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सरोवर नगरी में फीकी पड़ी बंगाली सैलानियों की रौनक, नई मंजिलों और बढ़ते खर्च से बदला दशकों पुराना मिजाजउत्तराखंड
6 अक्तू॰ 2026, 12:46 pm (1 घंटे पहले)· 0

सरोवर नगरी में फीकी पड़ी बंगाली सैलानियों की रौनक, नई मंजिलों और बढ़ते खर्च से बदला दशकों पुराना मिजाज

उत्तराखंड के नैनीताल में कभी दुर्गा पूजा के दौरान बंगाली सैलानियों का भारी जमावड़ा रहता था, लेकिन अब नए पर्यटन विकल्पों और बढ़ते खर्च के कारण यह पुराना नाता कमजोर पड़ता दिख रहा है।

उत्तराखंड की खूबसूरत वादियों में बसी सरोवर नगरी नैनीताल और पश्चिम बंगाल के सैलानियों के बीच दशकों पुराना अनूठा जुड़ाव रहा है। एक जमाना था जब शरद ऋतु की शुरुआत होते ही, खासकर सितंबर से लेकर नवंबर के महीनों में, नैनीताल की माल रोड और संकरी गलियों से लेकर प्रमुख दर्शनीय स्थलों तक सिर्फ बंगाली भाषा के संवाद गूंजते थे। शहर के होटलों से लेकर नाव चालकों तक के चेहरे खिल उठते थे और चारों तरफ का माहौल देखकर ऐसा लगता था मानो पूरा शहर किसी मिनी बंगाल में तब्दील हो गया हो। वक्त के थपेड़ों के साथ पहाड़ों में पर्यटन की पूरी तस्वीर बदल गई है, जिसके चलते अब सरोवर नगरी में बंगाली सैलानियों की वह पारंपरिक भीड़ पहले जैसी दिखाई नहीं देती।

ऋतु चक्र के साथ तय होता था पर्यटकों का मिजाज

सरोवर नगरी के सामाजिक और सांस्कृतिक इतिहास पर गहरी नजर रखने वाले स्थानीय इतिहासकार प्रोफेसर अजय रावत का कहना है कि पहले के दौर में नैनीताल में विभिन्न प्रांतों के सैलानियों का आगमन एक तयशुदा कैलेंडर के तहत हुआ करता था। साल की शुरुआत में जब मार्च और अप्रैल का महीना आता था, तब मुंबई और गुजरात के पर्यटक पहाड़ों का रुख करते थे। इसके बाद जब मैदानी इलाकों में भीषण गर्मी का प्रकोप बढ़ता था, तब दिल्ली और हरियाणा के लोग राहत पाने के लिए भारी तादाद में यहां पहुंचते थे। इसके विपरीत सितंबर से नवंबर का सुहाना वक्त विशुद्ध रूप से बंगाली यात्रियों के नाम दर्ज रहता था।

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प्रोफेसर अजय रावत के अनुसार, बंगाली सैलानियों का नैनीताल से नाता महज कुछ दिन सैर-सपाटा करने तक सीमित नहीं था, बल्कि यह एक बेहद गहरा भावनात्मक और सांस्कृतिक संबंध था। बंगाल से आने वाले कई परिवार तो ऐसे थे जिनकी कई पीढ़ियां लगातार हर साल अपनी छुट्टियां बिताने नैनीताल की वादियों में ही आती रही थीं।

सांस्कृतिक आदान-प्रदान और स्थानीय युवाओं का लगाव

उस दौर की यादें साझा करते हुए प्रोफेसर अजय रावत बताते हैं कि स्थानीय नौजवानों को साल भर बंगाली पर्यटकों के आगमन का बेसब्री से इंतजार रहता था। इस उत्सुकता की सबसे बड़ी वजह दोनों क्षेत्रों के बीच होने वाला जीवंत सांस्कृतिक आदान-प्रदान था। बंगाली सैलानियों के माध्यम से नैनीताल के युवाओं को पश्चिम के बेहतरीन सिनेमा, हॉलीवुड फिल्मों, रंगमंच, समृद्ध साहित्य, नए खान-पान और आधुनिक जीवनशैली के विविध पहलुओं को समझने का सुनहरा मौका मिलता था।

