सनातन परंपरा में भाद्रपद पूर्णिमा से आरंभ होकर आश्विन अमावस्या तक चलने वाली पखवाड़े भर की अवधि पितृ पक्ष कहलाती है। इस पूरे कालखंड को अपने पूर्वजों के प्रति अगाध आदर, समर्पण और कृतज्ञता प्रकट करने का सबसे पुण्यकारी अवसर माना जाता है। सामान्य नियमों के तहत पितरों का श्राद्ध उनकी मृत्यु वाली तिथि के दिन संपन्न किया जाता है। हालांकि, कुछ विशिष्ट परिस्थितियों में देह त्यागने वाले पूर्वजों के लिए धर्मग्रंथों में अलग और सुनिश्चित तिथियां निर्धारित की गई हैं। उदाहरण के तौर पर, परिवार की सुहागिन महिलाओं के लिए मातृ नवमी तय है, जबकि किसी दुर्घटना या अकाल मृत्यु का शिकार हुए लोगों का तर्पण चतुर्दशी तिथि को करने का नियम है। ठीक इसी व्यवस्था के तहत, सांसारिक मोह-बंधन त्यागकर वैराग्य धारण करने वाले संन्यासी पूर्वजों के लिए भी शास्त्रों में एक अलग दिन मुकर्रर किया गया है।
गरुड़ पुराण में तय है द्वादशी की तिथि
धार्मिक परंपराओं और गरुड़ पुराण समेत विभिन्न सनातन ग्रंथों का संदर्भ देते हुए हरिद्वार के पंडित सचिन शर्मा स्पष्ट करते हैं कि संन्यास मार्ग पर चल चुके पूर्वजों के श्राद्ध के लिए आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की द्वादशी तिथि निर्धारित की गई है। इस विशिष्ट दिन संन्यासी पूर्वजों के निमित्त किए जाने वाले अनुष्ठान को ऋषि श्राद्ध की संज्ञा भी दी जाती है। इस तिथि पर पूजन और पिंडदान करने का विधान बाकी तिथियों से सर्वथा भिन्न और अत्यधिक फलदायी माना गया है।
संन्यास दीक्षा के समय जीवित पिंडदान का रहस्य
पंडित सचिन शर्मा के अनुसार, जब कोई सांसारिक व्यक्ति संन्यास की दीक्षा स्वीकार करता है, तब उसी क्षण उसका पूर्ण मुंडन कराया जाता है। इसके पश्चात वह जीते-जी स्वयं अपना पिंडदान संपन्न करता है। इस वैदिक प्रक्रिया का मूल अर्थ यह होता है कि व्यक्ति का सांसारिक कुल, गोत्र और भौतिक अस्तित्व उसी क्षण समाप्त मान लिया जाता है। इसके बावजूद, भौतिक देह शांत होने के बाद उस संन्यासी आत्मा की संपूर्ण तृप्ति और ऋषि ऋण से मुक्ति दिलाने के लिए वंशजों की जिम्मेदारी समाप्त नहीं होती। यही कारण है कि परिवार के वंशजों द्वारा आश्विन कृष्ण द्वादशी तिथि पर किया गया विधिवत तर्पण अत्यंत अनिवार्य माना गया है।
मृत्यु तिथि पर संन्यासी का श्राद्ध न करने की चेतावनी
पंडित सचिन शर्मा सचेत करते हैं कि यदि कुल में किसी पूर्वज ने संन्यास अथवा साधु जीवन अपनाया था, तो उनका श्राद्ध उनके भौतिक शरीर त्यागने की सामान्य तिथि पर कदापि नहीं करना चाहिए। शास्त्रों के मुताबिक, नियत तिथि के अतिरिक्त किसी अन्य दिन तर्पण करने से संन्यासी आत्मा तृप्त नहीं होती और लोक में भटकती रह सकती है। इसका सीधा दुष्प्रभाव परिवार पर पितृ दोष के रूप में पड़ता है, जिससे वंश वृद्धि में बाधाएं, गृह क्लेश और गंभीर आर्थिक संकट जन्म लेने लगते हैं।
हरिद्वार और गंगा तट पर तर्पण का विशेष महात्म्य
द्वादशी तिथि के पावन अवसर पर पवित्र गंगा के तट पर संन्यासी पितरों के निमित्त तर्पण, पिंडदान और पूजन संपन्न करने से उनकी आत्मा परम धाम को प्राप्त होती है। तृप्त होकर वे अपने कुल को सुख, समृद्धि और शांति का वरदान प्रदान करते हैं। खासकर हरिद्वार में गंगा किनारे इस द्वादशी श्राद्ध को करने से अक्षय पुण्य और विशेष लाभ मिलने की गहरी धार्मिक मान्यता है।























