगेश पंत के अनुसार, शारदीय नवरात्रि की अवधि में दुर्गा सप्तशती का पाठ करना आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यंत कल्याणकारी माना गया है। इस पावन ग्रंथ के आरंभ में निहित देवी कवच, अर्गला स्तोत्र, कीलक स्तोत्र एवं दुर्गा सहस्त्रनाम के सस्वर पाठ से साधक को दैवीय सुरक्षा प्राप्त होती है और जीवन में असीम पुण्य का संचार होता है। संस्कृत भाषा के जटिल और गूढ़ मंत्रों के लंबे अनुष्ठान के दौरान उच्चारण में चूक होना अत्यंत स्वाभाविक है। यदि साधक इन गलतियों का परिमार्जन कर लेता है, तो उसकी साधना सार्थक सिद्ध होती है।
क्षमा याचना स्तोत्र का वाचन क्यों है अनिवार्य
पंडित योगेश पंत बताते हैं कि संपूर्ण उपासना का फल सुनिश्चित करने के लिए अष्टमी अथवा नवमी तिथि पर व्रत पारण से ठीक पूर्व क्षमा याचना स्तोत्र पढ़ना अपरिहार्य है। माता भगवती करुणा और स्नेह की साक्षात प्रतिमूर्ति हैं। जब कोई साधक निर्मल हृदय से देवी के समक्ष अपनी अज्ञानतावश हुई भूलों के लिए प्रार्थना करता है, तो मां दुर्गा प्रसन्न होकर उन समस्त त्रुटियों को क्षमा कर देती हैं। इस अंतिम स्तोत्र के पाठ के उपरांत ही व्रत की संपूर्णता मानी जाती है।
आर्थिक समृद्धि और मनोकामना सिद्धि
विधानपूर्वक क्षमा याचना के साथ व्रत संपन्न करने से जीवन मार्ग में आने वाले सभी विघ्न समाप्त होते हैं। इसके साथ ही साधक की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ होती है और बिना किसी व्यवधान के मनोवांछित फल प्राप्त होते हैं।





















