मानसून के कड़े तेवरों के शांत पड़ते ही उत्तराखंड के सुरम्य पर्वतीय स्थल कौसानी में एक बार फिर पर्यटकों की आवाजाही रफ्तार पकड़ने लगी है। लंबे समय तक चली मूसलाधार बारिश के थमने से फिजाओं में ताजगी घुल गई है और सुहावने मौसम के बीच चारों तरफ पसरी हरी चादर सैलानियों को लुभा रही है। उत्तर प्रदेश, दिल्ली और हरियाणा समेत देश के कई अन्य राज्यों से बड़ी संख्या में लोग छुट्टी मनाने यहां पहुंचने लगे हैं। पर्यटकों की इस आमद ने होटल और होमस्टे संचालकों, टैक्सी चालकों, गाइडों तथा स्थानीय दुकानदारों के चेहरों पर चमक लौटा दी है।
चाय बागानों और बर्फबारी वाली चोटियों का अनोखा आकर्षण
अल्मोड़ा और बागेश्वर सीमा पर बसे कौसानी को इसकी बेमिसाल प्राकृतिक छटा की वजह से अक्सर मिनी स्विट्जरलैंड की संज्ञा दी जाती है। इस सीजन की बारिश खत्म होने के बाद यहां की वादियां, घने जंगल और सीढ़ीदार खेत और भी अधिक हरे-भरे तथा साफ नजर आने लगे हैं। सैलानियों के लिए यहां के प्रसिद्ध चाय बागान सबसे बड़ा आकर्षण बने हुए हैं, जहां मात्र 50 रुपये का प्रवेश शुल्क चुकाकर पर्यटक बागानों की हरियाली, चाय पत्ती चुनने की प्रक्रिया और शांत पहाड़ी आबोहवा का भरपूर लुत्फ उठा रहे हैं। जब आसमान पूरी तरह साफ रहता है, तो यहां से हिमालय पर्वतमाला की हिमाच्छादित चोटियों का भव्य दृश्य भी सैलानियों को मुग्ध कर देता है।
मानसून के झटकों से उबरने की कोशिश में स्थानीय बाजार
स्थानीय व्यापारी बबलू नेगी के अनुसार, इस साल मानसून के महीनों में बागेश्वर जिले सहित आसपास के समूचे पर्वतीय इलाके में भारी बारिश, भूस्खलन और प्रमुख मार्गों के कटने से पर्यटन उद्योग पर गहरा आघात पहुंचा था। सड़कें बार-बार अवरुद्ध होने और खराब मौसम के खौफ से बहुत से लोगों ने अपनी तय यात्राएं रद्द कर दी थीं, जिसका सीधा नुकसान हॉस्पिटैलिटी सेक्टर और दुकानदारों की आमदनी पर पड़ा। हालांकि अब अधिकतर प्रमुख संपर्क मार्गों को दुरुस्त कर यातायात बहाल कर दिया गया है, जिससे स्थिति सामान्य होने लगी है। स्थानीय कारोबारियों का कहना है कि आवाजाही में सुधार तो दिख रहा है, मगर व्यापार का स्तर अब भी पिछले सालों की तुलना में सुस्त है।
अक्टूबर से लेकर सर्दियों तक का योजनाबद्ध पर्यटन
कौसानी घूमने आईं पर्यटक सिम्मी के मुताबिक, मानसून के तुरंत बाद अक्टूबर और नवंबर के महीने कौसानी भ्रमण के लिए बेहद मुफीद माने जाते हैं। अक्टूबर के दौरान आसमान में बादल नहीं रहते और मौसम बेहद सुहावना बना रहता है, जिससे हरियाली के बीच दूर की हिमालयी चोटियों के साफ दर्शन संभव हो पाते हैं। नवंबर के आते-आते ठंड का असर बढ़ने लगता है, लेकिन नीले आसमान के साथ बर्फीली चोटियों की चमक और खिल उठती है।
वहीं पर्यटक रेणुका का कहना है कि दिसंबर से लेकर फरवरी तक के महीनों में कौसानी कड़ाके की सर्दी की चपेट में रहता है। उस वक्त हाड़ कंपाने वाली ठंडी हवाओं के साथ कई मौकों पर बर्फबारी का नजारा देखने के लिए बर्फीले मौसम के शौकीन लोग यहां पहुंचते हैं। इसके बाद जब मार्च से जून का ग्रीष्मकालीन दौर आता है, तो मैदानी क्षेत्रों की भीषण गर्मी से राहत तलाशने वाले परिवारों के लिए यह पहाड़ी इलाका पसंदीदा ठिकाना बन जाता है। व्यापारी बबलू नेगी को उम्मीद है कि अक्टूबर में शुरू होने वाले सीजन की बदौलत मानसून के दौरान हुए आर्थिक नुकसान की काफी हद तक भरपाई हो जाएगी।





