नैनीताल में आयोजित होने वाले प्रसिद्ध ऑटम फेस्टिवल में भी ये सैलानी बढ़-चढ़कर अपनी भागीदारी निभाते थे। उस जमाने में पर्यटन के पेशे को सिर्फ पैसे कमाने या मुनाफे के तराजू पर नहीं तौला जाता था। बल्कि दूर-दराज से आए मुसाफिरों से आत्मीय संवाद स्थापित करना, उनके समृद्ध रीति-रिवाजों को करीब से जानना और उनके साथ पारिवारिक रिश्ते कायम करना ही पहाड़ों की आतिथ्य परंपरा का असली सार माना जाता था।

कुमाऊं के सुदूर अंचलों तक प्रकृति की खोज

बंगाली सैलानियों की एक खास पहचान यह थी कि वे भीड़-भाड़ से दूर कुदरत के बिल्कुल करीब रहना पसंद करते थे। प्रोफेसर रावत के मुताबिक, वे नैनीताल को अपना मुख्य केंद्र बनाते थे और वहां से कुमाऊं मंडल के कई अन्य शांत और सुदूरवर्ती इलाकों की लंबी यात्राएं तय करते थे। उनकी यात्रा सूची में कौसानी की शांत पहाड़ियां, रानीखेत के देवदार के जंगल, पिंडारी ग्लेशियर, मिलम ग्लेशियर और दूरस्थ नारायण आश्रम जैसे सुरम्य स्थल अनिवार्य रूप से शामिल रहते थे।

वे केवल मशहूर जगहों पर एक नजर डालकर लौटने वाले सैलानी नहीं थे, बल्कि पहाड़ों में काफी लंबा वक्त गुजारते थे। उनका मुख्य मकसद प्राकृतिक सौंदर्य को अपनी रूह में उतारना और हिमालय की आबोहवा को पूरी गहराई से महसूस करना होता था।

दुर्गा पूजा की लंबी छुट्टियों का सुनहरा दौर

नैनीताल होटल एसोसिएशन के सचिव वेद साह इस बात की पुष्टि करते हैं कि पहले के समय में दुर्गा पूजा का त्योहार शुरू होने से करीब बीस दिन पहले ही बंगाली सैलानियों का नैनीताल पहुंचना शुरू हो जाता था। बंगाल में शारदीय नवरात्र और दशहरे के पर्व पर स्कूलों, दफ्तरों और संस्थानों में दस से लेकर बीस दिनों तक का लंबा अवकाश रहता है।

इस लंबी छुट्टी का फायदा उठाकर बड़ी संख्या में बंगाली परिवार एक साथ पहाड़ों की यात्रा पर निकल पड़ते थे, और नैनीताल हमेशा उनकी प्राथमिक पसंद बना रहता था। वेद साह याद करते हैं कि सितंबर से नवंबर के दौरान शहर में बंगाली सैलानियों की मौजूदगी इतनी सघन होती थी कि नैनीताल पूरी तरह से मिनी बंगाल के रंग में रंग जाता था।

पसंद में बदलाव और खर्च की मार से घटी आवाजाही

पर्यटन उद्योग से जुड़े व्यवसायियों का विश्लेषण है कि समय बीतने के साथ बंगाली यात्रियों की प्राथमिकताओं और आदतों में बड़ा बदलाव दर्ज किया गया है। वर्तमान समय में देश के विभिन्न हिस्सों में नए-नए आकर्षक पर्यटन स्थलों का तेजी से विकास हुआ है। यातायात के बेहतर साधनों और सुगम कनेक्टिविटी की वजह से अब सैलानियों के सामने छुट्टियों के लिए अनगिनत नए गंतव्य मौजूद हैं। इसके अतिरिक्त यात्रा और ठहरने के खर्च में हुई भारी बढ़ोतरी भी इस गिरावट की एक अहम वजह मानी जा रही है।

वेद साह बताते हैं कि एक जमाने में नैनीताल बंगाली परिवारों की पहली पसंद हुआ करता था, लेकिन जैसे-जैसे अन्य राज्यों में नए और सस्ते विकल्प तैयार हुए, पर्यटक उन नई मंजिलों की तरफ रुख करने लगे। घूमने-फिरने के तमाम नए विकल्प सामने आ जाने से बंगाली सैलानी अब अलग-अलग दिशाओं में बंट चुके हैं।

कमजोर पड़ता सांस्कृतिक नाता और सुनहरी यादें

सरोवर नगरी में आज भी बंगाली मुसाफिरों के कदम पड़ते हैं, लेकिन उस ऐतिहासिक दौर जैसी असीम भीड़ और रौनक अब नदारद हो चुकी है। स्थानीय बाशिंदों और होटल कारोबारियों के लिए यह सिर्फ पर्यटकों की संख्या में आई सांख्यिकीय गिरावट भर नहीं है, बल्कि यह उस आत्मीय सांस्कृतिक डोर के ढीले पड़ने की दास्तान है जिसने नैनीताल को दशकों तक बंगाल से जोड़े रखा था। कभी तीन महीनों तक बंगाली संस्कृति से गुलजार रहने वाला नैनीताल आज भी उन पुराने दिनों की यादों को संजोए हुए नए दौर के पर्यटन के साथ तालमेल बिठाने की कोशिश कर रहा है।

सवाल-जवाब

नैनीताल को कभी 'मिनी बंगाल' क्यों कहा जाता था?
सितंबर से नवंबर के दौरान दुर्गा पूजा की छुट्टियों में इतनी भारी संख्या में बंगाली पर्यटक पहुंचते थे कि माल रोड और बाजारों में बंगाली भाषा और संस्कृति का माहौल छा जाता था।
इतिहासकार प्रोफेसर अजय रावत के अनुसार पहले नैनीताल में पर्यटकों का क्या चक्र रहता था?
मार्च-अप्रैल में मुंबई और गुजरात के पर्यटक आते थे, गर्मियों में दिल्ली और हरियाणा के लोग पहुंचते थे, जबकि सितंबर से नवंबर का समय बंगाली सैलानियों के लिए तय रहता था।
बंगाली पर्यटक नैनीताल के अलावा कुमाऊं के किन इलाकों में जाते थे?
वे नैनीताल को आधार बनाकर कौसानी, रानीखेत, पिंडारी ग्लेशियर, मिलम ग्लेशियर और नारायण आश्रम जैसी जगहों पर लंबे समय तक ठहरते थे।
स्थानीय युवाओं को बंगाली पर्यटकों के आने का इंतजार क्यों रहता था?
बंगाली सैलानियों के जरिए युवाओं को हॉलीवुड सिनेमा, थिएटर, साहित्य, आधुनिक खान-पान और जीवनशैली के बारे में जानने का अवसर मिलता था।
नैनीताल में बंगाली सैलानियों की संख्या कम होने की मुख्य वजहें क्या हैं?
नए पर्यटन स्थलों का विकास, पर्यटकों के पास बढ़ते विकल्प, बेहतर कनेक्टिविटी और यात्रा व ठहरने के खर्च में हुई बढ़ोतरी प्रमुख कारण हैं।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 4

Arjun Mehta@arjun-mehta·20 मिनट पहले

प्रोफेसर अजय रावत ने सही याद किया, पहले नैनीताल में सितंबर से नवंबर सिर्फ बंगालियों के नाम होता था।

Ravikash Gupta@ravikash·19 मिनट पहले

अर्जुन जी, बात सही है पर क्या सिर्फ बंगालियों के जाने से ही ऐसा हुआ है? मुझे लगता है बाकी जगहों के विकल्प भी बढ़ गए हैं।

Rohan Verma@rohan-verma·39 मिनट पहले

बचपन में सितंबर-अक्टूबर आते ही नैनीताल की हर गली में बंगाली परिवारों की चहल-पहल दिख जाती थी। अब लोग हिमाचल या कश्मीर की नई जगहों पर जाने लगे हैं, तो यहाँ का पुराना माहौल फीका पड़ गया है। वक्त के साथ घूमने के तौर-तरीके बदल ही गए हैं।

Karan Malhotra@karan-malhotra·39 मिनट पहले

रोहन भाई, बात सही है कि नए रास्ते खुले हैं, पर मुझे नहीं लगता कि सिर्फ महंगाई या नए विकल्पों से इतना पुराना जुड़ाव एकदम से खत्म हो सकता है।

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